ताज़ा खबर
 

शख्सियत: आंध्र केसरी तंगुटूरी प्रकाशम

प्रकाशम का जन्म मद्रास प्रेसीडेंसी (अब प्रकाशम जिला, आंध्र प्रदेश) में ओंगोल से 26 किमी दूर विनोदरयुनिपलेम गांव में सुब्बाम्मा और गोपाल कृष्णय्या के तेलुगु नियोगी ब्राह्मण परिवार के लिए हुआ था। वे बचपन से वकील बनना चाहते थे लेकिन मैट्रिक की परीक्षा में विफल रहने से उनकी यह तमन्ना पूरी होने में बाधा आई। हालांकि बाद में वे एक सफल वकील बने और काफी नाम व यश कमाया।

महान स्वतंत्रता सेनानी आंध्र केसरी तंगुटूरी प्रकाशम

भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के तारीखी सफरनामे को महज आजादी की मंजिल तक पहुंचने की कामयाबी के तौर पर देखना एक सघन इतिहास का इकहरा पाठ है। इस आंदोलन की सबसे बड़ी खासयित यह थी कि इसने गुलामी में दबे भारतीय मन को स्वाभिमान और गौरव से पुष्ट किया। गांव-शहर से लेकर विभिन्न भाषाई और सांस्कृतिक क्षेत्रों ने अपनी अस्मिता को नए सिरे से रेखांकित किया।

यही नहीं, इस दौरान कई ऐसे नायक भी सामने आए, जो अपने-अपने क्षेत्रों की पहचान बने। तेलुगु अस्मिता से जुड़े एक ऐसे ही नायक थे तंगुटूरी प्रकाशम। प्रकाशम का नाम देश के चोटी के स्वाधीनता सेनानियों में शामिल है। 1953 में मद्रास स्टेट के विभाजन के बाद स्थापित आंध्र प्रदेश के वे प्रथम मुख्यमंत्री बने। इससे पहले वे मद्रास प्रेसिडेंसी के भी मुख्यमंत्री थे। तेलुगु समाज ने अपने इस नायक को ‘आंध्र केसरी’ कहकर समादृत किया है।

प्रकाशम की प्रतिष्ठा और स्वीकृति कितनी बड़ी थी इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पांच मई, 2000 को संसद भवन परिसर में उनके नौ फीट ऊंचे चित्र का तत्कालीन राष्ट्रपति केआर नारायण ने अनावरण किया। यही नहीं उन पर ‘आंध्र केसरी’ नाम से एक फिल्म भी बन चुकी है, जिसे प्रसिद्ध फिल्मकार विजय चंदर ने निर्देशित किया है।

प्रकाशम का जन्म मद्रास प्रेसीडेंसी (अब प्रकाशम जिला, आंध्र प्रदेश) में ओंगोल से 26 किमी दूर विनोदरयुनिपलेम गांव में सुब्बाम्मा और गोपाल कृष्णय्या के तेलुगु नियोगी ब्राह्मण परिवार के लिए हुआ था। वे बचपन से वकील बनना चाहते थे लेकिन मैट्रिक की परीक्षा में विफल रहने से उनकी यह तमन्ना पूरी होने में बाधा आई। हालांकि बाद में वे एक सफल वकील बने और काफी नाम व यश कमाया। दिलचस्प है कि प्रकाशम शुरू में दूसरी श्रेणी के वकील थे और हाई कोर्ट में किसी भी मामले में बहस नहीं कर सकते थे। लिहाजा कानूनी अध्ययन के लिए उन्होंने इंग्लैंड जाने का फैसला किया।

इंग्लैंड में वे रॉयल इंडिया सोसाइटी में शामिल हो गए। बैरिस्टरी की पढ़ाई पूरी करके प्रकाशम स्वदेश लौटे तो मद्रास हाई कोर्ट में कई बड़े मामलों में कानूनी पक्षकार बने। विपिन चंद्र पाल जब मद्रास पहुंचे तो उन्होंने आगे बढ़कर उनके कार्यक्रम की अध्यक्षता की। राजद्रोह के भय से तब ऐसा करने के लिए कोई भी सामने आने को तैयार नहीं था। इसके बाद से वे कांग्रेस पार्टी और स्वाधीनता आंदोलन की गतिविधियों के साथ जुड़ते चले गए। 1921 में उन्होंने सत्याग्रह प्रतिज्ञा पर हस्ताक्षर किए और वकालती पेशा छोड़ दिया।

उनके बारे में यह भी दिलचस्प है कि वे 31 साल की उम्र में राजामहेंद्रवरम के नगरपालिका अध्यक्ष के रूप में चुने गए थे। उन्होंने ‘स्वराज’ अखबार के कार्यकारी संपादक के तौर पर तेलुगु भाषियों के साथ पूरे दक्षिण भारत में स्वाधीनता आंदोलन का अलख जगाया। यह अखबार तेलुगु के साथ तमिल और अंग्रेजी में एक साथ प्रकाशित होता था। वे 1921 में कांग्रेस पार्टी के महासचिव चुने गए थे।

असहयोग आंदोलन के दौरान उन्होंने गुंटूर में तीस हजार कांग्रेस स्वयंसेवकों के साथ अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ ऐतिहासिक विरोध प्रदर्शन किया।

1926 में वे कांग्रेस की टिकट पर केंद्रीय विधानसभा के लिए चुने गए। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उनकी लोकप्रियता अंग्रेजी हुकूमत को इतनी अखरी कि उन्हें तीन साल से अधिक समय तक जेल में रखा गया। तेलुगु समाज का यह नायक आजीवन अन्याय के विरोध के लिए संघर्ष करता रहा। वे अहिंसक आदर्शों पर चलने वाले राष्ट्रभक्त थे। ल्ल

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 दाना-पानी: त्योहार के पकवान
2 शख्सियत: राष्ट्रप्रेम का ओजस्वी स्वर सुभद्रा कुमारी चौहान
3 सेहत: तन-मन को मथती फाइब्रोमाल्जिया, इस दर्द की इंतहा ही नहीं
ये पढ़ा क्या?
X