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अवसाद का दुश्चक्र

आज भारत ही नहीं बल्कि पूरा विश्व अवसाद से ग्रस्त है और इससे प्रभावित लोगों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है।

Author April 30, 2017 4:41 AM
अगर किसी देश में युवाओं की बड़ी संख्या शारीरिक या मानसिकरूप से बीमार हो जाए तो यह किसी अभिशाप से कम नहीं होता।

नाज ख़ान

यु वा किसी भी देश की रीढ़ होते हैं। युवाओं के लक्ष्य और सपने देश के भविष्य की दिशा तय करते हैं। अगर किसी देश में युवाओं की बड़ी संख्या शारीरिक या मानसिकरूप से बीमार हो जाए तो यह किसी अभिशाप से कम नहीं होता। आज पूरे विश्व में बेरोजगारी, प्रतिस्पर्धा, संघर्ष और एकाकी जीवन का बढ़ता चलन युवाओं को तनाव की तरफ धकेल रहा है। ऐसे में युवा अवसादग्रस्त हो रहे हैं। अवसादग्रस्त युवाओं की बढ़ती संख्या ने पूरी दुनिया को इस ओर सोचने पर विवश कर दिया है। पिछले दिनों आकाशवाणी के अपने कार्यक्रम ‘मन की बात’ में प्रधानमंत्री नरेंद मोदी ने भी अवसाद को अपना विषय बनाया और युवाओं से अवसाद की समस्या से लड़ने की बात कही। उन्होंने दुनिया के 35 करोड़ अवसादग्रस्त लोगों का जिक्र करते हुए युवाओं से इस प्रवृत्ति से लड़ने का आह्वान किया।

आज भारत ही नहीं बल्कि पूरा विश्व अवसाद से ग्रस्त है और इससे प्रभावित लोगों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। मोटे तौर पर देखें तो समझ में आता है कि अतिसंवेदनशील लोग ही अवसाद का शिकार बनते हैं, लेकिन आज भारत में कम उम्र के किशोरों से लेकर युवा और बढ़ती उम्र के लोग भी अवसादग्रस्त हो रहे हैं। इसे देखते हुए समझा जा सकता है कि इसके लिए कई आर्थिक, सामाजिक कारणों के अलावा भी कई अन्य कारण जिम्मेदार हैं। आज जहां तकनीक ने रोजमर्रा की कई चीजों को आसान बना दिया है। कंप्यूटर और स्मार्ट फोन ने कई सहूलियतें दी हैं। वहीं इनके बढ़ते चलन ने अपनापन भी छीन लिया है। नए युग में जहां जीवनशैली में बदलाव हुए हैं वहीं संयुक्त परिवारों का खाका नष्ट हुआ है। एकल परिवारों के इस बढ़ते चलन ने सबको अकेला कर दिया है।

शहरों की भाग-दौड़ भरी जिंदगी ने जहां बेहतर जिंदगी के विकल्प दिए हैं, वहीं अकेलेपन का एक धीमा जहर भी जिंदगी में घोलना शुरू कर दिया है। ऐसे में किशोर और बुजुर्ग अकेलेपन में जीने को मजबूर हुए हैं। उनकी दुनिया उन तक ही सिमट कर रह गई है और वे मानसिक तनाव से ग्रस्त हो रहे हंै। मानसिक तनाव और अकेलेपन ने उनके जीवन को नीरस बना दिया है। वहीं किशोरों के भी अवसाद से पीड़ित होने के मामले सामने आ रहे हैं तो इसकी वजह यही है कि उन्हें बेहतर माहौल नहीं मिल पा रहा। चाहे स्कूल हो या घर का माहौल, अक्सर उन्हें या तो नजरअंदाज किया जाता है या फिर उनकी बात सुनने-समझने का वक्त ही किसी के पास नहीं है। ऐसे में वह ड्रग या नशीली चीजें आदि लेने लगते हैं और उनमें अकेलेपन व उपेक्षा की वजह से हिंसक प्रवृत्ति बढ़ने लगती है।

आगे चल कर यही अवसाद का रूप ले लेती है। वहीं व्यस्त लोगों की भी अपनी दिक्कतें हैं। कभी काम का दबाव और कभी कार्यक्षेत्र में पिछड़ना उनके अवसाद का कारण बन रहा है। उनकी आर्थिक हितों की पूर्ति तो हो रही है, लेकिन घर-बाहर की इस भाग-दौड़ में उन्हें अपने लिए भी समय नहीं मिल रहा और वह तनावयुक्त जीवन जीने को मजबूर हो रहे हैं। यही वजह है कि इस समस्या को लेकर सम्पूर्ण विश्व चिंतित है और इस ओर कई प्रभावी कदम उठाए जा रहे हैं। इस ओर लोगों को जागृत करने के साथ ही कई सर्वे भी कराए जा रहे हैं ताकि वास्तविक स्थिति को जाना जा सके। एक स्वास्थ्य सर्वे में यह निकल कर आया था कि इसमें यह बात सामने आई कि 15-35 वर्ष की उम्र के लोगों की मृत्यु की एक बड़ी वजह अवसाद है। अक्सर अभाव से भरा जीवन और कठिन संघर्ष ही अवसाद का कारण हों ऐसा नहीं है। कई बार संपन्न लोग भी अवसाद से ग्रस्त होते हैं। इसका कारण कम सहनशक्ति के साथ ही अकेलापन और असफलता भी हो सकती है। शहरों की बढ़ती भीड़ के बावजूद लोग अकेलेपन से जूझ रहे हैं। आपसी मनमुटाव बढ़ रहे हैं और तलाक के मामले सामने आ रहे हैं। इस तनावयुक्त जीवन का असर अवसाद के रूप में सामने आ रहा है। मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि तेजी से बढ़ता शहरीकरण मनोवैज्ञानिक समस्याओं को बल दे रहा है। एक अनुमान के मुताबिक 2050 तक जहां भारत में तेजी से शहरीकरण हो चुका होगा, वहीं हताशा के बाद पनप रहे अवसाद के भी ढेरों मामले सामने होंगे।

वि श्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक भारत में अवसाद से ग्रस्त रहने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है। तेजी से बढ़ती इस समस्या को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने ‘डिप्रेशन आॅफ ग्लोबल क्राइसिस’ की संज्ञा दी है। हालिया एक अनुमान के मुताबिक भारत में हर वर्ष करीब 1.35 लाख लोग आत्महत्या को मजबूर हो रहे हैं और इसका बड़ा कारण अवसाद ही सामने आया है। 2016 में हुए एक शोध में पाया गया कि अवसाद का प्रभाव महिलाओं की मां बनने की क्षमता पर भी पड़ रहा है। अवसादग्रस्त महिलाएं सामान्य महिलाओं की तुलना में या तो देर से मातृत्व को प्राप्त करती हैं या फिर मां बनने के दौरान या बाद में उन्हें कई दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। मां के स्वास्थ्य का असर होने वाले बच्चे पर भी होता है, यह बात साबित हो चुकी है, लेकिन कुछ नए अध्ययन में यह तथ्य सामने आया है कि पिता के अवसाद का भी असर बच्चे पर पड़ता है। अवसाद से पिता की शुक्राणु की गुणवत्ता प्रभावित होती है और बच्चे का जन्म समय पूर्व होने की आशंका बनी रहती है और कई समस्याएं पनपती हैं। अक्सर अवसाद को मानसिक रोगों का कारण माना जाता है, लेकिन अवसाद एक ऐसी स्थिति है जो पूरे शरीर को ही प्रभावित करती है। इससे शरीर के कई अंग और ऊतक प्रभावित होते है। वहीं अवसाद पीड़ित व्यक्ति को दिल से संबंधित रोग व कैंसर जैसी बीमारियां होने का भी खतरा बना रहता है। तनाव को 20वीं सदी के सिंड्रोम की संज्ञा दी गई है। चिकित्सकीय भाषा में कहें तो तनाव किसी व्यक्ति की शारीरिक व मनोवैज्ञानिक कार्यप्रणाली को गड़गड़ा देता है। तनाव के कारण शरीर में एड्रीनलीन व कार्टिसोल हार्मोन का स्तर बढ़ता जाता है।

लगातार बनी रहने वाली यही स्थिति अवसाद में बदल जाती है। ऐसे कई लक्षण हैं जो किसी व्यक्ति के तनाव से अवसाद की तरफ बढ़ने की आशंका व्यक्त करते हैं। दुख, उत्तेजना का लगातार बने रहना, खुद को असहाय व अकेला महसूस करना, नकारात्मक सोच का प्रभाव, शरीर में ऊर्जा की कमी, लगातार थकावट का अहसास और नींद का कम आना अवसाद के लक्षण हैं। वहीं कुछ आनुवांशिक कारणों से भी अवसाद होने की आशंका बनी रहती है। विशेषज्ञों के मुताबिक किसी भावनात्मक आघात के कारण दो सप्ताह तक अवसाद में रहना सामान्य समझा जाता है, लेकिन अगर यह स्थिति लगातार बनी रहती है तब यह चिंता की बात है। महिलाओं में मेनोपॉज व हार्मोन परिवर्तन की स्थिति में भी अवसाद हो सकता है। इसके अलावा बचपन की कड़वी यादें, नकारात्मक अनुभव और कुछ दवाओं के दुष्प्रभाव से भी अवसाद होता है। इंडियन साइकाइट्रिक सोसायटी के मुताबिक अवसाद के दो कारण होते हैं, जैविक व अजैविक। जैविक अवसाद में दवाओं से उपचार किया जाता है। वहीं अजैविक अवसाद के निदान के लिए काउंसलिंग, योग के साथ जीवनशैली में बदलाव व अपनों के सहयोग की सलाह दी जाती है। अवसाद के कई और प्रकार भी हैं। इसमें मेजर डिपे्रसिव डिस्आॅर्डर और डीस्थ्यिमिक डिस्आॅर्डर मुख्य हैं। इसके अलावा सायकोटिक डिप्रेशन व बाइपोलर डिस्आॅर्डर भी अहम हैं। दवाओं के जरिए किए गए मानसिक उपचार को फार्मेकोथेरेपी कहा जाता है। वहीं साइकोथेरेपी का उपयोग मानसिक रोगों व भावनात्मक आघातों से पीड़ित व्यक्ति के लिए किया जाता है।

लं बे समय तक अवसाद का रहना जहां कई तरह की बीमारियों को दावत देता है, वहीं आत्महत्या की भावना को भी बढ़ाता है। व्यक्ति निराशा में डूब जाता है। उसे अन्य विकल्प दिखाई नहीं देते और वह समस्याओं का निदान मृत्यु में खोजने लगता है। कुछ आंकड़े बताते हैं कि भारत में करीब हर चार मिनट में एक व्यक्ति आत्महत्या को विवश होता है। एक अनुमान के मुताबिक आत्महत्या करने वालों में करीब 40 फीसद संख्या युवाओं की होती है। भयावह स्थिति यह है कि यह आंकड़ा बढ़ता जा रहा है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक युवाओं में बढ़ती आत्महत्या की प्रवृत्ति का अहम कारण अवसाद है। एक ऐसा रोग है जो व्यक्ति की सोचने-समझने की शक्ति को प्रभावित करता है और जीवन को नष्ट कर देता है। दरअसल, आज अवसाद इसलिए भी पैर पसार रहा है, क्योंकि लोग अपनी समस्याओं पर बात करने से बचते हैं। जीवन के कड़वे अनुभव उन्हें किसी पर भरोसा करने नहीं देते और वह अपनी परेशानी किसी से बांटते भी नहीं। वहीं परिवार में भी अक्सर अवसादग्रस्त लोगों की मानसिक स्थिति को समझने की कोशिश नहीं की जाती और किसी तरह के अवसाद को बीमारी नहीं समझा जाता। इसका नतीजा यह होता है कि अवसादग्रस्त लोगों में से करीब दस फीसद लोग ही डॉक्टर के पास जाते हैं।

जहां भारत में मानसिक चिकित्सकों की संख्या रोगियों के लिहाज से काफी कम है। वहीं यहां स्वास्थ्य पर जीडीपी का सबसे कम प्रतिशत खर्च होता है। मगर इसके विपरीत भारत सहित पूरे विश्व में फार्मास्युटिकल कंपनियों के लिए सबसे बड़ा बाजार एंटीडिप्रेसेंट यानी अवसाद दूर करने वाली दवाओं का है। भारत में भी इन दवाओं का चलन तेजी से बढ़ रहा है। एंटी डिप्रेसेंट दवाएं सबसे पहले 1950 में चलन में आर्इं। 1990 के दशक से इनके चलन में वृद्धि हुई। अकेले अमेरिका में ही इनकी खपत करीब एक तिहाई है। कुछ शोध बताते हैं कि अवसाद के लिए ली जाने वाली दवाएं जहां कुछ बदलाव करती हैं वहीं इनके साइड इफ्ेक्ट भी सामने आते हैं। ‘दि वाल स्ट्रीट’ जर्नल में प्रकाशित एक विश्लेषण के मुताबिक अवसादरोधी दवाओं के इस्तेमाल से आत्मघाती प्रवृत्ति दोगुनी पाई जाती है। आज भारत सबसे युवा देश है मगर यह भी सच है कि यहां लाखों युवा बेरोजगारी का दंश झेल रहे हैं। उनकी कमजोर आर्थिक स्थिति की वजह से उनके संबंधों में भी कड़वाहट आ रही है। इस सबका सीधा असर दिलो-दिमाग पर पड़ रहा है। हालांकि कुछ चिकित्सकीय कारणों से भी अवसाद हो सकता है या फिर थायरॉइड का कम सक्रिय होना भी अवसाद को बढ़ा सकता है। महिलाओं के अवसादग्रस्त होने की ज्यादा आशंका रहती है तो इसकी वजह यही है कि प्रतिदिन घर के उसी माहौल और समस्याओं से घिरे रहने के कारण उनमें तनाव रहने लगता है। हालांकि पुरुषों में महिलाओं की तुलना में अवसाद होने की आशंका करीब आधी होती है। मगर वहीं आत्महत्या करने की प्रवृत्ति महिलाओं की तुलना में पुरुषों में अधिक देखी जा रही है। काम का लगातार दबाव और असफलता उनकी मानसिक उलझनों को बढ़ाती है। यही वजह है कि जिन पुरुषों में चिड़चिड़ापन व बात-बात पर गुस्सा आता हो और जो अधिक भावुक हों उनके अवसादग्रस्त होने की आशंका अधिक रहती है। वहीं महिलाओं में अवसाद की एक वजह हार्मोन भी है। महिलाएं अधिक संवेदनशील होती हैं, इसलिए भी वह जल्दी अवसादग्रस्त हो जाती हैं। कई बार बच्चे को जन्म देने के बाद भी महिलाओं में अवसाद हो सकता है।

फरवरी, 2017 की विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में करीब पांच करोड़ लोग अवसाद से ग्रस्त हैं। ‘अवसाद व मानसिक विकार’ नाम की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि 2015 में आत्महत्या करने वाले करीब दो तिहाई लोगों को अवसाद से पीड़ित बताया गया है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि पूरे विश्व में अवसाद से ग्रस्त लोगों की संख्या करीब 32.2 करोड़ से भी अधिक है। इन मामलों में भारत और चीन सबसे आगे हैं। इसके मुताबिक 2005 से 2015 तक अवसादग्रस्त लोगों की संख्या 18.4 फीसद बढ़ी है। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के एक अध्ययन में कहा गया कि प्राकृतिक आपदाओं व दुर्घटनाओं से प्रभावित लोगों में से करीब 90 फीसद लोग मानसिक संतुलन खो बैठते हैं। वहीं बढ़ती महंगाई और कई आर्थिक, सामाजिक समस्याओं के कारण भी भारत में लोग तेजी से अवसाद की तरफ बढ़ रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की ‘इन्वेस्टमेंट इन हेल्थ रिसर्च एंड डेवलपमेंट’ नाम की रिपोर्ट में यह आशंका जताई गई है कि आने वाले समय में विकासशील देशों में अवसाद विकलांगता के प्रमुख कारण के तौर पर उभर सकता है। 2020 तक भारत में अवसाद दूसरी आम बीमारी हो जाएगी।

अवसाद से निकलने के लिए जहां दिनचर्या में बदलाव जरूरी है, वहीं भावनात्मक संबल, अच्छा माहौल व चिकित्सकीय सलाह भी अहम है। इसके अलावा दोस्तों का साथ, घूमने जाना और व्यस्त रहना भी तनाव व अवसाद से दूर रखता है। इसके अलावा कुछ जरूरी आहार लेकर भी अवसाद को दूर किया जा सकता है। इसके लिए मछली, पालक और बादाम आहार में शामिल कर सकते हैं। इनमें ओमेगा-3 फैटी एसिड, आयरन मैग्नीशियम होता है जो दिमाग को शांत रखने व पाचन तंत्र को मजबूत करने में मद्द करता है। वहीं टमाटर में पाया जाने वाला लाइकोपीन एंटीआॅक्सिडेंट भी अवसाद से लड़ने में मद्दगार होता है। कुछ शोधों से साबित हुआ है कि जो लोग सप्ताह में दो या इससे अधिक टमाटर खाते हैं उनमें अवसाद होने की आशंका घट जाती है। हाल में, हुए एक शोध में यह खुलासा किया गया है कि जो लोग पेड़-पौधों और हरियाली से घिरे वातावरण में रहते हैं व जिनके आस-पास पक्षी अधिक होते हैं वे अन्य लोगों की तुलना में अधिक खुश रहते हंै। उन्हें अवसाद, तनाव व चिंता जैसी समस्याओं का अनुभव कम होता है। अक्सर यह देखा भी गया है कि एकाकी जीवन जीने वाले लोग पशु-पक्षियों व प्रकृति के करीब जीना पसंद करते हैं और यह स्थिति उन्हें खुश बनाए रखती है। १
जीवनशैली में बदलाव

जिस तरह अवसाद के लिए कई परिस्थितियां और कारण जिम्मेदार होते हैं उसी तरह जीवनशैली के साथ कुछ अन्य बदलाव लाकर भी अवसाद को दूर करने में मद्द मिल सकती है।

एक : अवसाद को संगीत चिकित्सा की सहायता से भी कम किया जा सकता है। अक्सर देखा गया है कि तनाव को कम करने के लिए लोग संगीत सुनने लगते हैं। यह बात कई वैज्ञानिक शोध से भी साबित हो गई है कि संगीत से अवसाद का स्तर काफी कम हो जाता है।

दो : साइकोथेरेपी की मदद से नकारात्मक विचारों से काफी हद तक बचा जा सकता है। वहीं विचारों में बदलाव के लिए किताबें पढ़ने के विकल्प को भी चुना जा सकता है।

तीन : अक्सर अवसाद इसलिए भी होता है कि व्यक्ति अपनी भावनाएं व्यक्त नहीं कर पाता। इसके लिए डायरी लिखने की आदत सुकून देती है और मानसिक तनाव में कमी आती है।

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