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शख्सियत: स्त्री विमर्श की भारतीय धुरी प्रभा खेतान

उनकी आत्मकथा ‘अन्या से अनन्या’ काफी चर्चित रही। यह भारत में किसी महिला की पहली ऐसी आत्मकथा मानी जाती है, जो एक महिला के लिहाज से खुद को देखने-समझने और प्रस्तुत करने की सर्वाधिक आधुनिक और तार्किक दृष्टि से लैस है।

महिला साहित्यकार प्रभा खेतान।

महिलाओं के लिए सभ्यता की सीध में चलने और संघर्ष की दुनिया में उतरने का सिलसिला तकरीबन एक साथ शुरू हुआ। हालांकि इस समझ को हासिल करने में उन्हें और बाकी दुनिया को लंबा वक्त लगा। आधुनिक स्त्री विमर्श की सैद्धांतिकी तैयार हुए तो मात्र सात दशक बीते हैं। गौरतलब है कि सीमोन द बोउवार की ‘द सेकेंड सेक्स’ 1949 में सामने आई। इस कृति के जरिए इस सिद्धांत का प्रतिपादन हुआ कि ‘सेक्स’ और ‘जेंडर’ दो अलग चीजें हैं और महिलाओं की समस्या को देखने का तार्किक आधार ‘जेंडर’ है, न कि ‘सेक्स’। सीमोन के इस चिंतन को भारतीय चेतना के साथ जोड़ा प्रभा खेतान ने। प्रभा एक विलक्षण बुद्धिजीवी के साथ हिंदी की ख्यातिलब्ध उपन्यासकार और कवयित्री हैं। नारीवादी चिंतनके क्षेत्र में तो उनका बड़ा मुकाम है ही, वो बड़ी समाजसेवी भी थीं।

प्रभा खेतान का जन्म 1 नवंबर,1942 को हुआ। उन्होंने कोलकाता विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र में एमए की डिग्री हासिल की और ‘ज्यां पॉल सार्त्र के अस्तित्ववाद’ पर पीएचडी की उपाधि हासिल की। उनकी विलक्षणता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि महज 12 वर्ष की उम्र से ही वे साहित्य साधना से जुड़ गईं। उनकी पहली कविता ‘सुप्रभात’ में छपी थी। प्रभा के ज्ञान और कार्य का क्षेत्र अत्यंत विस्तृत था। वो दर्शन, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, बाजार और उद्योग जगत की गहरी जानकार थीं। उनकी एक बड़ी कामयाबी यह भी रही कि उद्योग और साहित्य दोनों ही क्षेत्रों में उन्होंने अपने को समान रूप से स्थापित किया। कोलकाता चैंबर आफ कॉमर्स की वे पहली महिला अध्यक्ष रहीं। उनकी चर्चित कृतियों में ‘अपरिचित उजाले’, ‘कृष्णधर्मा मैं’, ‘छिन्नमस्ता’, ‘पीली आंधी’, ‘शब्दों का मसीहा सार्त्र’, ‘बाजार के बीच: बाजार के खिलाफ’ शामिल हैं।

उनकी आत्मकथा ‘अन्या से अनन्या’ काफी चर्चित रही। यह भारत में किसी महिला की पहली ऐसी आत्मकथा मानी जाती है, जो एक महिला के लिहाज से खुद को देखने-समझने और प्रस्तुत करने की सर्वाधिक आधुनिक और तार्किक दृष्टि से लैस है। प्रभा की यह आत्मकथा पहले साहित्यिक पत्रिका ‘हंस’ में धारावाहिक रूप से छपी थी। इस आत्मकथा को जहां एक बेबाक और निर्भीक आत्मस्वीकृति की साहसिक गाथा के रूप में खूब प्रशंसा मिली, वहीं यह इस मामले में विवादित भी रही कि इसमें दर्ज स्त्री का वृतांत नैतिकता के तमाम प्रचलित मानकों और पूर्वग्रहों से सीधी मुठभेड़ है।

किताब के रूप में 2007 में जब यह आत्मकथा प्रकाशित हुई तो पाठकों ने इसे हाथोंहाथ लिया। सीमोन द बोउवार के ‘द सेकेंड सेक्स’ का अनुवाद करके तो प्रभा खेतान ने भारत में स्त्री विमर्श का एक युगारंभ ही किया। यही नहीं, अनुवाद के लिहाज से भी उनका यह कार्य रचनात्मक श्रेष्ठता का पात्र है। प्रभा खेतान को उनके साहित्यिक योगदान के लिए महापंडित राहुल सांकृत्यायन पुरस्कार व बिहारी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उनका लेखन महिलाओं को देखने की जो नई दृष्टि और तर्क लेकर आया, वह आज भारत में स्त्री विमर्श की धुरी है। उन्होंने खासतौर पर बांग्ला पृष्ठभूमि की महिलाओं के जीवन में बारीकी से झांकने का बखूबी प्रयास किया।

दिलचस्प है कि सीमोन की तरह प्रभा के जीवन में भी कम से कम आर्थिक अभाव नहीं था। इनके लिए जीवन जीने के कई आसान और कुबेरी रास्ते हो सकते थे। बावजूद इसके इन दोनों ने स्त्री संसार की संवेदना और चेतना के लिए सर्जनात्मक स्तर पर जो आधारभूत कार्य किए, वह एक बड़ा और तारीखी कार्य है। विमर्श से लेकर संघर्ष तक साथ निभाता इनका सृजन संसार महिलाओं के लिए अक्षर संबल की तरह है।

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