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कविताएंः अंतिम इच्छा जैसा कुछ भी नहीं है

दिनेश कुश्वाह की कविताएं

Author July 8, 2018 5:45 AM
जब हमें कुछ खोया-खोया सा लगता है..

दिनेश कुशवाह
अंतिम इच्छा जैसा कुछ भी नहीं है

जब हमें कुछ खोया-खोया सा लगता है
और पता नहीं चलता कि
क्या खो गया है
तो वे दिन जो बीत गए
दिल की देहरी पर
दस्तक दे रहे होते हैं।
वे दिन जो बीत गए
लगता है बीते नहीं
कहीं और चले गए
बहुत सारे अनन्यों की तरह
और अभी रह रहे हैं
इसी देश काल में।
जो बीत गया इस जीवन में
उसे एक बार और
छूने के लिए तरसते रहते हैं हम
बीते हुए कल की न जाने
कितनी चीजें हैं जिन्हें
हम पाना चाहते हैं उसी रूप में
बार-बार
नहीं तो सिर्फ एक बार और।
ललकते रहते हैं
उन्हें पाने के लिए हम
मरने से पहले
अंतिम इच्छा की तरह
और अंतिम इच्छा जैसा
कुछ भी नहीं है जीवन में।

पहाड़ लोग

अपना सब कुछ देते हुए
पूरी सदाशयता के साथ
शताब्दियों के उच्छेदन के बाद भी
बचे हैं कुछ छायादार और फलदार वृक्ष
नीच कहे जाने वाले परिश्रमी लोगों की तरह।
जिन लोगों ने झूले डाले इनकी शाखों पर
इनके टिकोरों से लेकर मोजरों तक का
इस्तेमाल करते रहे रूप-रस-गंध के लिए
जिनके साथ ये गरमी-जाड़ा-बरसात खपे
यहां तक कि जिनकी चिताओं के साथ
जलते रहे ये
उन लोगों ने इन पर
कुल्हाड़ी चलाने में कभी कोताही नहीं की।
देश भर में फैले पहाड़
ये ही लोग हैं
जिन्हें हर तरह से
नोंच कर नंगा कर दिया गया है।

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पूछती है बेटी
जनक बहुत कुछ जानते थे सीते!
गोकि हल की मुठिया
थामे बिना राजा
नहीं समझ सकता दुख प्रजा का।
कि क्या होती है पोषिता कन्या
योषिता कुमारी?
कितना कठिन है उसका जीवन निर्वाह?
इसलिए पिता विदेह ने
तुम्हें स्वयंवरा बनाया
कि स्वयं वर
बल-बुद्धि-संयम शील युक्त वर
पर रख दी शंभुधनु भंजन की शर्त।
जनक सुता! तुमसे पहले
पिता ने अग्नि-परीक्षा दी थी
कहती है मेरी पत्नी
अपनी अमूल्य धरोहर भी दांव पर लगा कर
पिता निश्चिंत होना चाहता है
एक लड़की का पिता होकर ही
जाना जा सकता है
बहुत कुछ कर सकने के सामर्थ्य
और कुछ न कर पाने की मजबूरी को।
पूछती है मेरी बेटी
पापा! समय ने तुममें और जनक में
कोई फर्क किया है क्या?
और सोचता हूं मैं
एक वन से दूसरे वन जाना ही
नियति है क्यों
आज भी हमारी बेटियों की!

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