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सेहत: पेट से शुरू होती हैं कई बीमारियां, पाचन ठीक तो फिर सब ठीक

हिपोक्रेट्स ने भले ही यह बात दो हजार साल से भी ज्यादा पहले कही हो, लेकिन उनकी कही बात को आज स्वास्थ्य विज्ञान से जुड़ा हर क्षेत्र मानता है।

sehatखाना मनपसंद खाएं, लेकिन पेट की सुरक्षा का जरूर ध्यान रखें।

पेट का रोगमुक्त रहना जरूरी है क्योंकि इससे सेहत के कई पक्ष जुड़े हैं। यही कारण है कि न सिर्फ स्वास्थ्य विज्ञान के क्षेत्र में बल्कि आम लोगों के बीच भी इसे लेकर कई तरह की हिदायती कहावतें लोकप्रिय हैं। इसमें एक प्रसिद्ध अंग्रेजी कहावत के मुताबिक पेट का खराब होना 72 तरह की बीमारियों को आमंत्रण है। इसी तरह यूनानी चिकित्सक हिपोक्रेट्स का यह जुमला काफी प्रसिद्ध है- ‘सारी बीमारियां पेट से ही शुरू होती हैं।’ दिलचस्प है कि हिपोक्रेट्स ने भले ही यह बात दो हजार साल से भी ज्यादा पहले कही हो, लेकिन उनकी कही बात को आज स्वास्थ्य विज्ञान से जुड़ा हर क्षेत्र मानता है।

आंतों का स्वस्थ रहना जरूरी
गौरतलब है कि एक स्वस्थ वयस्क इंसान की सिर्फ आंत में ही करीब सौ खरब जीवाणु पाए जाते हैं। ये अलग-अलग किस्म के होते हैं और उनके हितों के बीच टकराव पैदा होने से बीमारियां उपजती हैं। पिछले दो दशकों में हुए अलग-अलग शोधों से भी इस बात की पुष्टि हुई है कि पूरी तरह स्वस्थ रहने के लिए आंतों का स्वस्थ रहना बेहद जरूरी है।

आंतों की सेहत पर जीवनशैली का जबरदस्त असर होता है। ज्यादा कैलोरी वाले जंक फूड और शराब का अधिक सेवन, इसके अलावा रेशेदार भोजन और हरी सब्जियां न खाने से पाचन से जुड़े रोगों का खतरा बढ़ जाता है। इससे ‘गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल सिस्टम’ पर बुरा असर पड़ता है और कई बीमारियां पैदा होती हैं।

तनाव से भी समस्या
पेट के बारे में यह भी समझना जरूरी है कि तनाव में रहने से भी आपका हाजमा खराब हो सकता है। तनाव की वजह से पूरे पाचन तंत्र में जलन होने लगती है, जिससे पाचन नली में सूजन आ जाती है और इस सबका नतीजा यह होता है कि पोषक तत्त्वों का शरीर के काम आना कम हो जाता है। अगर कोई व्यक्ति लंबे समय तक तनाव की समस्या से जूझ रहा है तो इस वजह से उसे ‘इरिटेबल बॉवेल सिंड्रोम’ और पेट में ‘अल्सर’ जैसी पाचन संबंधी तकलीफें हो सकती हैं।

पाचन संबंधी रोग
पेट से जुड़े रोगों के लक्षण के अध्ययन से यह बात सामने आई है कि ‘गैस्ट्रोइसोफेगल रीफ्लक्स’ (जीईआरडी) अब पाचन संबंधी सामान्य रोग बन गया है। इस रोग में पेट के अंदर मौजूद अम्ल यानी ‘एसिड इसोफेगस’ (भोजन नली) में वापस चले जाते हैं। इससे सीने में जलन तो होती ही है, उल्टी भी होने लगती है। इसके अलावा फेफड़े, कान, नाक या गले की भी कई तकलीफें घेर लेती हैं। जीईआरडी अगर लंबे समय तक रह गया तो एक नई अवस्था आ सकती है, जिसका नाम है ‘बैरेट्स इसोफेगस’ और इसका अगर समय पर इलाज न किया गया तो इसोफेगस का कैंसर भी हो सकता है।

जीवनशैली में सुधार या बदलाव से पेट की कई समस्याओं से छुटकारा मिल सकता है। इनमें बिस्तर पर सिर ऊंचा रखकर न सोना, तंग कपड़े न पहनना, वजन ज्यादा होने पर उसे घटाना, शराब और सिगरेट का इस्तेमाल न करना, संतुलित खुराक लेना, भोजन के तुरंत बाद लेटने से बचना और सोते समय खाने से बचना शामिल है।

कुछ और अहम बातें
-धूम्रपान और शराब का ज्यादा मात्रा में उपयोग करने से इसोफेगस में लौटते एसिड की मात्रा बढ़ती है। इससे पेट में बनने वाले एसिड की मात्रा भी बढ़ जाती है और यह कई तरह की बीमारियोंं को न्योता देता है।
-स्वास्थ्य क्षेत्र के कुछ हालिया अध्ययन में यह बात सामने आई है कि शराब का सेवन और धूम्रपान करने से लीवर और पैंक्रियाज को नुकसान काफी पहुंचता है। पैंक्रियाज हर तरह के भोजन को पचाने वाला अहम अंग है जबकि लीवर शरीर में भोजन के पचने के बाद उसके अवशोषण के लिए जरूरी है।
-एक ही बार में बहुत ज्यादा भोजन कर लेने से पाचन नली पर दबाव बढ़ सकता है। बेहतर यह होगा कि दिन भर में नियमित अंतराल पर थोड़ी-थोड़ी मात्रा में भोजन करें। हाजमे के मामले में अगर आपको लंबे समय तक या फिर गंभीर रूप से कोई समस्या महसूस हो तो बिना और किसी तरह की देर किए चिकित्सकों की मदद लेनी चाहिए।
(यह लेख सिर्फ सामान्य जानकारी और जागरूकता के लिए है। उपचार या स्वास्थ्य संबंधी सलाह के लिए विशेषज्ञ की मदद लें।)

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