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निनाद : अतीत का तिलिस्म और गाजी मियां

पिछले कुछ दशकों से साहित्य में जादुई यथार्थ की बहुत चर्चा है। हमारे समाज में भी बहुत कुछ ऐसा है, जो जादुई यथार्थ जैसा ही लगता है। हमारे ही इर्द-गिर्द अनेक तरह के करिश्मे होते..

Author नई दिल्ली | November 18, 2015 11:50 AM

पिछले कुछ दशकों से साहित्य में जादुई यथार्थ की बहुत चर्चा है। हमारे समाज में भी बहुत कुछ ऐसा है, जो जादुई यथार्थ जैसा ही लगता है। हमारे ही इर्द-गिर्द अनेक तरह के करिश्मे होते रहते हैं और हमें उनका पता भी नहीं चलता। पता तब चलता है जब कोई विद्वान शोधकर्ता हमारी आंख में अंगुली डाल कर उसे दिखा नहीं देता। यहां जिस करिश्मे का जिक्र हो रहा है उसका संबंध जीवन से तो है ही, थोड़ा-बहुत हिंदी-उर्दू साहित्य से भी है।

उत्तर प्रदेश के बहराइच में हजरत सैयद सालार मसऊद गाजी की दरगाह है, जिस पर हर साल मेला लगता है। हजरत सैयद सालार मसऊद को गाजी मियां, बाले मियां, बाला पीर, पीर बहलीम और गजना दूल्हा के नाम से भी जाना जाता है। उनकी दरगाह पर भी उसी तरह हिंदू-मुसलमान मन्नत मांगने और अपनी श्रद्धा व्यक्त करने आते हैं जैसे वे अन्य सूफी संतों की दरगाहों पर जाते हैं। एक अर्थ में गाजी मियां भी उस मिलीजुली संश्लिष्ट संस्कृति के प्रतीक हैं, जिसे हम अक्सर गंगा-जमुनी तहजीब या साझा संस्कृति कहते हैं। गाजी मियां की याद में मेले बिहार और उत्तर प्रदेश के अनेक गांवों और कस्बों में लगते हैं। मेरे कस्बे नजीबाबाद में भी एक मेला लगता है, जिसे नेजे (भाले) का मेला कहते हैं। यह दरअसल गाजी मियां का ही मेला है।

ये मेले सदियों से लगते आ रहे हैं और चौदहवीं सदी में ही गाजी मियां की कीर्ति बंगाल तक फैल चुकी थी। पंद्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में दिल्ली के सुल्तान सिकंदर लोदी ने नेजे के मेलों पर प्रतिबंध लगाने की भी कोशिश की थी। मान्यता यह है कि सालार मसऊद गजनी के सुल्तान महमूद का भानजा था- उसी सुल्तान महमूद का, जिसे हम महमूद गजनवी के नाम से जानते हैं। यह शूरवीर जवांमर्द धर्मयोद्धा 1034 में, यानी अब से लगभग एक हजार साल पहले, सिर्फ उन्नीस साल की उम्र में बहराइच में शहीद हो गया। उसकी शान में न जाने कितने लोकगीत, लोककथाएं, वीरकाव्य और किस्से-कहानियां रचे गए। वे सभी लोकस्मृति में संचित हैं और आज भी गाए जाते हैं। 1290 में लिखे एक पत्र में अमीर खुसरो ने सिपहसालार शहीद की दरगाह की खुशबू सारे हिंदुस्तान में फैलने का जिक्र किया है। 1341 में प्रसिद्ध मोरक्कन यात्री इब्न बतूता दिल्ली के सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक के साथ बहराइच स्थित इस दरगाह पर मत्था टेकने गया था। गाजीपुर और गाजियाबाद इन्हीं गाजी मियां के नाम पर हैं।

यह सारी जानकारी मुझे प्रसिद्ध इतिहासकार शाहिद अमीन की सितंबर में प्रकाशित पुस्तक ‘कॉन्क्वेस्ट ऐंड कम्युनिटी: दि आफ्टरलाइफ ऑफ वारियार सेंट गाजी मियां’ से मिली है। ओरियंट ब्लैकस्वान द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक को पढ़ना एक विलक्षण अनुभव है, क्योंकि विद्वत्तापूर्ण शोध से समृद्ध यह पुस्तक वास्तविक अर्थों में अतीत की पुनर्रचना करती है और हमें लगता है कि हम किसी ऐसी तिलिस्मी दुनिया में पहुंच गए हैं, जहां एक तिलिस्म टूटता है तो दूसरा सामने आ खड़ा होता है। इस कहानी में जादुई यथार्थ का तत्त्व भी है, इसका पता भी इसी किताब से चलता है।

यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि सालार मसऊद नाम का यह उन्नीस वर्षीय सजीला शूरवीर तुर्क योद्धा ग्यारहवीं सदी के चौथे दशक में बहराइच में क्या कर रहा था? कहा जाता है कि वह अपने मामा महमूद गजनवी की ओर से हिंदू राजाओं के एक समूह से युद्ध कर रहा था और इस युद्ध में मारा गया यानी शहीद हो गया। 1620 के दशक में अयोध्या से तीस मील दूर रुदौली (उर्दू के मशहूर कवि मजाज भी यहीं के थे) में बैठ कर उत्तर भारत के प्रसिद्ध सूफी संत अब्दुर्रहमान चिश्ती ने गाजी मियां की ‘मीरात-ए-मसऊदी’ नामक प्रशस्तिपूर्ण जीवनी लिखी और उन्हें सुल्तान-ए-शुहदा यानी शहीद सम्राट की उपाधि से विभूषित किया। आज भी गाजी मियां लोकमानस पर छाए हुए हैं।

इस कहानी में जादुई यथार्थ तब प्रवेश करता है जब शाहिद अमीन हमें यह बताते हैं कि महमूद गजनवी का तो कोई भांजा ही नहीं था, जो अपने मामा का बदला लेने और इस्लाम को फैलाने भारत आता और बहराइच तक पहुंच जाता! फिर यह सालार मसऊद कौन है? कौन हैं ये गाजी मियां उर्फ बाले मियां उर्फ गजना दूल्हा? क्या यह शुद्ध लोकमानस द्वारा निर्मित व्यक्तित्व है, जिसके श्रद्धापाश में हिंदू और मुसलमान एक जैसे बंधे हुए हैं? सबसे दिलचस्प बात यह है कि गाजी मियां यानी बाले मियां गायों के संरक्षक हैं।

एक पेच यह भी है कि एक हिंदू राजा की पत्नी, जो खुद भी हिंदू है, लेकिन जिसे गाजी मियां पर रचे गए लोकगीतों और लोकगाथाओं में सती अमीना कहा गया है, गाजी मियां को अपना भाई मानती है। अमीना मुसलमानों के पैगंबर हजरत मुहम्मद की मां का नाम है। जाहिर है कि गाजी मियां की इस हिंदू बहन को अत्यधिक सम्मान देने के लिए उसे अमीना नाम दिया गया है और सती भी कहा गया है। गाजी मियां उसे जानते नहीं हैं। जंगल में शिकार खेलते हुए उन्हें और उनके साथियों (पांच पीर) को प्यास लगती है और वे इस हिंदू महिला के घर पहुंच जाते हैं।

भारतीय परिवारों में हाल तक किसी भी महिला के लिए सबसे अधिक खुशी का दिन वह होता था जब उसे अपने भाई के आने की खबर मिलती थी। गाजी मियां को आता देख कर इस हिंदू महिला (सती अमीना) को लगता है जैसे उसका भाई ही आ गया हो। वह उसे और उसके साथियों को पानी ही नहीं पिलाती, बल्कि उनके लिए खाना भी पकाती है और बाजार से नए पत्तल मंगवाती है, क्योंकि हिंदू घर के बर्तनों में तुर्क को खाना कैसे खिलाया जा सकता है? लोककवि इस दृश्य का चित्रण सती अमीना के इस संवाद से करता है: ‘उठो भैया, चरन पखारो, रसोई लेउ तुम खाई’।

लोककाव्य में गाजी मियां को ग्वालों और अहीरों का संरक्षक कहा गया है। वे स्थानीय राजाओं से ग्वालों की कुंआरी कन्याओं को भी बचाते हैं। इतिहासकार शाहिद अमीन का कहना है कि इसमें इतिहास का यह सत्य छिपा हो सकता है कि तुर्कों और ग्वालों (आजकल के यादव) ने मिल कर बहराइच के आसपास के इलाके के जंगलों का सफाया करके वहां खेती और गोपालन आदि शुरू किया हो। आज के समय में जब उत्तर प्रदेश और मणिपुर जैसे एक-दूसरे से भौगोलिक दृष्टि से बहुत दूर राज्यों में गोमांस खाने के संदेह पर ही किसी मुसलमान की पीट-पीट कर हत्या कर दी जाती हो और सभी मुसलमानों को गोमांस खाने वाला समझा जा रहा हो, गोरक्षक गाजी मियां तस्वीर का एक दूसरा ही पहलू पेश करते हैं।

माना जाता है कि अगर कोई गाय बचाने के लिए गुहार लगाता था, तो सैयद सालार मसऊद सब काम छोड़ कर उसकी मदद करते थे। लोक में प्रचलित मान्यता है कि गाय बचाने की गुहार सुन कर वे अपनी शादी के पीढ़े से भी उठ गए थे और मदद करने चल दिए थे।

मुझे पक्का यकीन है कि आज भी संकीर्ण सोच वाले लोग गाजी मियां के मिथक से बहुत खुश नहीं होंगे। शाहिद अमीन की इस किताब से पता चलता है कि प्रेमचंद की कहानी ‘पंच परमेश्वर’ 1916 में पहले उर्दू में छपी थी। उसमें बूढ़ी काकी पूरे गांव में सबसे मदद मांगती है, लेकिन कोई भी आगे नहीं आता। जब अलगू चौधरी भी, जो उस पर अत्याचार करने वाले जुम्मन शेख के लंगोटिया यार हैं, पंचायत में जाने में टालमटोल करते हैं, तो काकी सिर्फ इतना कहती है कि हमारे सैयद सालार तो गुहार सुन कर शादी के पीढ़े से उठ खड़े हुए थे। क्या कोई भी मेरी गुहार नहीं सुनेगा? लेकिन जब यह कहानी हिंदी में छपी, तब संभवत: संपादक ने इसमें से यह वाक्य निकाल दिया था। अब यह कहानी के किसी भी अनूदित रूप में नहीं मिलता।
क्या हम इस शांतिप्रिय धर्मयोद्धा के मिथक से कुछ सीख सकते हैं?

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