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शिक्षा : संवादहीनता के परिसर

अगर शिक्षा अपने वास्तविक अर्थ में सार्थक होती है तो वह हथियारों और हिंसा से क्रांति नहीं करती, वह तो शांति की क्रांति रचती है, सभ्य-समाज के शील, सौजन्य, सद्भाव और सहिष्णुता की क्रांति रचती है, लोकव्यापी संवाद की क्रांति करती है..

Author नई दिल्ली | December 27, 2015 12:16 AM
सच तो यह है कि सरकारी विद्यालयों की दुर्दशा और शिक्षा के बाजारीकरण की जिम्मेदारी सरकार पर आती है।

क्यों ऐसा हो रहा है कि हमारा लचीला संविधान और खर्चीला लोकतंत्र फिसलती जबान का लोकतंत्र बन गया है। नेता, अभिनेता, बौद्धिक, साहित्यकार, समाजकर्मी, वैज्ञानिक, राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय लेखक, पत्रकार सब एक साथ हमारे लोकतंत्र को बयानतंत्र में बदल रहे हैं? बयान भी कैसे? जो आज कहते हैं, कल उसे ही काट देते हैं। तोड़-मरोड़ कर पेश करने के लिए एक कठघरा बयानबाजों ने बना रखा है- मीडिया, सोशल मीडिया और अखबारों को। हमने अपनी शिक्षा से यह कैसा समाज रचा जो संवाद कम और विवाद ज्यादा पैदा करता है?

सच पूछा जाए तो शिक्षा और समाज के बीच सभ्यता-संवाद का अंत हो गया है। अब तो संवाद केवल नेता-अभिनेताओं के बीच है या सरकार और सरकार-विरोधी के बीच। आमजन तो मूक श्रोता है या टीवी का बेचैन दर्शक। उसके पास राय देने का कोई मंच नहीं, मीडिया नहीं, वह तो केवल सही और गलत की चर्चा आपस में कर लेता है और किसी नए राजनीतिक, सामाजिक या आपराधिक समाचार और समाचारों पर बयान सुनने की प्रतीक्षा करता रहता है। शिक्षा का समाज से जो सभ्यता-संवाद होना चाहिए, वह इसलिए भी नहीं हो रहा कि शिक्षा समाज से दूर चली गई है। वह अब दूर-शिक्षा या डिस्टेंस एजूकेशन का नया रूप धारण कर मीडिया माध्यमों का औजार बन गई है।

कारलाइल ने विश्वविद्यालयों की आलोचना करते हुए कहा था कि विश्वविद्यालय है ही क्या, सिवा किताबों के संग्रहालय के। अब तो किताबों के संग्रहालय भी नहीं रहे। उत्तर-आधुनिक समय ने तो इतिहास, साहित्य, साहित्यकार की मौत के साथ किताबों की मौत भी घोषित कर दी है। इसलिए किताबों की मौत का मतलब ग्रंथालयों या लाइब्रेरियों की मौत भी हो गया है। इसका एक परिणाम यह है कि शिक्षा का शिक्षक-प्राध्यापक के बीच का संवाद भी मर चुका है।

यूजीसी और सरकारों ने महाविद्यालयों को सेमिनार करने, शोधपत्र लिखवाने और प्राध्यापकों का ज्ञान-उन्मुखीकरण या ज्ञान-उन्नयन करने के प्रावधान तो कर दिए हैं, बायोमेट्रिक प्रणाली से उपस्थिति दर्ज करना अनिवार्य कर दिया है, क्या इसका यह अर्थ नहीं कि यूजीसी और सरकारों को विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों की योग्यता और कर्तव्य के प्रति ईमानदारी पर भरोसा नहीं रहा या प्राध्यापकों ने अपने आचरण और अध्ययन-अध्यापन और शोध-विमुख होकर यह भरोसा तोड़ दिया है? जब शिक्षक-शिक्षक के बीच, शिक्षक-छात्रा-छात्र के बीच ही संवाद नहीं रहा, तो समाज और शिक्षा के बीच संवाद कैसे होगा। जब सार्थक, सभ्य और शिक्षित संवाद का अभाव एक प्रकार से हमारे लोकतंत्र की विडंबना हो गई है तो अभिव्यक्ति की आजादी का अर्थ केवल आरोप-प्रत्यारोप, गाली-गलौज, बयानबाजी और बयान देने एवं मुकरने के क्या होगा?

कभी कोई मंत्री, कोई सेनापति, कोई नेता, कोई अभिनेता, कोई एनजीओ किसी भी विषय पर बयान देता है, तो वह मीडिया या सोशल मीडिया पर वायरल होकर देश भर में ऐसा वातावरण रच देता है जैसे देश किसी आपातकाल में जा रहा हो, पूरा देश सांप्रदायिक हो गया हो, सारी जनता असहिष्णु हो उठी हो। देश की मजदूर-किसान जनता तो उन पर ध्यान देती ही नहीं और न उसे ऐसे ऊल-जलूल बयान सुनने और उन पर प्रतिक्रिया देने की फुर्सत है।

हमारे लोकतंत्र का आदर्श ही हमारी सहिष्णुता है। सवा अरब के देश में सवा सौ पत्रकार, बुद्धिजीवी, नेता, अभिनेता अगर कोई बयान देते हैं तो वह पूरी जनता का बयान कहां होता है। इतना जरूर है कि जनता पर उनके बयानों का थोड़ा नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। प्रश्न यह है कि क्या हम अपने लोकतंत्र को अफवाहों, बयानों और नकारात्मक प्रचारों की आजादी मान कर उसे अभिव्यक्ति की आजादी मानते है या लोकतंत्र को संयम से सभ्यता-संवाद का आदर्श?

शिक्षा से यह सामाजिक सभ्यता संवाद क्यों नहीं पैदा हुआ या हो रहा है? इस पर विश्वविद्यालयों और स्कूली शिक्षा के धुरंधरों को सोचना होगा। जीके चेस्टरटन ने एक बात मार्के की कही थी कि शिक्षा समाज की आत्मा है, जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में निरंतर यात्रा करती है। हमने शिक्षा को पाठ्यक्रम, पाठ्यपुस्तक और परीक्षा के पिरामिड में रख दिया है, जहां से उसकी आवाज के बजाय उसका मौन ही प्रकट होता है। हम इन तीन माध्यमों से शिक्षा का चम्मचीकरण या चमचाईकरण कर रहे हैं। उदार उदात्त चिंतन के बजाय संकीर्णता और ईर्ष्या, लालच और धन की दौड़ तो रच रहे हैं, मगर इएम फार्स्टर जैसे कथाकार को कहना पड़ा था कि जिस शिक्षा से हम स्पून-फीडिंग कर रहे हैं, वह चम्मच के आकार के सिवा और कुछ नहीं सिखा सकती।

शिक्षा में इस संवादहीनता को पाउले फ्रेरे ने दो किताबों में व्यक्त किया है- एक उत्पीड़ितों का शिक्षाशास्त्र और दूसरा-शिक्षा-मुक्ति का अभ्यास। वह साक्षरता अभियान में पूरे लैटिन अमेरिका में घूमा और उसने विद्यालयों, यहां तक कि विश्वविद्यालयों में मौन की संस्कृति (कल्चर आॅफ साइलंस) देखी। शिक्षा जब अपनी संस्था में सन्नाटे की संस्कृति भोग रही है तो इवान सही तो कहता है- ‘स्कूल का अंत कर दो क्योंकि स्कूल दिमाग को जड़ बना रहा है।’

आज हमारे देश के सामने शहरी-सांप्रदायिकता, शहरी-असहिष्णुता, शहरी-धार्मिकता, शहरी-बौद्धिकता और शहरी-राजनीति छा रही है। ऐसे में गांव भी या छोटे-मोटे कस्बे भी बयानबाजी की फसल उगाने लग जाएं, तो न तो साहित्य और साहित्यकारों की किताबों से, न स्कूल-विश्वविद्यालयों से और न मीडिया-अखबारी बौद्धिकों के बयानों से अन्न उपजेगा और न देश का पेट भरेगा। अच्छा है कि गांव, किसान और मजदूर इन बयानों पर ध्यान ही न दें, चाहे मीडिया कितना भी प्रचार करे। जनता कभी सोती नहीं, भूलती भी नहीं और भले बड़े बौद्धिक और शिक्षित समाज से संवाद न करे, मगर वह निरंतर आत्म-संवाद करती है। अपने मौन से भी संवाद करती रहती है और चुनाव के दौरान इसी मौन के इस्तेमाल से शोरगुल भरे संवादों की पोल खोल कर बता देती है कि उसके मौन का भी अर्थ क्या है। वह सरकार बदल देती है, लोक-प्रिय से लोकप्रिय नेता-अभिनेता को भी सड़क पर खड़ा कर देती है और फैसला तब देती है जब उसकी आत्मा की अदालत में उसका मौन गवाह बन जाता है।

अगर शिक्षा अपने वास्तविक अर्थ में सार्थक होती है तो वह हथियारों और हिंसा से क्रांति नहीं करती, वह तो शांति की क्रांति रचती है, सभ्य-समाज के शील, सौजन्य, सद्भाव और सहिष्णुता की क्रांति रचती है, लोकव्यापी संवाद की क्रांति करती है। ऐसी क्रांति का लोकतंत्र रचने के लिए ही तो एएस नील ने अपने समरहिल स्कूल में स्कूल डिमाके्रसी यानी स्कूल का लोकतंत्र आजमा कर समस्त बच्ची-बच्चों को लोकतांत्रिक ढंग से बिना किसी रंग, वर्ग या जातिगत भेदभाव के स्कूल का प्रबंधन सौंपा था और बचपन से ही लोकतंत्र और सभ्य समाज में संवाद की सभ्यता रचने की कोशिश की थी।

आज हमारे लोकतंत्र में चुनाव के बाद लोकतंत्र केवल नेतातंत्र या बौद्धिक-तंत्र बन कर रह गया है। अंगरेजी में कहावत है कि जिस लोकतंत्र में जनता, जनता को चाहती है वह लोकतंत्र सर्वाधिक सौभाग्यशाली जनता का लोकतंत्र है। भारत अभी जनता के भी बंटवारे का लोकतंत्र है। यहां कोई हिंदू, कोई ईसाई, कोई मुसलिम है तो कोई आदिवासी, पिछड़ा आदि। सबका समान जनताभाव पैदा ही नहीं हुआ। इसलिए अड़सठ साल बाद भी हमारा लोकतंत्र भेदभाव का लोकतंत्र है, अमीरों के वर्चस्व का लोकतंत्र है, जातियों और धर्मों का लोकतंत्र है। हम आज तक वह विराट धर्मनिरपेक्ष धर्म रच ही नहीं सके, जिससे यह लगता कि यह सवा अरब जनता का जनता के लिए लोकतंत्र है।

अब एक प्रश्न उन शिक्षाविदों से, जो समय-समय पर विचारों के ताने-बाने या तो विश्वविद्यालय परिसरों या उच्च राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में बैठ कर बुनते रहते हैं। क्या आज तक ऐसा संवाद-पाठ्यक्रम बना, जिसमें छात्राएं-छात्र मिल कर अध्यापकों से, समाज से, विचारकों, पत्रकारों, बौद्धिकों से अनवरत संवाद कर सकें? संवाद का संयम, शील और मर्यादा क्या हो, लोकतंत्र का नेतृत्व कैसा हो, लोकतंत्र की सभ्यता के मानक मानदंड क्या हों, जन-चिंतन और सरकार-चिंतन के बीच क्या जरूरी है, क्यों जरूरी है, इन मुद्दों का कोई पाठ्यक्रम नहीं। नैतिक-शिक्षा, मूल्यों की शिक्षा, कर्तव्य और अधिकारों की शिक्षा देना केवल पाठ्यक्रमों की आलसी इबारतें हैं।

इस किताबी आलस्य से बाहर आकर समाज की चेतना बढ़ाने, समाज में संवाद की प्रतिष्ठा करने, समाज को शिक्षा-संवेदी बनाने का कोई प्रयत्न ही नहीं होता। इसलिए फील्डिंग ने एक बार कहा था कि हमारे तमाम पब्लिक स्कूल दुर्गुण और अनैतिकता फैलाने की नर्सरी बन कर रह गए हैं। यही हाल तो अब विश्वविद्यालयों का हो गया है, जहां हत्या, हिंसा, आत्महत्या, यौन-अपराध आदि पाठ्येतर क्रियाओं आदि का अखाड़ा बना दिया है।

एक स्वस्थ, शिक्षित, सभ्य और सहिष्णु समाज लाठियों और बंदूकों के डर से नहीं रचा जा सकता। उसे तो ऐसी शिक्षा रचनी होगी, जो स्वस्थ संवाद रच सके, सभ्य संवाद रच सके, स्वच्छ छवि रच सके।

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