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आधी आबादी कॉलम में गायत्री आर्य का लेख : वैवाहिक बलात्कार कानून के अगर-मगर

निसंदेह भविष्य में ऐसा कानून जरूरी है, लेकिन सबसे पहले बहुत लंबी तैयारी के साथ ठोस जमीन तैयार किए जाने की सख्त जरूरत है। क्योंकि ये सदियों का व्यवहार है, जो पुरुषों के लिए बेहद सुविधाजनक है।

Author नई दिल्ली | Published on: June 12, 2016 3:06 AM
प्रतिकात्मक तस्वीर

पिछले दिनों महिला एवं बाल विकास मंत्री ने भारत में वैवाहिक बलात्कार को कानूनन अपराध ठहराए जाने की संभावना से इंकार कर दिया। उन्होंने कहा ‘दुनिया भर में वैवाहिक बलात्कार को जैसे समझा जाता है, उस तरह से भारत में नहीं समझा जा सकता। इसके पीछे शिक्षा का स्तर, निरक्षरता, गरीबी, सामाजिक संस्कार, धार्मिक विश्वास और विवाह को एक धार्मिक संस्कार मानना आदि कारण हैं।’ भारत में वैवाहिक बलात्कार पर बात शुरू करने से पहले यह जानना जरूरी है कि हमारे समाज में बलात्कार और वैवाहिक बलात्कार के पीछे क्या सोच है?

भारतीय दंड संहिता की धारा 375 के अनुसार ‘स्त्री की सहमति-इच्छा के बिना बलात यौन संबंध’ बनाना बलात्कार है। इस परिभाषा के आधार पर भारत में विवाह संस्था में बलात्कार का प्रतिशत काफी ज्यादा है। असल में बलात्कार जैसे घृणित काम को अभी तक भारतीय समाज किसी बाहरी व्यक्ति द्वारा किए गए अपराध के रूप में ही जानता-समझता है। हालांकि राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के हिसाब से 2014 में होने वाले कुल बलात्कारों में से 90प्रतिशत मामलों में घरवाले, रिश्तेदार, आस-पड़ोस के लोग शामिल थे। इसके बावजूद परिचित व्यक्तियों द्वारा की जाने वाली यौन हिंसा और बलात्कार को स्वीकारने की हिम्मत हमारे समाज में नहीं है। ऐसे में ‘वैवाहिक बलात्कार’ शब्द तो हमारे लिए और भी ज्यादा अटपटा और अस्वीकृत है।
भारतीय समाज में विवाह एक धार्मिक संस्कार है, जो पत्नी को पति की जरूरत और खुशियों के लिए हर समय तैयार रहने की सलाह, सुझाव और आदेश देता है। भारतीय पति-पत्नी जीवनसाथी नहीं होते। विवाह संस्कार पतियों को पत्नियों के ‘परमेश्वर’ का दर्जा देता है!

जाहिर है परमेश्वर को हक है कि वह अपने बंदे के साथ मनमर्जी सलूक करे। मन करे तो पुचकारे, मन करे तो दुत्कारे। मन करे तो संसर्ग करे, मन करे तो बलात्कार करे। इस बारे में यौन विशेषज्ञ प्रकाश कोठारी का कथन बेहद प्रासंगिक है कि ज्यादातर भारतीय मर्द अपनी पत्नियों को ‘स्लीपिंग पिल’ की तरह इस्तेमाल करते हैं! हालांकि, इस स्थिति में नई पीढ़ी में बदलाव आ रहा है, लेकिन अब भी उस सोच के पति ही ज्यादा हैं, जिनका मानना है कि पत्नी आजीवन उनकी खुशी, सुख-सुविधा और जरूरत का ध्यान रखने वाली एक सहायिका भर है!

असल में सिर्फ भारतीय विवाह संस्था ही नहीं बल्कि, कानून भी वैवाहिक बलात्कार की स्वीकृति देता हुआ सा दिखता है। कानूनन सोलह साल से कम उम्र की लड़की के साथ सहमति से बनाया गया यौन संबंध भी बलात्कार ही है। लेकिन अगर सोलह साल से कम उम्र की लड़की का बाल विवाह हुआ हो तो उसके पति द्वारा बनाया गया यौन संबंध बलात्कार नहीं माना जाता।

भारतीय समाज में वैवाहिक बलात्कार तो क्या, बलात्कार को भी सही परिप्रेक्ष्य में नहीं देखा जाता। यहां बलात्कार होते ही ‘इज्जत का प्रेत’ लड़की-स्त्री की देह छोड़कर भाग जाता है, जबकि विदेश में बलात्कार सिर्फ एक शारीरिक हमला माना जाता है। यूरोप या अमेरिका जैसे देशों में बलात्कार के बाद घर-परिवार, आस-पड़ोस में पीड़िता का जीवन उस तरह से मुश्किल नहीं होता जैसे कि अपने यहां।

बलात्कार के बाद इज्जत लुटने की सोच पूरी तरह सामंती है। कई सौ साल बाद अपनी विकसित चेतना से लड़कियां सोच पा रही हैं, कि ऐसे हादसे से जीवन कहीं ज्यादा बड़ा है और बलात्कार का उनकी इज्जत के प्रेत से कोई लेना-देना नहीं है!

असल में विवाह के भीतर और बाहर बलात्कार में दो बड़े फर्क हैं। अनजान व्यक्ति द्वारा बलात्कार से लड़कियों की इज्जत का पलीता हो जाता है, जबकि वैवाहिक बलात्कार में स्त्रियों की तथाकथित इज्जत बनी रहती है। बलात्कार से अक्सर लड़कियां भावनात्मक रूप से बेहद टूट जाती हंै, जबकि वैवाहिक बलात्कार में पत्नियां अक्सर यह सोचकर टूटने से बची रहती हैं कि पति को खुश और संतुष्ट रखना उनका पहला धर्म है! ऐसी भी बहुत सारी पत्नियां हैं जो पतियों के एकतरफे यौन संबंधों से बेहद त्रस्त रहती हैं, पर उनके पास कोई विकल्प नहीं होता।

बाल विवाह में धकेली गई छोटी लड़कियों को यौन शोषण से बचाने के लिए वैवाहिक बलात्कार को गैरकानूनी बनाने की प्रासंगिकता सबसे ज्यादा है। यह विडंबना ही है कि भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, सऊदी अरब आदि जिन देशों में बाल विवाह तुलनात्मक रूप से ज्यादा है, वहां वैवाहिक बलात्कार को आज भी गैरकानूनी घोषित नहीं किया गया है। जबकि पश्चिम के देशों में यह कानून बहुत पहले से लागू है। मलेशिया में 2007 में, तर्की में 2005 में, अमेरिका में 1970 में वैवाहिक बलात्कार को कानूनन अपराध घोषित किया गया था। यूरोप के अधिकांश देशों में 1990 में ही वैवाहिक बलात्कार कानूनन अपराध घोषित किया जा चुका है।

वैवाहिक बलात्कार को सिर्फ इस कारण से गैर कानूनी घोषित न करना बेहद गलत है कि यह विदेशी सोच है और भारतीय समाज और परंपरा का हिस्सा नहीं है। बुनियादी मानवीय अधिकार पूरी दुनिया में एक से होते हैं। वैसे भी भारतीय समाज ने खान-पान और पहनावे में दिल खोल कर दुनिया भर के चलन को अपनाया है।

हर एक समाज में हमेशा और ज्यादा मानवीय और लोकतांत्रिक होने की गुंजाइश होती है। असल में वैवाहिक बलात्कार पर कानून पति-पत्नी के बीच मित्रवत संबंधों की मांग करता है। यह बताना चाहता है कि पत्नी बन जाने भर से स्त्री का उसके अपने देह और दिमाग पर हक खत्म नहीं हो जाता। वैवाहिक बलात्कार का गैरकानूनी होना उन पतियों के पक्ष में जाता है, जो अपनी पत्नियों के साथ यौन-दासी जैसा व्यवहार करने की आजादी चाहते हैं।

निसंदेह भविष्य में ऐसा कानून जरूरी है, लेकिन सबसे पहले बहुत लंबी तैयारी के साथ ठोस जमीन तैयार किए जाने की सख्त जरूरत है। क्योंकि ये सदियों का व्यवहार है, जो पुरुषों के लिए बेहद सुविधाजनक है। रातोंरात पतियों को इस बात के लिए तैयार नहीं किया जा सकता, कि वे अपनी पत्नियों की इच्छा-अनिच्छा का सम्मान करें।

अचानक से वैवाहिक बलात्कार को कानूनी अपराध बनाने से भयंकर उथल-पुथल मच जाएगी और परिणाम कुछ नहीं आएगा। क्योंकि तब पतिगण घरों में कम जेल में ज्यादा मिलेंगे। हालांकि जो कह रहे हैं कि वैवाहिक बलात्कार कानून भारतीय परिवार व्यवस्था पर बहुत ज्यादा दबाव डालेगा, उन्हें यह समझने की जरूरत है कि अगर भारतीय परिवार पत्नियों के यौन शोषण की नींव पर ही टिके हैं तो उससे मुक्त हो जाना ही अच्छा।

पतियों को यह समझने की जरूरत है कि पत्नियां यौन दासी नहीं बल्कि साथी हैं। मूल सवाल वैवाहिक बलात्कार की समस्या के समाधान का है। इसके लिए समाज में बहुत सारे स्तरों पर लगातार विमर्श चलाए जाने की सख्त जरूरत है। जहां लड़कों-पुरुषों को इस बात के लिए तैयार किया जा सके कि पत्नी के संग यौन गुलाम की तरह व्यवहार सिर्फ गलत ही नहीं बल्कि पाप है!

बर्ल्व—वैवाहिक बलात्कार को सिर्फ इस कारण से गैर कानूनी घोषित न करना बेहद गलत है कि यह विदेशी सोच है और भारतीय समाज और परंपरा का हिस्सा नहीं है। बुनियादी मानवीय अधिकार पूरी दुनिया में एक से होते हैं। वैसे भी भारतीय समाज ने खान-पान और पहनावे में दिल खोल कर दुनिया भर के चलन को अपनाया है।

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