चलो घूमने गांव चलें, भारतीय पर्यटन का आकार और राज्यों में ग्रामीण पर्यटन

भारत में पर्यटन उद्योग तेजी से फैल रहा है। अब इसकी सीमा सिर्फ पहाड़ों, ऐतिहासिक स्थलों और तीर्थस्थलों तक सीमित नहीं रह गई है। ग्रामीण पर्यटन के क्षेत्र में भी तेजी से विकास हो रहा है। केंद्र और राज्य सरकारें भी इसे प्रोत्साहित कर रही हैं। शहरों से ऊबे-उकताए लोगों को गांवों का आकर्षण खींच रहा है। वे वहां जाकर ग्रामीण संस्कृति से परिचित होते, कुछ दिन वहां की जिंदगी का अनुभव लेते और बहुत कुछ जान-समझ कर तृप्त होते हैं। ग्रामीण पर्यटन के बारे में बता रही हैं अनीता सहरावत।

प्रतीकात्मक तस्वीर।

जरा सोचिए कि किसी सुबह खुले आसमान के नीचे पंछियों की चहचहाहट से नींद टूटे, खिड़की से सूरज झांके, चूल्हे की सुलगती आंच पर हांड़ियों में पकते भोजन की महक आ रही हो, कुल्हड़ की चाय में घुली मिट्टी की सोंधी महक नथुनों से होकर सीधे दिलो-दिमाग में समा जाए, लोग ट्रैक्टर, बैलगाड़ी लेकर खेतों का रुख कर रहे हों, कहीं औरतें दही मथ रही हों, तो कहीं सिर पर पानी के घड़े उठाए टोलियां गीत गाती भोर का स्वागत कर रही हों। कवि की कल्पना से ज्यादा सुरमई, चित्रकार की कल्पना से कहीं ज्यादा रंगीन और चटकीला ऐसा अनुभव किसी भोर में मिले, तो उन पलों की अदायगी किसी और चीज से संभव कहां? शहर की पक्की सड़कों और ऊंची इमारतों की घुटन में फंसे लोगों के लिए तो यह किसी संजीवनी से कम नहीं। लेकिन इस अनुभव के लिए अब ज्यादा भटकने की जरूरत नहीं है, गांवों की सैर का यह नया विकल्प ‘टूरिस्ट डेस्टिनेशन’ की सूची में तेजी से ऊपर आ रहा है। विलेज टूरिज्म, फार्म स्टे टूरिज्म, इको-फ्रेंडली टूरिज्म सरीखे कई नाम हैं इस देसी अनुभव के।

छुट्टियां यानी मौजमस्ती, सैर-सपाटा और ढेर सारा मनोरंजन। मनोरंजन को रोज नई परिभाषाएं देता है बाजार, क्योंकि कुछ अलहदा अनुभव की चाहत समेटे ही पर्यटक झोला उठा कर दुनिया का चक्कर काटते हैं। कई किलोमीटर का थका देने वाला सफर तय करते हैं। ऐतिहासिक स्थलों, पहाड़ी इलाकों का बेशक अपना रोमांच है, लेकिन वहां पर्यटक केवल नजारों से जी भर सकता है, दर्शक से ज्यादा भूमिका की गुंजाइश यहां नहीं मिलती। ऐसी जगहों पर बच्चे सबसे ज्यादा ऊब महसूस करते हैं, क्योंकि उनके करने के लिए वहां ज्यादा कुछ होता नहीं। यात्राएं यादगार होनी चाहिए, उबाऊ नहीं। घुमक्कड़ों की इसी नीयत को भांप कर ग्रामीण पर्यटन नए विकल्प के रूप में बच्चों और बड़ों, सबको लुभा रहा है। मनोरंजन, ऐसा चूर्ण है जिससे पेट भले न भरे, लेकिन यादों में इसका चटखारा और जायका लंबे समय तक बना रहता है। और बाजार बड़ा अजब है, इसके पास सबके लिए कुछ न कुछ है, वह बेकार को भी काम पर लगा सकता है। यहां सब बिकता है, यहां सब खरीदा जा सकता है। यात्रियों में गांव की कसक भांप कर ‘विलेज टूरिज्म’ के जरिए मनोरंजन का यही चूर्ण बांट रहा है बाजार। यह भी सच है कि गांवों को शहरी चकाचौंध आकर्षित करती है, तो शहरों को गांवों की सादगी लुभाती है। आज के शहर कल के गांव ही थे, शायद यही वजह है कि ग्रामीण पर्यटन के विचार को बाजार और लोगों ने हाथोंहाथ लपका है। विलेज टूरिज्म यानी गांवों की सैर, खानपान और रहन-सहन का ठेट देसी तरीका और आपके-हमारे बचपन के पुराने खेल। बड़ों के लिए एक झरोखा है अपने अतीत में झांकने का, तो बच्चों को मौका मिलता है गैजेट्स और कमरे से बाहर आकर खेलने का।

कोस कोेस पर बदले पानी, चार कोस पर बानी। हमारा देश विविधता से भरा है, और यह विविधता गांवों से ही आती है। हर राज्य की जलवायु, संस्कृति, रहन-सहन, खान-पान दूसरे से जुदा है, जो पर्यटन के लिहाज से सबसे जरूरी चीज है। जो चीजें कभी गांवों की कमजोर कड़ी होती थी और उसे शहरोें और विकास से अलग-थलग पटक देती थी, वही आज उनका मजबूत पहलू बन कर उभर रही है। ग्रामीण पर्यटन की शुरुआत की कोई तय तारीख नहीं मिलती। दुनिया भर में लोग दैनंदिन जीवन से बाहर आकर कुछ नया करने की चाह में शहरों से गांवों का रुख करते रहे हैं। हमारे यहां भी यह चलन नया बिल्कुल नहीं है, लेकिन तकरीबन पिछले दो दशक में इस विचार ने लोगों को और ज्यादा आकर्षित किया है। होटल और रिसॉर्ट मालिकों ने ग्राहकों की इस नब्ज को सबसे पहले पढ़ा। उसके बाद स्थानीय समुदाय की मदद से इसे व्यावहारिक रूप-रंग मिला। भारत की हस्त-कला, शिल्प-कला, दस्तकारी की दुनिया भर में मांग है और ग्रामीण यात्रा के विचार ने कारीगरों को सीधे बाजार और ग्राहक से जोड़ दिया। अच्छी बात यह है कि इसका फायदा स्थानीय लोगों को भी मिल रहा है और आजीविका कमाने के लिए उन्हें न तो शहरों की ओर भागने की जरूरत है और न ही किसी खास तरह के प्रशिक्षण और निवेश की। होटल और रिसॉर्ट मालिक स्थानीय लोगों को साझीदार बना कर इससे अच्छा-खासा मुनाफा कमा रहे हैं। हांलाकि ग्रामीण पर्यटन एक विस्तृत विचार है, जिसे अकेले व्यावहारिक बनाना होटल या फार्म मालिकों के वश की बात नहीं। इसलिए स्थानीय लोगों और समुदाय की भागीदारी इसकी सबसे जरूरी शर्त है।

ग्रामीण पर्यटन काफी हद तक घुमक्कड़ों के अपने नजरिए की दुनिया है। मसलन, कृषि पर्यटन खेती-बाड़ी के शौकीन लोगों को कृषि के बदलते रूपों से रूबरू कराता है, जिसका व्यावहारिक अनुभव वे खुद खेतों में काम करके लेते हैं। यह मजेदार तो है ही, इससे काफी कुछ नया भी सीखने को मिलता है। वहीं खाने के शौकीन इसमें अलग-अलग जगहों के स्वाद चखते हैं। प्राकृतिक सुंदरता के रसिक और पक्षी प्रेमियों को ‘इको-टूरिज्म’ प्रकृति की गोद में समय बिताने का अच्छा मौका देता है। ऐसे में खुले खेत-खलिहानों की सैर का विचार खूब फल-फूल रहा है। यात्रियों को जहां गांव के लोगों की जिंदगी में झांकने का मौका मिलता है, वहीं गांव के लोग भी शहरी जीवन के अनुभवों के साझीदार होते हैं। गांव, जहां लोग आज भी पुराने तरीके से सादा-सरल जीवन बसर कर रहे हैं। यहां पर्यटक रूबरू होते हैं जीवन के ऐसे पहलू से, जहां सुख-सुविधाएं कम होने के बावजूद लोगों में बेचैनी नहीं है। शाम ढलते-ढलते गांव में पसरते सन्नाटे में डर नहीं, शांति होती है। गोबर के लिपे-पुते घर शहरों के चमकते घरों को चिढ़ाते हैं। मेट्रो शहरों में फ्लैटों, बंगलों में रहने वाले लोगों को अपने पड़ोसी के मरने की खबर नहीं लगती और गांवों में रहने वाले इन लोगों को अपने पूरे गांव का हालचाल मुंहजबानी रहता है। ऐसा नहीं कि शहर में रहने वाले लोग जीवन के इस पहलू से अनजान हों। हर शख्स की जड़ें कहीं न कहीं किसी गांव से जुड़ी हैं, आज के शहर किसी गांव की छाती पर ही खड़े हैं। बच्चों के करिअर और अपने रोजगार की मजबूरी के चलते ही लोग शहरों का दमघोंटू माहौल झेलते हैं। ऐसे में ग्रामीण पर्यटन अपनी जड़ों को फिर तलाशने जैसा है। शहरों में जन्मे और पल-बढ़ रहे बच्चों को भी स्थानीय लोगों के इस जीवन और पहलू का अंदाजा किताबों से बाहर का जरूर होना चाहिए।

भारतीय पर्यटन का आकार

भारत मे पर्यटन सबसे बड़ा सेवा क्षेत्र है। विश्व भ्रमण और पर्यटन कांउसिल के मुताबिक साल 2018 में पर्यटन क्षेत्र ने जीडीपी में 16.91 लाख करोड़ रुपए का योगदान किया और लगभग 42.673 लाख नए रोजगार पैदा किए । 2028 तक इसके सालाना 6.9 प्रतिशत की दर से बढ़ने का अनुमान है, जो संकेत है कि रोजगार और आमदनी के नजरिए से सरकारी खजाने के साथ ही लोगों की जेब को भी फायदा मिलेगा। पर्यटन मंत्रालय के मुताबिक पर्यटन का कोई भी ऐसा प्रारूप, जो ग्रामीण जीवन, कला, ग्रामीण अंचलों में मौजूद सांस्कृतिक विरासत, जिससे स्थानीय लोगों को आर्थिक और सामाजिक मजबूती दे। साथ ही यादगार अनुभव के लिहाज से स्थानीय लोगों और यात्रियों के बीच बातचीत और सहजता का माहौल पनपे, वह ग्रामीण पर्यटन कहलाएगा। राज्य सरकारें भी पर्यटन के इस नए रूप को अपने-अपने तरीके से विकसित करने मे जुटी हैं। क्योंकि इससे ग्रामीण लोगों को रोजगार का नया विकल्प मिला है। नौकरी के लिए युवाओं का गांवों से पलायन राज्य सरकारों के लिए एक बड़ी समस्या है। दो-टूक बात यह कि कृषि से रोजी-रोटी का गुजारा तो हो सकता है, लेकिन बढ़ती जरूरतों के सामने नफे का सौदा खेती अब नहीं रही। इसके चलते बड़ी तादाद में लोग शहरों का रूख करने लगे, रोजगार के लिहाज से गांवों से युवाओं और किसानों का पलायन रोकने में इस चलन ने काफी सहारा दिया है। इस क्षेत्र में संभावनाओं को भांपते हुए ही राज्य सरकारें इसे पर्यटन और नागरिक उड्डयन मंत्रालय की अतुल्य भारत बिस्तर और नाश्ता योजना के तहत लागू कर रही हैं। इसके नियम-कायदे भी काफी सरल हैं। सरकारी गाइडलांइस पूरी करके स्थानीय लोग भी इस योजना से कमाई कर सकते हैं। एहसास भले ही देसी हो लेकिन ए टूरिस्ट हब तमाम आधुनिक सुख-सुविधाओं से लैस है, इसके अलावा बिजली, पानी, चिकित्सा सुविधाओं की मदद के जरिए सरकारें निजी क्षेत्र को निवेश के लिए भी प्रोत्साहित कर रही हैं।

राज्यों में ग्रामीण पर्यटन

हिमाचल प्रदेश

ठंडे और पहाड़ी इलाके का जिक्र होेते ही सबसे पहले हिमाचल जेहन मे आता है, लेकिन गिने-चुने इलाकों के अलावा इस क्षेत्र को अब तक खोजा कम ही गया है। लेह, लद्दाख की बर्फीली घाटियों का एहसास देती सिप्टी घाटी पर्यटन को कुछ नए अनुभव जरूर देगी। याक सफारी, सांस्कृतिक कार्यक्रम, बौद्ध मठों की सैर, ग्रामीण रिहाइश के कई विकल्प यहां मिल जाएंगे। कला के शौकीनों के लिए कांगड़ा घाटी का गुनेहर गांव है। यहां की कला दीर्घा कला-प्रेमियों को भारत-जर्मन कला से लुभाती है। पर्यटकों को गांवों से जोड़ने के लिए हिमाचल प्रदेश सरकार होम स्टे स्कीम 2008 चला रही है, जिसके तहत देसी और विदेशी पर्यटक गांवों के लोगों के साथ उनके घरों मे रहने, खाने-पीने, दैनिक जीवन में हिस्सेदारी का मौका मिलता है। बेशक यह विचार और नया अनुभव लोगों को लुभाने में कामयाब भी रहा है। ग्रामीण पर्यटन में संभावनाओं का नया बाजार खुल रहा है और हर राज्य सरकार इसका फायदा अपने लोगों को पहुंचना चाहती है, जिसके लिए निजी क्षेत्र और स्थानीय लोगों की मदद के लिए अपने स्तर पर योजनाएं और स्कीमें लागू कर रही हैं।

हरियाणा
इसके अलावा हरियाणा सरकार भी फार्म टूरिज्म और रूरल टूरिज्म के जरिए ग्रामीण लोगों के रोजगार के अवसर तलाश रही है। ग्रामीण पर्यटन का ही मिनी रूप है फार्म-टूरिज्म। जो लोग घर से ज्यादा दिन बाहर नहीं रह सकते, उनके लिए यह फार्म स्पॉट राहत है। दिल्ली एनसीआर से नजदीकी के कारण पर्यटकों की अच्छी-खासी भीड़ रहती है। प्रतापगढ़ फार्म और रिसार्ट, लोहागढ़ फार्म, सुर्जिवन फार्म, पीपल कोठी फार्म, बानी खेड़ा फार्म, रत्तन गढ़ सरीखे कई फार्म बेहतरीन स्थल हैं। यहां हर उम्र के लोगों के मनोरंजन के लिए कुछ न कुछ है। इस विचार की सफलता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि हरियाणा राज्य के हर कोने पर ऐसे ‘फार्म टूरिज्म डेस्टिनेशन’ के ढेरों विकल्प मिल जाएंगे। पुराना अनुभव देते ये आधुनिक पिकनिक स्पॉट हैं, जहां आप अपने बचपन में लौट सकते हैं। बच्चों को अपने खेल खिला सकते हैं। गिल्ली-डंडा, पिट्ठू, कंचे, पतंगबाजी, गुलेल, सैक-रेस, आंख-मिचौली, तीरंदाजी सरीखे अनेक खेल के साथ बच्चों का रोमांच कुलांचे भरता है। ये काल्पनिक गांव हैं, जहां देसी अनुभव का सारा साजो-सामान है। यहां लुहार है, तो मिट्टी को गढ़ते कुम्हार भी हैं, बैलगाड़ी, ऊंटगाड़ी, टैक्टर की सवारी का पूरा मजा यहां पर्यटकों को मिलेगा। देसी हस्तकला का सामान बुनती-बनाती महिलाएं भी होंगी, तो ढोल, नगाड़ों की थाप पर देसी गाने, रागनियां गाकर लोकगायक पर्यटकों को लुभाते भी नजर आएंगे। तमाम आधुनिक सुख-सुविधाओं से लैस इन टूरिस्ट केंद्रों में यात्रियों की सहूलियत का भी पूरा खयाल रखा जाता है।

गुजरात
गुजरात के कच्छ जिले के होडका गांव को साल 2008 का सर्वश्रेष्ठ पर्यटन आय उत्पादित करने वाले समुदाय का पुरस्कार मिला। इसके अलावा हिमाचल प्रदेश में कुल्लू जिले के नागर गांव को स्त्री सशक्तिकरण की मिसाल का पुरस्कार दिया गया। ये दोनों पुरस्कार अपने आपमें इसलिए खास हैं कि हमारे यहां सबसे ज्यादा चुनौती ग्रामीण लोगों को रोजगार और आमदनी की होती है, और औरतों का काम आमदनी की गिनती में कम ही आता है। पर्यटन के गांवों की ओर रुख से यह सूरत अब बदल रही है। घुम्मकड़ जगहों की सूची में जबसे ग्रामीण पर्यटन ने अपनी मौजूदगी दर्ज की है, गांवों ने टूरिस्ट नक्शे पर जगह बनानी शुरू कर दी है। इंटरनेट पर क्लिक करते ही लोकेशन में लाल झंडियां नजर आने लगती हैं। आराम छोड़ कर कुछ नया तलाशने, अनुभव करने के शौकीन कुछ जगह जरूर आजमा सकते हैं। मसलन गुजरात के कच्छ के रण की सैर, नमक के रेगिस्तान के अलावा स्थानीय कला से रूबरू हो सकते हैं। सीमा से सटे शाम-ए-सरहद रिसॉर्ट पर शाम ढलने का मजा लें, या चाहे तो होडका गांव के किसी निवासी की मेहमाननवाजी को आजमाएं। ग्रामीण लोगों के अपने रिश्तेदारों की तरह यात्री यहां गांव के किसी निवासी के साथ भी रह सकते हैं। पर्यटक अपनी सहूलियत से रिसॉर्ट के आरामदेह टेंट में सोएं या फिर तारों की छांव में चारपाई पर करवटें लें।

पंजाब
पंजाब को भारत का भोजन कटोरा कहा जाता है। यहां का रुख कर रहे हैं तो सिर्फ अमृतसर और स्वर्ण मंदिर तक न सिमटें। इसके आसपास कई रिसॉर्ट और लॉज हैं, जो पंजाबियत का एहसास देने के लिए खासतौर पर तैयार किए गए हैं। खेतों में बने मिट्टी के घर यहां के स्थानीय लोगों की कारीगरी का एहसास कराते हैं। यहां यात्री चाहें तो गांव के लोगों के दैनिक कार्यों में हिस्सा ले सकते हैं। चाहें तो भैंस का दूध दुहें, खेतों मे ट्रैक्टर चलाएं, साइकिल से गांव घूमें या फिर चाहें तो रिसॉर्ट और लॉज के आराम का मजा लें। पर्यटकों को पूरी आजादी है कि वे जैसे चाहें अपना दिन गुजारें।

राजस्थान
ठेट राजस्थान का एहसास देता है जयपुर का बिश्नोई गांव। यहां लोगों की प्रकृति के साथ तालमेल गजब की है। यहां मरने के बाद शवों को जलाया नहीं जाता, बल्कि दफ्न किया जाता है। और ऐसा इसलिए किया जाता है कि पेड़ों को कटने से बचाया जा सके, साथ ही वातावरण की आबोहवा भी साफ बनी रहे। यह गांव की जागरूकता देखने लायक है, जहां शहरी लोगों से वातावरण की सफाई संबंधी फुटकर बातें मनवाना भी राज्य सरकारों के लिए टेढ़ी खीर है, उसके उलट ग्रामीण लोगों की सतर्कता आंखें खोलती है। लेकिन यह तो एक पहलू है, यहां का देसी राजस्थानी खानपान, विलेज-ट्रैकिंग, ऊंट सफारी, जीप सफारी, लोक-नृत्य और कला पर्यटकों तरोताजा करने के लिए काफी है।

पश्चिम बंगाल
पश्चिम बंगाल के सुंदरवन को यूनेस्को ने वैश्विक धरोहर घोषित किया है। इंसान द्वारा उगाया गया यह दुनिया का सबसे बड़ा जंगल है। इसका तकरीबन पैंतीस प्रतिशत हिस्सा भारत में है। यहां 102 टापू हैं, जिनमें से आधे से ज्यादा हिस्से पर लोगों की बसाहट है। यहां जीवन बहुत मुश्किल है, बिजली, पानी, यातायात की किल्लत के बावजूद लोग यहां कैसे रहते हैं? यहां का समुदाय पर्यटन यहां के लोगों की जिंदगी से रूबरू कराता है। ल्ल

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