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ललित प्रसंग: यातायात अवरोध से ग्रस्त देश

आजकल सत्तर साल की आजादी गुजार देने के बाद भी जब मैं देश की सड़कों और चौराहों पर लज्जित कर दिया जाता हूं, तो उतना ही अपमानित और तिरस्कृत अनुभव करता हूं, जितना कभी रूसी उपन्यासकार दोस्तोएवस्की ने अपना इसी नाम का उपन्यास लिखते हुए महसूस किया होगा।

Author Published on: June 23, 2019 1:47 AM
चित्र: वाजदा खान

सुरेश सेठ

आजकल सत्तर साल की आजादी गुजार देने के बाद भी जब मैं देश की सड़कों और चौराहों पर लज्जित कर दिया जाता हूं, तो उतना ही अपमानित और तिरस्कृत अनुभव करता हूं, जितना कभी रूसी उपन्यासकार दोस्तोएवस्की ने अपना इसी नाम का उपन्यास लिखते हुए महसूस किया होगा। न जाने कितने अरसे से इस देश की सवा अरब से ऊपर की आबादी इसकी मरम्मत मांगती सड़कों पर लगे यातायात अवरोधों में रुकी हुई है। कानून के रखवाले खाकी वर्दी वाले, जिन्हें अंग्रेजों के जमाने में टॉमी और आज मामू कहा जाता है, अपने उसी टॉमी अंदाज में यातायात अवरोध से बेन्याज होकर भद्रजनों को बेचारा बना कर उनके चालान काटने में व्यस्त रहते हैं।

चौराहों पर लगी हुई यातायात की लाल हरी बत्तियां कल बिगड़ी थीं, आज बिगड़ी हैं और कल भी बिगड़ी रहेंगी। इन्हीं बत्तियों के सहारे तो आज की खाकी को यातायात प्रशिक्षण नहीं दिया जाता। उन्हें प्रशिक्षण मिलता है कथित महान लोगों की वीआईपी ड्यूटी निभाने का या उनके निजी फौज फाटे का रूप धारण करने का या किसी चोर गली के नाके पर खड़े होकर चालान काटने का। चालान काटने से मन ऊब जाए, तो शिकार को चोर गली में ले जाकर अपनी टेंट गर्म कर लो। कभी-कभी खाकी वर्दी वाले ये महानुभाव विनय सप्ताह भी मनाते हैं। तब सीटी बजा कर कानून तोड़ने का शुबहा देकर शिकार को यों जिबह के लिए तैयार किया जाता है- अरे, पुलिस आजकल विनय सप्ताह मना रही है। लेकिन इस अवधि में वह अपना चालान कार्यक्रम तो बंद नहीं कर सकती। सीधे से चालान कटवा लो, नहीं तो बेभाव आपको जूता जी पड़ेंगे। विनय सप्ताह है न साहिब, इसलिए चमरौधा जूता आज जूता जी कहलाया। लेकिन जूता खाने की जगह शिकार अगर उन्हें चोर गली में ले जाए, तो कुछ देर के बाद सिपाही कामूजान खींसे निपोरते हुए बाहर आएंगे और दोस्तोएवस्की का अपमानित और लांछित पात्र बना अपराधी निर्दोष घोषित होकर मौका-ए-वारदात से रफूचक्कर होता हुआ नजर आएगा।

मगर मौका-ए-वारदात पर सड़क के दोनों ओर यातायात उसी तरह बाधित नजर आता है कि जैसे दिल्ली दरबार में संसद बार-बार अवरुद्ध होकर अपने सत्र के सत्र नष्ट कर देती है, बिना इस पर खर्च की फिक्र किए। आम आदमी से उगाहे राजस्व की चिंता किए। आम आदमी अपने प्रश्नों के उत्तरों के इंतजार में खड़ा रहता है। सांसदों ने प्रश्न पूछने की फीस भी उगाह ली थी। लेकिन फीस उगाहने वाले सासदों का घपला दरी के नीचे छिपा दिया जाता है, और संसद पूरे सत्र के लिए इस मुद्दे पर बाधित हो गया है कि ‘कोलाहल रुके तो सरकार के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पर बहस हो।’ अजी न कोलाहल रुकता है, न अविश्वास प्रस्ताव पर बहस हो पाती है। एड़ियां रगड़ते हुए जरूरी प्रस्ताव पारित होने के लिए अगले सत्र तक के लिए स्थगित कर दिए जाते हैं, जहां फिर कोई नया कोलाहल उनका इंतजार कर रहा होता है। सोचता हूं, यहां कौन अपमानित और लांछित हो गया? क्या विचार चर्चा का इंतजार करता हुआ बाधित सत्र या कोलाहल करते और एक-दूसरे पर पेपर वेट फेंकते जन-प्रतिनिधि अथवा वह ब्रह्म वाक्य कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे शानदार लोकतंत्र है?
लोकतंत्र की शान देखनी है, तो यातायात अवरोध की तरह योजनाबद्ध आर्थिक विकास के बारह मील पत्थरों के बावजूद उसी जगह खड़े इस देश को देखो। देश खफा है और इसकी सोने की चिड़िया उठा इस देश के एक प्रतिशत अरबपति भाग लिए। किनारे खड़े खाकी के चौकीदार बस केवल सीटियां फूंकते रहे, या अभागे छटपटाते लोगों की अस्वीकार की मुद्रा देख कर उनका चालान काटने पर आमादा हो गए।

चालान काटना है तो काटो, इस यातायात अवरोध में रुके उन चिकित्सा वाहनों का, जो मृतप्राय मरीजों को उन अस्पतालों में ले जाएंगे, जहां मरीजों और उनके अभिभावकों की जेब कटने की कोई सीमा नहीं। नेता जी ऐसे उपचार की ऊलजलूल उगाही से चिंतित होकर उस पर कर ओट दे देते हैं, और जवाब में प्रशंसक तालियों की उम्मीद करते हैं। लेकिन तालियां नहीं बजतीं। चिकित्सा वाहन उस भीड़ भरे यातायात अवरोध में उसी जगह रुका रहता है, अपने बेबस मरीजों के साथ, क्योंकि छूट कर राहतों के रूप में मिली है, चिकित्सा उपचार की कटौती के रूप में नहीं और इसी बाधित यातायात में चिकित्सा वाहन के पीछे रुके हैं निराश नौजवान, जो आज नौकरी के लिए उन साक्षात्कारों में नहीं जा पाएंगे, जिनकी चिट्ठी उन्हें वर्षों बाद मिली थी। यह भीड़ नहीं हिली, तो उनके पीछे खड़े भूखे लोगों की भीड़ कैसे चलेगी, जो आज भी सस्ते राशन की दुकान से निराश लौटे हैं। इस भीड़ के गिर्द कुछ परिचित नारे आवारा हो चक्कर लगाते हैं। ‘सबकी रोटी, सबको रोजगार’। ‘हर हाथ को काम, पूरा दाम’। भीड़ उन नारों को बार-बार सुन अपने मुग्ध हो जाने पर और भी अपमानित, और भी तिरस्कृत हो जाती है।

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