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लक्ष्मी की खोज में दिवाली

ऐसे में दिवाली की रौनक कुछ फीकी-फीकी रहने के आसार हैं। ऊपर से पटाखों की बिक्री पर प्रतिबंध! इन परिस्थितियों में दिवाली की खुशियां कितनी रोशन रहेंगी, बता रहे हैं सुधीश पचौरी अपने ललित अंदाज में।
Author October 13, 2017 21:32 pm
चित्र का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।
काले धन पर अंकुश लगाने की गरज से पिछले दिनों नोेटबंदी का फैसला किया गया। कर चोरी रोकने और अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने, वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें कम करने के मकसद से वस्तु और सेवा कर यानी जीएसटी लागू किया गया। मगर इन दोनों फैसलों के चलते बाजार में मंदी का आलम छा गया। डिजिटल लेन-देन को बढ़ावा देने के चक्कर में आदमी को अपना ही पैसा पराया लगने लगा। ऐसे में दिवाली की रौनक कुछ फीकी-फीकी रहने के आसार हैं। ऊपर से पटाखों की बिक्री पर प्रतिबंध! इन परिस्थितियों में दिवाली की खुशियां कितनी रोशन रहेंगी, बता रहे हैं सुधीश पचौरी अपने ललित अंदाज में।
जेब खाली। गुल्लक खाली। दुकान खाली। गल्ला खाली। तिजोरी खाली! दिल खाली। दिमाग खाली। जेब में कुछ हो तो बजे ताली, नहीं तो निकलती है गाली! छोटे दुकानदार और व्यापारी बिसूरते हैं: न देखी न सुनी ऐसी सूनी दीपावली यानी दिवाली!  पहले नोटबंदी ने मारा। फिर जीएसटी ने मारा। अब अदालत ने मारा कि पटाखे न बेचो। दिल्ली की हवा खराब न करो!  देखते-देखते पटाखे ‘अपराध’ बना दिए गए हैं।
एक चैनल हिसाब लगाके बताए जा रहा है कि एक ‘सांप’ चलाते हो तो छह सौ चैवालीस सिगरेटों का धुआं बनता है। हजार की लड़ी चलाते हो तो दो सौ सतहत्तर सिगरेटों के बराबर धुआं बनता है। एक फुलझड़ी चलाते हो तो चौहत्तर सिगरेट बराबर धुआं बनता है, अगर अनार चलाते हो तो चौंतीस सिगरेट के बराबर धुआं बनता है। बच्चों के लिए महा खतरनाक हैं ये पटाखे! इसलिए प्रतिबंध है: न बिकेंगे न चलेंगे!
एक पर्यावरणवादी कह रहा है कि पिछले साल इतना धुआं तना रहा, अब नहीं तनने देना है, दिल्ली बचानी है। एनसीआर बचाना है!
मीडिया दिन-रात डरा रहा है। डॉक्टर पर डॉक्टर आ बिराजे हैं और समझाए जा रहे हैं  कि एक बार फेफड़े गए तो फिर नए नहीं मिलते, इसलिए पटाखे से बचो, धुएं से बचो!
हमारी चिंता में इतने ही दुबले हो रहे हो डॉक्टर जी, तो अपनी हजारों की फीस कम क्यों नहीं कर देते?
अगर लोग बीमार न हों तो आपके पास क्यों आएं? क्यों खालीपीली उपदेश झाड़ रहे हो! क्या बचपन में आपने पटाखे नहीं चलाए थे? जब आपके फेफड़े बच गए, आपका दिल बच गया, तो अपना भी बच जाएगा! बेकार की बकवास करके क्यों हमारी दिवाली का मजा किरकिरा करते हो!
यह ‘नए भारत’ की ‘नई दिवाली’ है! एनजीओ तत्त्वों की बनाई दिवाली है, जो कहती है- ये न करो वो न करो, लेकिन खरीदो, अमेजन से खरीदो, फ्लिपकार्ट से खरीदो क्विकर से लो, ओलेक्स से खरीदो! टीवी खरीदो, स्मार्ट फोन खरीदो, मकान खरीदो, लोन लो, कपड़े खरीदो, लेकिन मिठाई न खरीदो। हां, चॉकलेट जरूर खरीदो, एक से एक बढ़िया महंगी कार खरीदो!
देश का गरीब क्या खरीदे श्रीमान, कभी यह भी बता दिए करोे!
जीएसटी ने हर आइटम महंगा कर दिया है। सस्ता लेना है, तो खुला लो जो मिलावट वाला है और खाकर मरो। अगर ब्रांड लेते हो तो जीएसटी देना होगा!
जीएसटी ने दो समाज बना दिए है। एक ब्रांड का उपभोग करने वाला दूसरा खुला खरीदने वाला! ब्रांडवाला रक्षित है, खुलेवाला अरक्षित! यह है जीएसटी का ‘नया इंडिया’!
ऐसे में दिवाली से जुड़ा उद्योग क्या करे? मिठाई तो खराब है। मिलावट वाली है। तेल पर जीएसटी लगा है। अब मनानी है तो मनाओ लट््टुओं वाली, एलजी, सैमसंग और हुंदई, टाटा, मारुति वाली दिवाली!
पटाखों की बिक्री बंद तो शिवकाशी की पटाखा इंडस्ट्री ठप्प! अस्सी लाख रोजगार ठप्प! दिल्ली के सदर बाजार का पटाखों का थोक बाजार ठप्प!
यह है इस बार की डरी-डरी, सहमी-सहमी, सूनी-सूनी दिवाली!
मीडिया बनाए जा रहा है, ऐसी मनहूस दिवाली। एक से एक एनजीओ पीछे पड़े हैं कि मनाओ तो मनाओ ग्रीन दिवाली! एक मंत्री जी कहे जा रहे हैं कि मनाओ तो मनाओ ‘हरित दिवाली’! ‘ग्रीन दिवाली’! सरकारेआला कह रहे हैं, जनता से अपील किए जा रहे हैं, विज्ञापन में बोले जा रहे हैं कि ग्रीन दिवाली मनाइए!
कोई बताए तो कि क्या होती है ग्रीन दिवाली! कैसे मनाएं ग्रीन दिवाली?
ग्रीन कलर करके मनाएं तो क्या ग्रीन हो जाएगी दिवाली?
शाहरुख तो कहता ही रहता है पूरे साल कि ये पेंट, लगाओ हमेशा दिवाली मनाओ! तो मनाइए शाहरुख के पेंट वाली नेरोलैक की दिवाली!
दिवाली का सारा मजा किरकिरा कर दिया है मनहूसों ने!
निक्के निक्के पैसे पर तो सरकारेआला बैठी है कि अगर एक भी निकालना है तो आधार ला, पैन कार्ड ला, ये ला वो ला। अपना ही पैसा पराया बन गया है। बताइए कैसे कोई मनाए दिवाली?
लगता है, लक्ष्मी जी ‘सूमों’ और ‘कंजूसों’ की कैद में बंद हो गई हंै!
जेब खाली, टेंट खाली, गल्ला खाली, गुल्लक खाली, कैसे मनाए कोई दिवाली?
इकोनॉमी डाउन है। बाजार ठंडा है। पैसा बंद है। बाजार में दुकानदार मक्खी मारते रहते हैं! जो कहते हैं कि सब ठीकठाक है, जरा किसी बाजार में जाकर देखें कि मंदी क्या होती है?
दिवाली के पहले टीवी पर बहसें जारी हैं। एक पुराने वित्तमंत्री ने कह दिया कि इकोनॉमी तो गिर रही है। इतना सुनते ही भक्त तर्कों के लठ्ठ भांजने लगे: कैसे कहा कि गिर रही है? हमारी नजर से देखो तो उठ रही है, दौड़ रही है। सन दो हजार बाइस तक इंतजार करो। अर्थव्यवस्था उठ जाएगी, तब तक के लिए चुप लगाओ। निराशा न फैलाओ!
किससे कहें? किसे समझाएं कि महाराज जी! आप तो अपने को ‘भारतीय संस्कृति’ वाला कहते थे अब आपकी भाषा भी एनजीओे वाली हो गई है!
कैसे बताएं कि दिवाली खुशी का आनंद का अनुभव और धन-धान्य का संपन्नता का समारोह है। घरों की लिपाई-पुताई होती है। साफ-सफाई होती है। खील-बताशे लाए जाते हैं। मिठाई ली और दी जाती है। दीपक और लट््टू जलाए जाते हैं, बच्चे पटाखे चलाते हैं, मित्रता का देन-लेन होता है, गिफ्टों का आदान-प्रदान किया जाता है। जुआ खेला जाता है, रात भर लक्ष्मी जी का इंतजार किया जाता है कि वह अब आर्इं कि अब आर्इं!
निम्न वर्ग या उच्च वर्ग सब अपने-अपने तरीके से मनाते हैं दिवाली! नया बहीखाता बनाने, नई दुकान खोलने, नया धंधा शुरू करने, नई संपन्नता की कामना का नाम है दिवाली!
दिवाली है लक्ष्मी जी का पूजन अर्चन। अपनी कमाई अपनी पूंजी अपने धन का पूजन और प्रदर्शन!
वह डिप्रेसन की दुश्मन है! अवसाद और निराशा की दुश्मन है! वह आशा ह,ै वह भविष्य है, उसे मना कर हम अच्छे दिनों की कामना करते हैं। आप अच्छे दिन न दे सके, तो क्या हमको अच्छे दिनों की कामना भी न करने दोगे?
दिवाली एक फीलिंग का नाम है। अनुभव का नाम है। उत्साह और उमंग का नाम है। वह समाज का ‘फील गुड फैक्टर’ है!
जेब में माल हो तो दुनिया सुहानी लगती है। हर रोज दिवाली लगती है, लेकिन टेंट में पैसा न होता, तो मन गिरा-गिरा रहता है। सेंटीमेंट डाउन-डाउन रहता है और इन दिनों वह एकदम डाउन-डाउन है!
पाई-पाई पर पहरा है। कंजूसों ने उसे कसके पकड़ा हुआ है। इतना निकालना है, तो ये दिखाओ वो दिखाओ ये खरीदना है तो ये करो वो करो! फ्री मार्केट को हुकुमनामे का बाजार बना दिया है।
और कहते हैं कि कैश का क्या करना है? डिजिटल हो जाओ और डिजिटल ही लेन देन करो! डिजिटल इंडिया ही ‘नया इंडिया’ है। तेरे मोबाइल में तेरी बैंक है। वही तेरी जेब है, वही तेरी तिजोरी है। एक से एक ‘ऐप’ हैं। कैश की जरूरत नहीं। बस यह बटन दबा, वह बटन दबा और देख पैसा ये गया, वो गया! ऐसे मनाओ नई डिजिटल दिव्य दिवाली।
मगर दिवाली की रात में लक्ष्मी जी का पूजन कैसे करेंगे? चांदी का एक रुपया तो चाहिए? चांदी के या मिट्टी के लक्ष्मी गणेशजी, तो चाहिए उनके संग खील-बताशे मिठाई चाहिए।
लक्ष्मी जी की पूजा करनी है, तो साक्षात लक्ष्मी चाहिए और आप कह रहे
हो कि डिजिटल लक्ष्मी जी की पूजा कर!
डिजिटल लक्ष्मी नमोनम: कैसे करें? कर भी लें तो मजा नहीं आने का।
आपने तो लक्ष्मी जी का भी डिजिटलावतार कर दिया, लेकिन हम उनके माथे पर तिलक कैसे लगाएं? मूर्तिपूजक हम बिना उनकी मूर्ति के कैसे पूजें? कैसे उनको माला पहनाएं? कैसे उनका स्वागत करें?
हमें तो चाहिए अपनी सगुण लक्ष्मी जी, रंग-बिरंगी सजी-संवरी कमल के फूल पर बैठी हुई एक हाथ में स्वर्णकलश दूसरे से आशीर्वाद बरसाती हुर्इं। संग में चाहिए गणेश जी, विघ्नहर्ता सुखकर्ता गणेशजी! आपके डिजिटल में दिखते ही नहीं लक्ष्मी गणेश जी! कैसे लिखें शुभ लाभ? श्री लक्ष्मी जी सदा सहाय?
पीढ़ी दर पीढ़ी इसी तरह के लक्ष्मी गणेश जी की पूजा होती चली आई है, लेकिन आपने सरजी उनको भी डिजिटल करके ‘अमूर्त’ कर दिया है! बड़े ही जादूगर हैं आप! यह भी न सोचा कि भगवान विष्णु जी पर क्या बीतेगी? डिजिटल लक्ष्मी जी विष्णु जी के पैर कैसे पलोटेंगी, यह तो भगवान विष्णु जी के संग भी अन्याय है कि उनकी सेविका को डिजिटल बना दिया है! वे अब ‘फील’ ही नहीं होतीं!
कल तक लक्ष्मी एक ‘फीलिंग’ होती थीं अब वे ‘डिजिट’ मात्र हैं। एक आंकड़ा मात्र हैं। एक ‘बीप’ मात्र हंै। एक ‘क्लिक’ मात्र हैं। एक बटन मात्र हैं।
मगर वे नकद नारायण में रमती हैं। नकद नारायण फील होता है, तो मन उछालें मारता है। उत्साह जन्मता है। नकद नारायण गायब हो जाएं तो मातम होता है।
आप तो भारतीय संस्कृति के पुजारी थे सर जी! ये कैसी पूजा शुरू की कि लक्ष्मी जी को ही गायब कर दिया। ‘सगुण’ लक्ष्मी जी को ‘निर्गुण’ बना दिया।
बताइए डिजिटल लक्ष्मी के किस मुखारविंद पर चिपकाने के लिए चांदी का रुपया लाऊं? उनको मिठाई कैसे खिलाऊं? लक्ष्मी जी पर भी पहरे बिठा दिए हैं आपने?
मुझे तो लगता है कि लक्ष्मी जी को अगवा कर लिया गया है। कहीं कैद में बंद कर दिया गया है। वह जो सबके पास कुछ साल पहले तक किसी न किसी रूप में होती थी अब किसी को फील तक नहीं होती!
यह बहुत ही ‘सीरियस’ बात है सरजी! एक देवी और इस तरह गायब कि निशान तक नहीं मिल रहे। एक ‘हैबियस कॉरपस’ डालने की जरूरत है कि लक्ष्मी मैया जहां भी कैद हैं, उनको बरामद किया जाए! दिवाली आने से पहले उनको सामने लाया जाए उनकी खबर बने कि वे हैं और जिंदा हैं, वरना लोग कहेंगे कि आपने लक्ष्मी को कहीं गायब कर दिया है!
हमें तो चाहिए वही लक्ष्मी जी जो कमल के ऊपर विराजमान हैं विष्णु जी की सेवा में रत हैं और हम सब साल में एक रात उनके घर आने की प्रतीक्षा करते हैं।
लक्ष्मी क्या है? इकोनॉमी है! लक्ष्मी क्या है? बाजार है! लक्ष्मी क्या है, उद्यम है! मेहनत है! खेत का हल है, दुकान का बही-खाता है, जेब का कैश है। तभी तो ऐश है!
हम तो कहते हैं सर जी कि हमें हमारी लक्ष्मी जी लौटा दो। वही लक्ष्मी लौटा दो, जो कमल पर बैठी हैं और स्वर्णकलश से मुद्राएं बरसा रही हैं। हमें चाहिए वही साक्षात लक्ष्मी, जिनके दर्शन मात्र से आशा का संचार होता है! वही चांदी हैं, वही चांदनी हैं, वही रोशनी हैं, वही फुलझड़ी हैं।
कुछ करो सरजी! लक्ष्मी जी को लक्ष्मी जी ही रहने दो! उनको डिजिटल न करो! उनको सगुण रहने दो, उनको वैसी ही रहने दो जैसी हजारों साल से नजर आती हैं! यह तुम्हारा भक्त पुकार रहा है: कहां छिपी हो लक्ष्मी मैया! आओ, जरा हमारी भी दिवाली मनवा दो!

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