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मूल्यांकनः जनमुक्ति का योद्धा कवि

आधुनिक हिंदी कविता के परिदृश्य में कवि गोपाल सिंह ‘नेपाली’ का आगमन 1930 के युग में हुआ था, जब एक तरफ स्वाधीनता आंदोलन तीव्रतर हो रहा था तो दूसरी ओर ब्रिटिश शासन का दमनचक्र बर्बरता की सारी सीमाएं लांघ रहा था।

Author August 12, 2018 6:33 AM
कवि एक ओर राष्ट्र की अखंडता की रक्षा के लिए समर्पित रहा, तो दूसरी ओर सदियों से वंचित, शोषित, उपेक्षित और प्रताड़ित जनता के जीवन को और अधिक नारकीय बनाने वाली सत्ता और व्यवस्था से संघर्ष करता रहा।

नंदकिशोर नंदन

आधुनिक हिंदी कविता के परिदृश्य में कवि गोपाल सिंह ‘नेपाली’ का आगमन 1930 के युग में हुआ था, जब एक तरफ स्वाधीनता आंदोलन तीव्रतर हो रहा था तो दूसरी ओर ब्रिटिश शासन का दमनचक्र बर्बरता की सारी सीमाएं लांघ रहा था। विदेशी सत्ता के दलाल-चाटुकार जमींदारों, रायबहादुरों और अधिकारियों-कर्मचारियों द्वारा राष्ट्रीय आंदोलन के सत्याग्रहियों और क्रांतिकारियों के खिलाफ दुष्प्रचार तेज था। इन विकट परिस्थितियों से स्वयं छायावादी कवि निराला और पंत भी अछूते नहीं रहे। छायावादी काव्य-संस्कारों की छाया में आंखें खोलने वाले नेपाली अपने समय की चुनौतियों के परिप्रेक्ष्य में अपनी भूमिका सुनिश्चित करने में सक्रिय हो गए। प्रकृति-प्रेमी होने के बावजूद उनके पैर यथार्थ की ठोस जमीन पर टिके थे। एक ओर वे स्वाधीनता-संग्राम के विभिन्न चरणों की गहरी पड़ताल करते दिखाई पड़ते हैं, तो दूसरी ओर दरिद्र, दास और दुखी भारत को भी अपनी दृष्टि से ओझल नहीं होने देते हैं।

नेपाली हिंदी के शायद पहले कवि हैं, जिन्होंने 1931 में महात्मा गांधी के लंदन के गोलमेज सम्मेलन में जाने पर हुए उनके भव्य स्वागत का वर्णन करते हुए उन्हें देश के करोड़ों नागरिकों के आत्मगौरव की याद दिलाते हुए इन पंक्तियों में ललकारा- ‘पर इससे क्या होता जाता है, हम दुखियों का मोहन/ यहां हमारे घर में जारी/ वैसा ही निष्ठुर दोहन/ कितनी टूटें रोज लाठियां/ निरपराध नंगे सिर पर/ होती है दिन-रात चढ़ाई/ भूखों के रीते घर पर/ छोड़ो यह रोटी का टुकड़ा/ अदना चावल का दाना/ आओ, मोहन, शंख बजाओ/ पहने केशरिया बाना।’

प्रेमचंद की भांति उनकी दृष्टि भी मात्र राजनीतिक स्वाधीनता पर केंद्रित न थी, उनकी चेतना के केंद्र में न केवल किसान-मजदूर थे, बल्कि उनकी दृष्टि भारतीय समाज को छिन्न-भिन्न करने वाली, उसे रक्त-रंजित कर निर्बल करने वाली वर्ण-व्यवस्था और सांप्रदायिकता को भी भली-भांति देख-समझ रही थी। स्वाधीनता-संग्राम के दौरान वास्तविक परिस्थितियों के प्रति उनका यह वस्तुपरक दृष्टिकोण और उसकी अभिव्यक्ति में निरंतरता उन्हें समकालीनों से एक अलग छवि प्रदान करता है। ‘चित्र’ शीर्षक कविता की इन पंक्तियों में इसे रेखांकित किया जा सकता है- ‘लटक रहा है सुख कितनों का आज खेत के गन्नों में/ भूखों के भगवान खड़े हैं दो-दो मुट्ठी अन्नों में/ कर जोड़े अपने घरवाले हमसे भिक्षा मांग रहे/ किंतु देखते उनकी किस्मत हम पोथी के पन्नों में/ जिसका जीवन ही खप जाता अपना दुखड़ा रोने में/ छोड़ एक आंसू वह क्या दे और आपको दोने में/ छोड़ क्षीरसागर को अब तो रहते हैं प्रभु और कहीं/ लेटे छप्पर-हीन कुटी के भीतर, खर पर, कोने में/ जिस बर्तन में छेद हो चुका देर न उसके चूने में/ इसीलिए थी दौड़-धूप रे इतनी उस दिन पूने में/ बिछड़े परिजन मिले, बढ़ाते हाथ प्रेम का मिलने को/ पर जाता सम्मान हमारा उन हरिजन को छूने में।’

नेपाली का विप्लव में विश्वास ‘रागिनी’ और ‘नवीन’ की कविताओं में और अधिक सुदृढ़ है और विद्रोह के पक्ष में उन्होंने अनेक कविताएं लिखी हैं। उदाहरण के लिए ‘रागिनी’ संग्रह की ‘विद्रोही’, ‘देश-दहन’, ‘जंजीर’, ‘टुकड़ी’, ‘अलख’, ‘जवानी’, और ‘भाई-बहन’ शीर्षक कविताएं देखी जा सकती हैं, जिनमें कवि के विद्रोही तेवर साफ-साफ दिखाई पड़ते हैं। जब कवि को 1944 में ही भारत के स्वतंत्र होने की आहट मिलने लगी, तो वह स्वतंत्र होने वाले राष्ट्र के नव-निर्माण की कल्पनाएं करने लगा। वह समता पर आधारित एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के सपनों को साकार करने में प्राणपण से लग गया, जिसकी अभिव्यक्ति उसके काव्य-संग्रहों में सर्जनात्मक स्तर पर परिलक्षित होती है।

‘नवीन’ कविता-संग्रह की अनेक कविताएं राष्ट्रीय आंदोलन के प्रति कवि के इसी दृष्टिकोण को प्रतिबिंबित करती हैं। उन्होंने इस कविता में नवीन कल्पना के साथ राष्ट्र-निर्माण के लिए तरुणाई का आह्वान किया- ‘तुम कल्पना करो, नवीन कल्पना करो/ तुम कल्पना करो!/ जिसकी तरंग लोल है, अशांत सिंधु वह/ जो काटता घटा प्रगाढ़, वक्र इंदु वह/ जो मापता समग्र सृष्टि, दृष्टि-बिंदु वह/ वह है मनुष्य जो स्वदेश की व्यथा हरे/ तुम यातना हरो मनुष्य, यातना हरो/ तुम कल्पना करो!’ अंतत: अनंत संघर्षों और बलिदानों के बाद देश स्वतंत्र हो गया। लोकतंत्र के रथ पर आरूढ़ होकर देश विकास की दिशा में अग्रसर भी हो गया। मगर स्वाधीनता के साथ जुड़े करोड़ों वंचितों के सपने साकार न हो सके। धनी-धनी होते चले गए, गरीब और गरीब। क्रांतिकारियों की कुर्बानियां व्यर्थ होती चली गर्इं। सच्चे जनपक्षधर कवि का मोहभंग हुआ और उसने लोकतंत्र की वास्तविकता से साक्षात्कार करते हुए ‘रोटियों का चंद्रमा’ शीर्षक कविता में लिखा- ‘दिन गए, बरस गए, यातना गई नहीं/ रोटियां गरीब की प्रार्थना बनी रहीं!/ एक ही तो प्रश्न है रोटियों की पीर का/ पर उसे भी आसरा आंसुओं के नीर का/ राज है गरीब का, ताज दानवीर का/ तख्त भी उलट गया, याचना गई नहीं/ रोटियां गरीब की प्रार्थना बनी रही!/ जो स्वयं भटक रहे, राह वह दिखा रहे/ जो रमे महल-महल, त्याग वह सिखा रहे/जग हुआ शहीद तो नाम वह लिखा रहे/पंच के प्रपंच की वंचना गई नहीं/ रोटियां गरीब की प्रार्थना बनी रहीं।’

आज किसानों की जिंदगी बद से बदतर हो रही है। किसान-आंदोलन के बिखराब से आहत नेपाली ने लिखा था-‘‘माली बोला, तुम जो चाहो, एक बात सब मिलकर बोलो/पंक्षी बोले, पिंजड़ा खोलो, मधुबन का दरवाजा खोलो!’ 1950 जुलाई में लिखी गई यह कविता नेपाली की दूरदर्शिता का प्रमाण है। जब कभी किसान और मजदूर अपने अधिकारों के लिए लड़ने को तत्पर हुए, उन्हें भटकाने के लिए कभी सर्वोदय तो कभी भूदान का आंदोलन चलाया गया। नेपाली ने ‘भू-दान के याचक से’ शीर्षक कविता में भू-पतियों के पक्ष में खड़े विनोबा के सामने ऐसे तर्कपूर्ण प्रश्न खड़े किए कि वे तिलमिला उठे। उनकी प्रखर दृष्टि ने इस आंदोलन के निहितार्थ को पढ़ लिया था।

जब 1959 के अप्रैल में चीनी सैनिकों ने सीमा पर गोलीबारी की, तो हमारे कुछ सैनिक शहीद हो गए। कवि की राष्ट्रीय चेतना हुंकार उठी और उसने ‘हिमालय ने पुकारा’ शीर्षक कविता लिखी और शासकों को इतिहास के प्रसंग में सजग होने के लिए प्रेरित किया। अंतत: 1962 में चीन ने देश पर आक्रमण कर दिया। ‘है भूल हमारी वह छुरी क्यों न निकाले/ तिब्बत को अगर चीन के करते न हवाले/ पड़ते न हिमालय के शिखर चोर के पाले/ समझा न सितारों ने घटाओं का इशारा/ चालीस करोड़ों को हिमालय ने पुकारा!’

कवि एक ओर राष्ट्र की अखंडता की रक्षा के लिए समर्पित रहा, तो दूसरी ओर सदियों से वंचित, शोषित, उपेक्षित और प्रताड़ित जनता के जीवन को और अधिक नारकीय बनाने वाली सत्ता और व्यवस्था से संघर्ष करता रहा। उसने किसी भी राजनीतिक दल के प्रति अपनी प्रतिबद्धता नहीं दिखाई तो यह स्पष्ट है कि बुर्जुआ लोकतंत्र में प्रगतिशील कहलाने वाली पार्टियां भी संसदीय अंतर्विरोधों का शिकार होकर अपने लक्ष्य से अंतत: भटकने लगती हैं। 1957 में ही नेपाली जी ने लिखा था- ‘अपनापन का मतवाला था, भीड़ों में भी मैं खो न सका/ चाहे जिस दल में मिल जाऊं, इतना सस्ता मैं हो न सका।’

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