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प्रसंगवशः हिंदी की वैश्विक स्वीकार्यता

विश्व की व्यापारिक जरूरतों और अपनी आंतरिक शक्ति के बल पर हिंदी विश्वभाषा के रूप में अपनी स्पष्ट पहचान बनाएगी।

Author October 28, 2018 5:59 AM
प्रतीकात्मक चित्र

हरीश कुमार सेठी

भाषा व्यक्ति, समाज और राष्ट्र की अस्मिता का निकष है। भाषा ही राष्ट्र संबंधी समस्त वैशिष्ट्य को स्थायित्व प्रदान करती है। भारत के संदर्भ में इस दायित्व का निर्वाह हिंदी कर रही है। इसने देश की अस्मिता की प्रतीक से ऊपर उठ कर विश्वभाषा के रूप में अपनी पहचान बनाई है। हिंदी विश्वभाषा की क्षमताओं से संपन्न भाषा है। हालांकि वैश्विक फलक पर अंग्रेजी, फ्रांसीसी और स्पेनिश आदि भी विश्वभाषा के रूप में व्यवहृत होती नजर आती हैं, पर विश्वभाषा बनने की इनकी प्रक्रिया हिंदी से भिन्न है। इन भाषाओं ने उन्नीसवीं शताब्दी के साम्राज्यवाद के आधार पर अपना प्रचार-प्रसार कर विश्वभाषा के रूप में अपनी पहचान बनाई। इससे पहले अठारहवीं सदी में ऑस्ट्रिया और हंगरी का वर्चस्व रहा। बीसवीं सदी में अमेरिका और सोवियत संघ का वर्चस्व रेखांकित किया जा सकता है। पिछली शताब्दी के पूर्वार्ध तक भारत गुलाम रहा और इसने भाषायी दबाव को झेला। लेकिन इस दौरान ‘हिंदी की अस्मिता’ दबावों में भी प्रखर रही। हिंदी के प्रति श्रमजीवियों की आत्मीयता ने इसे वैश्विक पहचान दिलाने में एक आधार प्रदान किया है।

किसी भी भाषा के वैश्विक होने के प्रमुख आधार हैं- प्रयोक्ता वर्ग की संख्या और भाषा की अंत:शक्ति तथा साहित्यिक कार्य। हिंदी प्रयोक्ताओं की संख्या में आश्चर्यजनक वृद्धि हुई है। चीनी के बाद यह सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा है। अंग्रेजी अपने प्रयोक्ताओं की घटती संख्या के कारण दूसरे से तीसरे स्थान पर आ चुकी है। विश्व के करोड़ों लोग हिंदी को स्वेच्छा से अपनाए हुए हैं। मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम, ट्रिनिडाड, गुयाना, केन्या, नाइजीरिया, दक्षिण अफ्रीका, थाईलैंड, इंडोनेशिया, चेकोस्लोवाकिया, सिंगापुर आदि देशों में हिंदी काफी लोकप्रिय ही नहीं, बोली भी जाती है। इसके अलावा, नेपाल, भूटान, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, म्यांमा, बांग्लादेश, मालदीव और श्रीलंका जैसे भारत के पड़ोसी देशों में हिंदी बोलने-समझने वाले भारतीयों की संख्या बहुत है। वहीं, दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों- इंडोनेशिया, मलेशिया, थाईलैंड, चीन, मंगोलिया, कोरिया, जापान आदि देशों में भी हिंदी का प्रचलन है। इनके अलावा अमेरिका, आॅस्ट्रेलिया, इंग्लैंड, कनाडा, जर्मनी आदि देश हैं, जहां अनेक भारतीय आजीविका और व्यापार की दृष्टि से बस गए और हिंदी का प्रयोग कर रहे हैं। अमेरिका में अंग्रेजी के अलावा हिंदी ही दूसरी सबसे लोकप्रिय भाषा का स्थान प्राप्त किए हुए है। इन देशों के अलावा अरब और अन्य इस्लामी देशों में भी हिंदी भाषा बोलने और समझने वाले काफी हैं।

भूमंडलीकरण के इस बाजारवादी दौर में हिंदी का जादू सिर चढ़ कर बोल रहा है। अपने उत्पादों के विज्ञापन में बहुराष्ट्रीय कंपनियां हिंदी का बड़े पैमाने पर उपयोग कर रही हैं। यह बाजार की सबसे शक्तिशााली भाषा के रूप में सामने आ रही है। एक सर्वेक्षण के अनुसार, विश्व में चार भाषाओं- अंग्रेजी, स्पेनिश, चीनी और हिंदी- का भविष्य ही वैश्विक बाजार में उज्ज्वल है। बाजार व्यवस्था की मांग है कि उपभोक्ता वर्ग के साथ संपर्क करने के लिए उनकी भाषा में संप्रेषण जरूरी है। इसलिए बहुराष्ट्रीय कंपनियों का झुकाव हिंदी की ओर बढ़ा है; वे अपने उत्पादों के विज्ञापन हिंदी में देती हैं। अमेरिका, कोरिया, जापान और रूस ही नहीं, अन्य देश भी हिंदी के अध्ययन-अध्यापन की ओर आकर्षित हो रहे हैं।

हिंदी के वैश्विक होने का दूसरा आधार इसकी अंत:शक्ति और साहित्यिक कार्य हैं। भारत की सभ्यता, संस्कृति, धर्म और दर्शन के रूप में भारतीय सांस्कृतिक गरिमा ने सदैव विश्व को आकर्षित किया है। विभिन्न आक्रमणों और विदेशी शासन के साथ उनकी भाषाओं के शब्द हिंदी भाषा में घुलते-मिलते गए और इसी प्रकार भारतीय भाषाओं के शब्दों का भी प्रसार उनकी भाषाओं में होता रहा। हिंदी भाषा में अरबी-फारसी आदि शब्दों के समावेश के मूल में भी यही कारण रहा है। यही स्थिति ब्रिटिश शासन के दौरान भी बनी रही, जो आज तक हमें अंग्रेजी के प्रभाव के रूप में नजर आती है।

संस्कृत, पाली, प्राकृत और अपभ्रंश के विकास मार्ग से होकर गुजरी हिंदी को जहां विरासत में इन भाषाओं का समृद्ध शब्द-भंडार मिला, वहीं इसने अरबी-फारसी, उर्दू, अंग्रेजी आदि अनेक भाषाओं के शब्दों को भी आत्मसात किया। खड़ी बोली हिंदी का विकास ब्रजभाषा, अवधी, मगही, बघेली, बुंदेलखंडी आदि बोलियों के संयोग से हुआ है। इसके अलावा बांग्ला, असमिया, गुजराती, मराठी, पंजाबी, उड़िया आदि आधुनिक भारतीय भाषाओं की आदिभाषा भी संस्कृत ही है। इसलिए हिंदी इनसे भी अंतसंर्बंधित भाषा है। वहीं, द्रविड़ परिवार की कमोबेश सभी भाषाओं में हिंदी समानार्थक और समान उच्चारण वाले शब्द पर्याप्त संख्या में मौजूद हैं। इस तरह, हिंदी भाषा के समृद्ध-संपन्न शब्द भंडार के मूल में हिंदी का लचीलापन प्रमुख कारण है, जिसकी वजह से आज हिंदी शब्द-संख्या की दृष्टि से संसार की सबसे समृद्ध भाषा मानी जाती है।

आज विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में विश्व में हो रहे तीव्र विकास के कारण नित नई संकल्पनाएं सामने आ रही हैं, नए-नए शब्द गढ़े जा रहे हैं, जिनके आधार पर हिंदी, अपने लचीलेपन के कारण शब्द भंडार विकसित कर रही है। शब्दों को आत्मसात करने की लचीली प्रवृत्ति के साथ-साथ उपसर्ग-प्रत्यय और संधि-समास आदि की सहायता से नित-नए शब्द गढ़ने में सक्षम भाषा के रूप में हिंदी ने अपने शब्द-भंडार में अतुलनीय वृद्धि की है। साहित्य सृजन की दृष्टि से भी देखें तो हिंदी में सुदीर्घ साहित्य-लेखन परंपरा रही है। पिछली बारह सौ वर्षों से चली आ रही इस परंपरा में साहित्य-सरिता का प्रवाह निरंतर प्रवहमान है। हिंदी ने विश्व को उत्कृष्ट साहित्यिक रचनाएं दी हैं। इसी के चलते हिंदी साहित्य को विश्व के श्रेष्ठतम साहित्य के रूप में देखा जाता है। विश्व के अनेक देशों में भारतीय मूल के हिंदी-प्रेमी साहित्यकार भी हिंदी में साहित्य सृजन कर हिंदी साहित्य भंडार को समृद्ध कर रहे हैं। हिंदी को वैश्विक पटल पर स्थापित करने में ‘गिरमिटिया’ बन कर यूरोपीय उपनिवेशों में बसे भारतीयों की भी बड़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। वहीं अनेक हिंदी-प्रेमी अप्रवासी साहित्यकारों ने हिंदी में साहित्य सृजन कर हिंदी के विकास में अपना अतुलनीय योगदान दिया या दे रहे हैं। हिंदी भाषा को अंतरराष्ट्रीय भाषा बनाने में भारतवंशियों और अप्रवासी भारतीयों की महत्त्वपूर्ण भूमिका है।

भारतीय साहित्य वैश्विक चेतना से संपन्न साहित्य भी है। आजादी से पहले जहां अनेक राजतंत्रों और संस्कृतियों के संपर्क से हिंदी में अन्य राष्ट्रों की संस्कृति से समरसता बनाने की प्रवृत्ति रही है, वहीं आजादी के बाद अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक पटल पर स्वर प्राप्त करने वाली संवेदनाएं हिंदी साहित्य जगत में मुखरित हुई हैं। पर्यावरण, आतंकवाद, स्त्री विमर्श, निरस्त्रीकरण, मानवाधिकार, दलित-उपाश्रित साहित्य जैसे आधुनिक चर्चित विषय विमर्शों पर आधारित रहे, जो मूलत: वैश्विक चेतना से युक्त हैं। साहित्य में इस प्रकार की चेतना का समावेश भी किसी भाषा के विश्वभाषा बनने का निमित्त सिद्ध होता है।

हिंदी में साहित्य सृजन के अलावा उसका विज्ञान-प्रौद्योगिकी आदि ज्ञान-विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में व्यवहार निरंतर बढ़ रहा है। आज हिंदी, अपने साहित्यिक स्वरूप से ऊपर उठ कर व्यावहारिक एवं प्रयोजनमूलक हो गई है। इस तरह हिंदी, समाज की बढ़ती जरूरतों को पूरा करने वाली भाषा बन कर उभर रही है। इसमें जनसंचार के माध्यम भी अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। आंकड़े बताते हैं कि इंटरनेट पर हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में पढ़ने-लिखने वाले लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही है। कंप्यूटर और इंटरनेट के क्षेत्र में पारंगत विद्वानों का यह मानना है कि सूचना-संचार प्रौद्योगिकी के लिए देवनागरी सर्वाधिक समर्थ लिपि है। हिंदी के इस प्रकार के व्यावहारिक प्रयोग का विस्तार, राष्ट्रीय अस्मिता के संदर्भ में गौरवानुभूति के विषय के साथ-साथ वैश्विक स्वीकार्यता को भी दर्शाता है।

इस आधार पर हिंदी संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा बनने की अधिकारिणी है। पर राजनीति और नौकरशाही की अंग्रेजी मानसिकता के कारण यह इस सम्मान से अब तक वंचित है। विश्वास है कि विश्व की व्यापारिक जरूरतों और अपनी आंतरिक शक्ति के बल पर हिंदी विश्वभाषा के रूप में अपनी स्पष्ट पहचान बनाएगी।

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