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रबारी कढ़ाई में चित्रित संसार

कच्छ से लेकर राजस्थान तक रहने वाले राबरी समुदाय की कढ़ाई की शैलियों में उनकी भौगोलिक स्थिति के कारण अंतर देखने को मिलता है। रंगीन परिधान, गहरे रंग और शीशों के साथ चमकती कढ़ाई-राबरी परंपरा को परिभाषित करती है।

छ सालों पहले एक फिल्म आई थी- ‘गोलियों की रासलीला, रामलीला’, जिसमें रबारी समुदाय का जिक्र था।

देश के विभिन्न हिस्सों में महिलाएं हाथ से कढ़ाई कर वस्त्र, सजावटी सामान, घरेलू उपयोग की वस्तुएं बनाती हैं। हर इलाके की कढ़ाई की अपनी पहचान और खुशबू है। उनकी अलग-अलग शैलियां हैं। हाथ से बने वस्त्रों की दुनिया भर में मांग है। कढ़ाई की ऐसी समृद्ध परंपरा गुजरात में रबारी समुदाय की है। इसमें मनके, कांच, कौड़ियों वगैरह का इस्तेमाल कर कढ़ाई के तरह-तरह के डिजाइन तैयार किए जाते हैं। इसकी अनेक शैलियां हैं। रबारी कढ़ाई कला के बारे में बता रही हैं सुमन बाजपेयी

छ सालों पहले एक फिल्म आई थी- ‘गोलियों की रासलीला, रामलीला’, जिसमें रबारी समुदाय का जिक्र था। साथ ही उनकी पोशाकें भी हमें देखने को मिली थीं। उन पर हुई कढ़ाई और उस समुदाय द्वारा इस्तेमाल किए जाने वालों वस्त्रों में झलकती उनकी संस्कृति एक समृद्ध कला और परंपरा का परिचय देती है। रबारी कढ़ाई हमें केवल उनकी संस्कृति के संबंध में बहुत कुछ नहीं बताती, बल्कि वह एक भाषा है, जिसमें महिलाएं आपस में बात करती हैं, अपनी भावनाएं व्यक्त करती हैं। रबारी महिलाएं जिस ढंग से कढ़ाई करती हैं, जिस तरह से टांकों, रंगों, अभिप्रायों और नमूनों को मिश्रित करती हैं, वह उनकी बातचीत करने का माध्यम होता है।

विविध आयाम हैं इस कला के

गुजरात और राजस्थान के शुष्क क्षेत्रों में जीवित रहने और अपने को उसके अनुसार ढालने में सक्षम रबारी एक यायावर समुदाय है। यह समुदाय विशेषकर कढ़ाई, मोती और कांच के काम, गारे की मूर्तिकला जैसी विशिष्ट कलाओं के लिए विख्यात है।

रबारी महिलाएं अनेक प्रकार की पोशाकों, बैग, घरेलू सजावटी सामान और पशुओं के साजो-सामान पर कढ़ाई करती हैं। उन पर वे जीवन की महत्त्वपूर्ण घटनाओं, रिवाजों, और मूल्यों को चित्रित करती हैं। उनकी लड़कियां चोली, घाघरे, दुपट्टे, वॉल हैंगिग, तकियों के कवर और कोठालों, जिनमें भर कर दहेज दिया जाता है, उन पर कढ़ाई करती हैं। यह सामान उनके दहेज में जाता है। विवाहित महिलाएं अपने बच्चों के कपड़ों और साथ ही शैशवावस्था के कपड़ों की कढ़ाई करती हैं। कुछ कढ़ाइयों में विशेष रिवाजों पर बल दिया जाता है।

रिवाजों में भी टांके दिखते हैं

बड़ी उम्र की रबारी महिलाएं काले वस्त्र पहनती हैं, जो कि शोक के परिचायक होते हैं। माना जाता है कि काले वस्त्र पहन कर वे एक ऐसे राजा को सम्मानित करती हैं, जिसने शताब्दियों पहले रबारी की रक्षा करने में अपने प्राणों की बलि दी थी। शोक के समय युवा महिलाएं रंगीन ब्लाउज पहनती हैं, जिनके किनारों पर बारीक कढ़ाई की गई होती है, जो कि यह दर्शाती है कि महिला शोक मना रही है। जिन महिलाओं के पति जीवित होते हैं, उनके लिए अपने ब्लाउज पर क्रासनुमा निशान लगाना जरूरी होता है। उनके घाघरों पर रंगीन धागों और चांदी चढ़े कांच के टुकड़ों से खूबसूरत कढ़ाई की हुई होती है।

बहुत खूबसूरत ढंग से कढ़ाई किया हुआ कोठालिया पर्स, जिसमें वर पान और सुपारी के आनुष्ठानिक उपहार ले जाता है, पारिवारिक संबंध बनाए रखने के लिए आदान-प्रदान के महत्त्व का परिचायक है।

कच्छ के आदिवासी रबारी समुदाय में परंपरा रही है कि समुदाय की लड़कियों को अपनी शादी के दहेज में ले जाने वाला पूरा सामान- लहंगे, ब्लाउज, चादरें, सोफा कवर, दरियां, दूल्हे के कपड़े, तोरण आदि खुद अपने हाथों से कढ़ाई करके तैयार करें। लेकिन इस महीन कारीगरी में इतना समय लगता था कि दहेज तैयार करने के चक्कर में उनकी शादियों में देर हो जाती थी। इसे देखते हुए समुदाय के बुजुर्गों ने इस कारीगरी और रिवाज पर रोक लगा दी।

टांकों का करिश्मा

गुजरात दुनिया भर में अपनी कढ़ाई और शीशे के काम के लिए विख्यात है। कच्छ क्षेत्र में ही लगभग सोलह प्रकार की कढ़ाई की जाती है, पर अपने डंडी टांके (चेन स्टिच) और अनगिनत शीशों के कारण रबारी कढ़ाई सबसे ज्यादा पसंद की जाती है।

रबारी कढ़ाई कभी भी एक जैसी नहीं होती। उसमें टांके बदलते हैं, उनकी संख्या बढ़ती और घटती है तथा रंग गाढ़े और चमकीले होते रहते हैं। यह कढ़ाई सिंधी-राजस्थानी समुदाय से प्रेरित है। इसमें कढ़ाई के एक ही पैटर्न को घाघरे और लहंगे पर बार-बार दोहराया जाता है। फिर सिलाई की मदद से लोगों की रोजमर्रा जिंदगी से प्रेरित डिजाइनों को इसमें बनाया जाता है। यह विभिन्न आकारों के शीशों के उपयोग के लिए जानी जाती है। उसमें प्रयुक्त विविध टांकों और शैलियों के कारण यह कढ़ाई विश्व भर में प्रसिद्ध है। शीशों के साथ आउटलाइन बनाने के लिए डंडी टांके से कपड़े को सुंदर रूप दिया जाता है। शीशे के काम और चेन स्टिच के अलावा साटन स्टिच, रनिंग स्टिच और हेरिंगबोन स्टिच का भी प्रयोग कढ़ाई करने के लिए किया जाता है। शीशे के टुकड़ों को छोटे बटनहोल स्टिच के साथ जोड़ा जाता है। साथ ही आजकल वे मोती, सीप, लटकन और बटन का इस्तेमाल भी करने लगी हैं।

कच्छ से लेकर राजस्थान तक रहने वाले राबरी समुदाय की कढ़ाई की शैलियों में उनकी भौगोलिक स्थिति के कारण अंतर देखने को मिलता है। रंगीन परिधान, गहरे रंग और शीशों के साथ चमकती कढ़ाई-राबरी परंपरा को परिभाषित करती है। रोजमर्रा के जीवन के अलावा इसमें रबारी समुदाय की कथाओं और रेगिस्तान जीवन से संबंधित डिजाइन भी उकेरे जाते हैं। यह शैली, डिजाइन और रंगों का मिश्रण है। महिलाएं कपड़ों और अन्य वस्तुओं पर कढ़ाई करती हैं, जबकि पुरुष चमड़े पर इसे करते हैं।

सुई और धागे का कमाल

भारत के पश्चिमी भाग में राजस्थान से लेकर गुजरात के कच्छ क्षेत्र में रहने वाला पशुपालक रबारी समुदाय लगभग चार सौ वर्ष पूर्व सिंध (अब पाकिस्तान) से यहां आया था। अनेक रबारी गोलाकार घरों में रहते हैं, जिन्हें भुंगा कहा जाता है। और इन घरों की दीवारों, छतों पर भी उनकी यह कला दिखती है। रबारी समुदाय और उप समुदायों में बंटा हुआ है और कढ़ाई का अंतर भी देखने को मिलता है। किस तरह से वे शीशे या टांका लगाते हैं, उससे उनके समुदाय और उनकी विशिष्टता को पहचाना जा सकता है। जैसे वगाड़िया रबारी महिलाएं जो ओढ़नी पहनती हैं उनके किनारों पर कढ़ाई होती है, जबकि कच्छेला रबारी की ओढ़नियों में डिजाइन बीच में बने होते हैं।

कढ़ाई में महिलाएं बिना कोई ड्राइंग बनाए अपने आसपास की दुनिया को चित्रित करती हैं। वह भी केवल सुई और धागे से। कांटेदार बबूल और कीकर की झाड़ियां, जो बहुतायत में कच्छ में पाई जाती हैं, रंगों से भर कर और महिलाओं की कल्पना में ढल कर डंडी टांके से कपड़े की सतह को अलंकृत करती हैं।

परिवार, गांव का जीवन और आसपास की दुनिया-सूरज, पेड़, पृष्ठभूमि, फूल, मोर, ऊंट, साथ ही मुगल शैली से प्रेरित वास्तु और फारसी डिजाइन से प्रेरित डिजाइन बहुत ही खूबसूरती से कपड़ों पर उकेरे जाते हैं। कढ़ाई का डिजाइन और किस तरह का परिधान है, यह महिला के सामाजिक स्तर, आयु और पारंपरिक आदिवासी क्षेत्र को भी दर्शाता है।

नए प्रयोग

एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को दी जाने वाली यह उत्कृष्ट कला साड़ियों से लेकर श़ॉल, दुपट्टे, स्टोल, बैग, पर्स, चादर, वॉल हैंगिग, यहां तक कि जूतियों में भी दिखाई देती है। यायावर होने के बावजूद यह समुदाय अपनी इस पारंपरिक कढ़ाई को किसी के साथ बांटता नहीं है। यही वजह है कि इसमें से केवल कच्छ की ही सुगंध आती है।

हालांकि समय के अनुरूप चलने के लिए रबारी समुदाय की महिलाएं इसमें नए बदलाव ला रही हैं। नए डिजाइन के साथ नए फैशन को भी इसमें ढालने लगी हैं। रबारी कढ़ाई से तैयार परिधान सर्दियों में पहने जाएं तो उपयुक्त रहते हैं, क्योंकि शीशों के उपयोग की वजह से इनका भार अधिक होता है। परिधान के भारी होने के कारण गर्मियों में इन्हें पहन पाना संभव नहीं है।इन परिधानों को गुनगुने पानी में ही धोएं और रसायन या सोड़ा मिश्रित साबुन का प्रयोग न किया जाए तो ये लंबे समय तक खराब नहीं होते हैं।

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