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मोटे हैं तो क्या हुआ

कुछ साल पहले तक मोटे शरीर वाले स्त्री-पुरुषों के लिए फैशन एक तरह से दूर की कौड़ी थी। जब वे बाजार में अपने लिए कोई परिधान खरीदने जाते थे, तो विकल्प लगभग न के बराबर हुआ करते थे। ऐसे में उन्हें स्थानीय दर्जी की मदद से अपने लिए मनचाहे परिधान सिलाने पड़ते थे। मोटापा एक तरह से अभिशाप मना जाता था। मॉडलिंग और फिल्म की दुनिया में ऐसी महिलाओं को प्राय: काम नहीं मिलता था। इसलिए वे अपने खानपान और वर्जिश वगैरह को लेकर बहुत सतर्क रहती थीं। पर अब इस मामले में बदलाव आया है। अब मोटे लोगों के लिए भी फैशन जगत में परिधान तैयार होने लगे हैं। मोटापे के शिकार लोगों के लिए फैशन के बारे में बता रही हैं अनुजा भट्ट।

Author August 5, 2018 6:01 AM
एक तरफ जहां पूरी दुनिया में मोटापे के खिलाफ जंग छिड़ी हुई है, जिसे देखो छरहरी बनने के लिए खानपान पर नजर रख रही है, जिम वगैरह में जाकर वजन घटाने का प्रयास कर रही है, तो वहीं दूसरी तरफ मोटापे के साथ शानदार तरीके से जीने की ललक भी बढ़ी है।

एक तरफ जहां पूरी दुनिया में मोटापे के खिलाफ जंग छिड़ी हुई है, जिसे देखो छरहरी बनने के लिए खानपान पर नजर रख रही है, जिम वगैरह में जाकर वजन घटाने का प्रयास कर रही है, तो वहीं दूसरी तरफ मोटापे के साथ शानदार तरीके से जीने की ललक भी बढ़ी है। अभी जब फैशन वीक के लिए ‘प्लस साइज’ मॉडलों के लिए विज्ञापन निकला तो पांच हजार से ज्यादा ऐसे मॉडलों ने आवेदन किया। इस पर स्वाभाविक ही लोगों को हैरानी हुई।

पहले फैशन शो देखने का मतलब मॉडलों की शारीरिक बनावट को देखना भी होता था। मॉडलों के लिए दुबली-पतली, छरहरी यानी ‘जीरो साइज’ होना जरूरी होता था। इसके लिए वे अपने खानपान, व्यायाम आदि को लेकर कुछ ज्यादा ही सतर्क रहती थीं। इसकी वजह से कई बार वे गंभीर रूप से बीमार भी हो जाती थीं। मगर अभी हाल ही में जब लैक्मे फैशन वीक के लिए ‘प्लस साइज’ मॉडलों से आवेदन मांगे गए तो पांच हजार से ज्यादा मॉडलों ने अपना पंजीकरण कराया। यह हैरान कर देने वीली बात है, साथ ही समाज में आए बदलाव की तरफ भी ध्यान दिला रही है। पहले जहां मोटे लोग अक्सर आत्मविश्वास की कमी से जूझते थे और सामाजिक कार्यक्रमों में जाने से बचते थे। समाज में उनका मजाक उड़ाया जाता था। वे न तो फैशनेबल कपड़े पहन सकते थे और न ही खूबसूरती की तरफ अपनी नजरें जमा सकते थे। टीवी धारावाहिक से लेकर फिल्में भी जीरो साइज पर फोकस करती थीं। कई प्रतिभाशाली अभिनेत्रियां परदे से इसीलिए गायब हो गर्इं, क्योंकि उनका वजन बढ़ गया था। फैशन उद्योग में भी हर जगह फिटनेस को लेकर बात होती थी, फिटनेस से परे नहीं। यानी कहने का अर्थ यह था कि अगर आपको सुंदर लगना है तो पहले वजन घटाना होगा।

यह शर्त फैशन को आगे बढ़ाने के बजाय हाशिए पर धकेल रही थी। फैशन डिजाइनरों ने भी इस बात के महसूस किया कि मोटापे की समस्या से जहां पूरी दुनिया परेशान है, एक तरफ उनका खानपान छूट रहा है, तो जरूरी है कम से कम उनका पहनावा तो बरकरार रहे। इस स्थिति के चलते ‘प्लस साइज’ परिधानों की मांग बढ़ी। साथ ही बढ़ी प्लस साइज मॉडल्स की मांग भी। नए डिजाइन के पहनावों पर सबकी नजर गई और बाजार ने इसे हाथों-हाथ लिया। प्लस साइज मॉडलों के चयन में निर्णायक मंडल में अभिनेत्री जरीन खान के साथ डिजाइनर नरेंद्र भी शामिल थे। जरीन खान का कहना है कि यह बहुत हैरानी वाली बात है कि भारत में प्लस साइज मॉडलों को अहमियत देने में इतना वक्त लग गया, जबकि विदेशों में प्लस साइज मॉडल होना आम बात है। वे कहती हैं कि एक समय उनका वजन सौ किलो से भी ज्यादा था। मुझे याद है कि उस वक्त जब मैं अपने लिए कपड़े खरीदती थी, तो फैशन को लेकर मेरे पास बहुत ज्यादा विकल्प नहीं होते थे और न ही प्लस साइज लोगों के लिए इस तरह के ऑडिशंस रखे जाते थे।

फैशन डिजाइनर नरेंद्र कुमार अहमद कहते हैं कि मुझे उम्मीद है कि इस तरह की बातें अब नहीं सुनाई देंगी कि फैशन पर सिर्फ छरहरे लोगों का एकाधिकार है। वे मुंबई में 22 अगस्त से होने जा रहे लैक्मे फैशन वीक में अपना खास संग्रह पेश करेंगे, जिसका नाम है ‘नेवर हाइड’। हाइड का अर्थ है छिपाना। कुमार ने यह महसूस किया कि पूरे समाज की सोच बदलने की जरूरत है, क्योंकि मोटापा कम करना इतना आसान नहीं है। कभी-कभी यह वंशानुगत भी होता है। मोटे व्यक्ति दिन भर चाकलेट या आइसक्रीम ही नहीं खाते रहते। यहां हर किसी को अपने मन के मुताबिक कपड़े पहनने का हक है। मोटे लोगों को क्या संजने-संवरने और आधुनिक कपड़े पहनने का अधिकार नहीं है। मोटापे से जूझ रहे महिला या पुरुष दोनों के लिए बाजार में विकल्प नहीं के बराबर थे। उनको स्थानीय दर्जी की मदद लेनी पड़ती थी। बड़े ब्रांड उनके लिए नहीं थे। यह डिजाइन का कमाल है कि शरीर कैसा भी हो, डिजाइन के कट्स और मोटिफ आप पर जमने लगते हैं।

यह भी नहीं है कि यह नया रूझान है। बाजार में सन 2000 से 2005 के बीच भी प्लस साइज ने दस्तक दी थी, पर तब इसको वह महत्त्व नहीं मिला। नरेंद्र आगे कहते हैं कि मैं भी एक आदिवासी क्षेत्र से हूं और यह महसूस करता हूं कि फैशन को रील लाइफ के बजाय रियल लाइफ से जोड़ने की पहल करनी चाहिए। मैं डिजाइन पर खुद को केंद्रित करता हूं, न कि साइज जीरो की मुहिम पर मेरा ध्यान रहता है। नेवर हाइड के जरिए मैं अपने डिजाइन में कट्स पर जोर देता हूं। मोटे लोगों के लिए मैं कभी चमकदार कपड़े तैयार नहीं करता, पर रंगीन परिधान अवश्य बनाता हूं। चमकदार कपड़े में आपका मोटापा ज्यादा दिखता है। इसी तरह लंबी पतलूनों की जगह मैं उनके लिए घुटनों तक आने वाली पतलून या कैप्री तैयार करता हूं, मोटे लोगों पर यह ज्यादा जमती है। उनको अपने लिए घुटनों तक आने वाले परिधान चुनने चाहिए जैसे स्कर्ट, मिनी ड्रेस, डंप सूट आदि। चौड़ी प्लेट्स या चुन्नटें डली हुई फिटिंग वाली स्कर्ट, हाफ पैंट, मिडी और जंपसूट उनके लिए एकदम उपयुक्त हैं। अभी तक सिर्फ जार्जेट के कपड़ों में ही डिजाइन मिलते थे। मगर अब हर कपड़े पर डिजाइन तैयार किए जा रहे हैं। तो अगर आप भी हैं मोटापे से परेशान और संजने-संवरने के शौकीन, तो मायूस न हों। बाजार में आपके लिए कई विकल्प हैं। बड़े-बड़े ब्रांड आपके इंतजार में खड़े हैं।

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