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समाजः हाशिए पर बुजुर्ग

यह एक आम रिवायत है कि महिलाएं शादी के बाद मां बन कर रह जाती हैं। बड़ी संख्या में महिलाओं की हस्ती उसी रूप में सीमित होकर रह जाती है।

जो वृद्धजन अपना देखभाल नहीं कर सकते और कोई अन्य भी ऐसा करने वाला नहीं हो, उनके लिए वृद्धाश्रम अच्छा है, मगर यह सरकार द्वारा अपनी निगरानी में समुचित रूप से चलाया जाए।

जब मेहनत की उचित कीमत अधिकार के रूप में मिले तो मजदूरी करना कहीं से भी व्यक्ति को कमतर नहीं करता। लेकिन जहां तक महिलाओं का सवाल है, तो उन्हें अभी तक सामाजिक संदर्भ में और परिवार के बीच मुफ्त की मजदूर और सेविका से ज्यादा की हैसियत नहीं मिल सकी है। एक मां अपनी परवाह किए बगैर बच्चों और घर-परिवार के लिए हर वक्त काम करती रहती है। मगर सोचने वाली बात यह है कि इसका उसे क्या लाभ मिलता है? जब बुढ़ापे में उसे अपने कर्तव्य के बराबर अधिकार मिलने की बात आती है तो कितने प्रतिशत लोग एक मां के रूप में महिला को उसका हक दे पाते हैं। अधिकार यानी उसकी देखरेख, संतान के पैसों से अपनी जरूरत और इच्छा पूरी करने का अधिकार। यह सवाल आते ही कई लोगों को मां की याद आ सकती है और उनके प्रति की गई अनदेखी भी। जिन्हें अपने माता-पिता का पुत्र या पुत्री होने पर गर्व होता होगा, वैसे बच्चे कम होते हैं। सवाल है कि अपने जीवन का सर्वस्व अपने बच्चे को समझने के बावजूद बच्चे मां-बाप को महत्त्वपूर्ण क्यों नहीं समझ पा रहे!

दरअसल, व्यावहारिक रूप से समाज में बच्चों के प्रति माता-पिता को जिम्मेदार ठहराया गया है, लेकिन युवा संतान को बूढ़े मां-बाप की देखभाल की जिम्मेदारी विवेक पर छोड़ा गया है। हम जानते हैं कि विवेक इच्छा पर निर्भर होता है और इच्छा स्वतंत्र होती है। जब तक कानूनन जिम्मेदारी के रूप में इसे जोड़ा न जाए, मनुष्य इससे बचना चाहता है। इसी का दुष्परिणाम है कि हमारे समाज में माता-पिता की अनदेखी आम रही है। यों ‘द मेंटेनेंस एंड वेलफेयर ऑफ पैरेंट्स ऐंड सीनियर सिटिजन ऐक्ट 2007’ के तहत अभिभावक अपने बच्चों से गुजारा भत्ता ले सकते हैं। मगर सोचने वाली बात हैं कि हमारे देश में अभी भी कितने ऐसे माता-पिता हैं जो अपने हक के लिए आवाज उठा पाएं और नहीं मिलने पर कानून का सहारा लें। जहां अदालतों में फाइलों की भरमार हो, कानूनी-प्रक्रिया इतनी जटिल हो, वहां किसी वृद्ध महिला के लिए कोर्ट तक पहुंचना और न्याय हासिल कर पाना कितना आसान होगा? फिर जो वृद्ध माता-पिता अपनी ही देखभाल नहीं कर पाते, वे कानूनी लड़ाई कैसे और किस हद तक लड़ेंगे।

इसके अलावा, कई कानून अभी तक व्यवहार में ज्यादा असरकारी नहीं हैं, क्योंकि हमारे यहां कानून और सामाजिक परिस्थितियों के बीच कई खाइयां है। कई कानून कागज पर बन तो गए हैं, मगर उसका इस्तेमाल नहीं के बराबर किया जाता है। जैसे बेटियों के हित में पिता की संपत्ति में हिस्सा मिलना। आमतौर पर बेटियों को यह हक नहीं मिल पाता। लड़कियां अपने माता-पिता से भावनात्मक रूप से इस तरह जुड़ी हुई होती हैं कि शायद ही कभी संपत्ति में बराबरी का अधिकार हासिल करने के लिए कानून का सहारा लेती हैं।

महिलाओं के हित से जुड़े कई कानून ऐसे हैं जिनकी प्रक्रिया काफी जटिल है और व्यवहार में वे कम ही अमल में आते हैं। आमतौर पर माताओं के मन में अपनी संतान के प्रति एक भावनात्मक जाल बन जाता है। जो सक्षम मां होती हैं, उन्हें भी पुत्र द्वारा की गई अनदेखी और अपमान बुरा तो लगता है, मगर वे उसके विरुद्ध कानूनों का सहारा नहीं लेना चाहतीं। भारतीय समाज भी वृद्धजनों के पक्ष में सहायक नहीं हैं। वृद्धाश्रमों की दुर्व्यवस्था की खबरें भी खूब आती हैं। ऐसे में सरकारी व्यवस्था भी लचर हो तो यह वृद्धजनों के लिए चिंता की बात है। जिन बच्चों के लिए वे अपना जीवन कुर्बान कर देते हैं, क्या उन्हें अपनी संतानों से देखभाल और सम्मान पाने का हक नहीं मिलना चाहिए?

यह एक आम रिवायत है कि महिलाएं शादी के बाद मां बन कर रह जाती हैं। बड़ी संख्या में महिलाओं की हस्ती उसी रूप में सीमित होकर रह जाती है। इसके बावजूद अगर उसे अपनी मेहनत, प्यार और सेवा का मूल्य न मिलें तो यह दुखद है। बहुत सारी माताओं और अभिभावकों के मन में एक प्रश्न और उमड़ता रहता है कि उनके बच्चे डॉक्टर-इंजीनियर बनें, मगर विचारणीय यह है कि उस डॉक्टर-इंजीनियर या अफसर पुत्र का क्या फायदा जो अपने लिए ही सोचें। हाल ही में एक करोड़पति इंजीनियर पुत्र से सुनने को मिला कि वे अपनी मां के श्राद्ध के लिए दस लाख रुपया रख लेना चाहते हैं। मगर उसी पुत्र ने अपनी वृद्ध जिंदा मां को अपने साथ रखने से मना कर दिया था और उसके लिए एक व्यक्ति को ड्यूटी पर रख दिया। यही नहीं, जरूरत होने पर भी थोड़े पैसे भेजने की जिम्मेदारी लेने से मना कर दिया। सवाल है कि ऐसे अमीर पुत्र किस काम के जो जरूरत पड़ने पर अपनी जिंदा मां के काम न आए। मरने पर कोई कुछ भी करे, इससे क्या फर्क पड़ता है। कहीं कम तो कहीं ज्यादा, मगर ऐसे अनेक बुजुर्ग माता-पिता दिख जाएंगे जिन्हें संतान के प्यार और सेवा की आवश्यकता है, मगर व्यवहार में युवा संतान माता-पिता की संपत्ति में हिस्सा लेना अपना हक समझते हैं, मगर संपत्ति मिल जाने के बाद उनके प्रति जिम्मेदारी उठाना जरूरी नहीं समझते।

जरूरत इस बात की है कि सरकार की ओर से न केवल राज्य और जिला स्तर पर, बल्कि सामुदायिक स्तर पर ऐसी टीम का गठन किया जाए जो समय-समय पर वृद्धजनों पर निगरानी रखें और उनके साथ दुर्व्यवहार होते देख उन्हें कानूनी सहारा दें। इसी से जुड़ा हुआ विचार यह भी हो सकता है कि जैसे तलाक के मामलों में पति के वेतन का एक हिस्सा पत्नी के बैंक खाते में अपने आप चला जाता है, उसी तरह माता-पिता के बुजुर्ग होने पर संतानों की आय का एक हिस्सा उन्हें मिल जाए। महिला सशक्तीकरण के लिए सरकार द्वारा पेंशन योजना अच्छी है, मगर हर वृद्ध और जरूरतमंद को इसका लाभ मिल पाए, यह भी सुनिश्चित करना होगा। जो वृद्धजन अपना देखभाल नहीं कर सकते और कोई अन्य भी ऐसा करने वाला नहीं हो, उनके लिए वृद्धाश्रम अच्छा है, मगर यह सरकार द्वारा अपनी निगरानी में समुचित रूप से चलाया जाए। एक अन्य उपाय यह भी हो सकता है कि बुजुर्ग अपने होशोहवास में अपनी अर्जित संपत्ति का वसीयत कर लें और उसमें अंतिम समय तक देखभाल की जिम्मेदारी उठाने वाले संतान को ही संपत्ति का अधिकारी बनाएं। अधिकतर माता-पिता में इस मोर्चे पर सही फैसला नहीं लेते हैं। बेटा चाहे कितना भी दुख दे, अनदेखी करे, मगर वे संपत्ति का वारिस उसे ही बनाते हैं, बेटी को नहीं। इस सोच को बदलने की जरूरत है।

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