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शख्सियत: संबंध और संघर्ष का फिरोजी अफसाना फिरोज गांधी

इंदिरा इलाहाबाद के दिनों से ही उन्हें जानती थीं। ब्रिटेन में रहने के दौरान दोनों और करीब आए। इससे पहले, 16 साल की उम्र में इंदिरा फिरोज के प्रेम का प्रस्ताव ठुकरा चुकीं थीं। लेकिन इसके तीन साल बाद 1936 में मां की मौत ने उन्हें बहुत उदास कर दिया। तब उन्हें फिरोज का जज्बाती सहारा मिला। पिता पंडित नेहरू को जब इंदिरा ने फिरोज के साथ विवाह के फैसले से अवगत कराया तो बेटी की जिद के आगे पिता की नाराजगी कहीं छिप गई।

अंग्रेजी काल के राजनीतिक और सामाजिक शख्सियत फिरोज गांधी।

तारीख के बड़े किरदारों के साए में कई बार कई ऐसे नाम छिप जाते हैं, जिनकी अपने समय में भूमिका कहीं से भी कमतर नहीं मानी जा सकती। स्वाधीन भारत के इतिहास का एक ऐसा ही नाम है- फिरोज गांधी। देश में संसदीय आचरण और राजनीतिक उसूलों के बारे में जब भी कोई बात कही जाएगी तो फिरोज गांधी का नाम संदर्भों-उल्लेखों के तौर पर बार-बार आएगा। जो लोग उनकी जिंदगी के बारे में कम जानते हैं, उनके लिए उनका मुख्तसर तआरुफ जरूर यह हो सकता है कि वे इंदिरा गांधी के पति थे। पर फिरोज के कद और किरदार को इतने भर में समेटना कहीं से भी मुनासिब नहीं है।

उनका जन्म 12 सितंबर, 1912 को मुंबई में एक पारसी परिवार में हुआ था। फिरोज के पिता का नाम जहांगीर और माता का नाम रतिमाई था। 1915 में वे मां के साथ इलाहाबाद में कार्यरत एक संबंधी महिला के पास आ गए। इस तरह उनकी शुरुआती तालीम इलाहाबाद में हुई। इलाहाबाद उन दिनों स्वाधीनता आंदोलन से जुड़ी गतिविधियों का केंद्र था। युवक फिरोज इसके प्रभाव में आए। इसी दौरान नेहरू परिवार से भी उनका संपर्क बढ़ा। उन्होंने 1928 में साइमन कमीशन के बहिष्कार में भाग लिया और 1930-32 के आंदोलन में जेल की सजा काटी।

1935 में आगे के अध्ययन के लिए वे लंदन गए और उन्होंने ‘लंदन स्कूल आफ इकोनोमिक्स’ से अंतरराष्ट्रीय कानून में स्नातक की डिग्री हासिल की। भारत लौटने पर अगस्त, 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में फिरोज गांधी कुछ समय तक भूमिगत रहने के बाद गिरफ्तार कर लिए गए थे। रिहा होने के बाद 1946 में उन्होंने लखनऊ से निकलने वाले दैनिक ‘नेशनल हेराल्ड’ के प्रबंध निदेशक का पद संभाला।

इंदिरा इलाहाबाद के दिनों से ही उन्हें जानती थीं। ब्रिटेन में रहने के दौरान दोनों और करीब आए। इससे पहले, 16 साल की उम्र में इंदिरा फिरोज के प्रेम का प्रस्ताव ठुकरा चुकीं थीं। लेकिन इसके तीन साल बाद 1936 में मां की मौत ने उन्हें बहुत उदास कर दिया। तब उन्हें फिरोज का जज्बाती सहारा मिला। पिता पंडित नेहरू को जब इंदिरा ने फिरोज के साथ विवाह के फैसले से अवगत कराया तो बेटी की जिद के आगे पिता की नाराजगी कहीं छिप गई।

आखिरकार यह शादी हुई। पर कुछ ही सालों में दांपत्य के इस साझे में कई तरह के दरार आ गए। दरअसल, फिरोज पहले शख्स थे जिन्होंने इंदिरा गांधी की अधिनायकवादी प्रवृत्ति को पहचान लिया था। 1959 में जब इंदिरा कांग्रेस की अध्यक्ष थीं उन्होंने यह तय किया कि केरल में चुनी हुई पहली कम्युनिस्ट सरकार को पलट कर वहां राष्ट्रपति शासन लगाया जाए। आनंद भवन में नाश्ते की मेज पर फिरोज ने इसके लिए इंदिरा को फासीवादी तक कहा। उस वक्त पंडित नेहरू भी वहीं मौजूद थे।

फिरोज अभिव्यक्तिकी आजादी के बड़े समर्थक थे। उस दौर में संसद के भीतर कुछ भी कहा जा सकता था लेकिन अगर किसी पत्रकार ने इसके बारे में कुछ कहा या लिखा तो उसे इसकी सजा दी जा सकती थी। इस प्रावधान के खिलाफ फिरोज ने एक ‘प्राइवेट बिल’ पेश किया। यह बिल बाद में कानून बना, जिसे ‘फिरोज गांधी प्रेस लॉ’ के नाम से जाना जाता है।

दिलचस्प है कि फिरोज की मौत के पंद्रह साल बाद इंदिरा ने आपातकाल की घोषणा की और अपने पति के बनाए कानून को एक तरह से कचरे के डिब्बे में फेंक दिया। इंदिरा और फिरोज की नजदीकी और दुराव के बीच भारतीय राजनीतिक-सामाजिक जीवन के कई ऐसे उत्स छिपे हैं, जिन पर गहराई से विचार करते हुए हम न सिर्फ नए भारत के प्रबुद्ध मानस की रचना और उनकी जटिलता को समझ सकते हैं, बल्कि संबंध और विवेक के साझे के बारे में नए विमर्शीय प्रस्थान की तरफ भी बढ़ सकते हैं।

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