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वक्त की नब्ज: नेतृत्व बनाम लोकप्रियता

मोदी ने अपना परिवर्तन और विकास लाने का वादा न राजनीतिक तौर पर पूरा किया है और न आर्थिक तौर पर। लेकिन उनकी तुलना जब होती है कांग्रेस के शाही परिवार के साथ, तो उनका कद ऊंचा दिखता है। यही कारण है शायद कि देश उनकी तरफ आज भी देखता है नेतृत्व के लिए।

PM Modi, Chinese App,प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। (फाइल फोटो)

रास महामारी ने दुनिया के राजनेताओं को कठघरे में खड़ा कर दिया है। बड़े-बड़े राजनेताओं की लोकप्रियता कम हुई है सर्वेक्षणों के मुताबिक। लेकिन एक राजनेता हैं, जिनकी लोकप्रियता कम नहीं हुई है और उनका नाम है नरेंद्र मोदी। हाल में एक अमेरिकी कंपनी द्वारा किए गए सर्वेक्षण के मुताबिक चौहत्तर प्रतिशत भारतीय मोदी को पसंद करते हैं। इस सर्वेक्षण का हवाला ब्रिटेन के फाइनेंशियल टाइम्स ने पिछले सप्ताह एक लेख में देते हुए कहा कि मोदी की गलतियों के बावजूद भारतीय उनको मसीहा के रूप में आज भी देखते हैं।

सच पूछिए तो जब मुझे इस लेख से पता लगा कि मोदी की लोकप्रियता बिल्कुल कम नहीं हुई है, तो मुझे आश्चर्य हुआ। इसलिए कि पिछले महीनों में मोदी ने दो बहुत बड़ी गलतियां की हैं। पहली गलती थी प्रवासी मजदूरों को अपने हाल पर छोड़ना, जब बेरोजगार और बेघर होने के बाद ये बेसहरा लोग महानगरों को छोड़ कर अपने ग्रामीण घरों तक जाने पर मजबूर हुए थे। दूसरी बड़ी गलती थी यह कहना लद्दाख में चीनी घुसपैठ के बाद कि भारत की सरजमीन पर न कोई घुस कर आया है, न कोई घुसा हुआ है और न ही हमारी किसी चौकी पर किसी का कब्जा हुआ है। अगले दिन उनके कार्यालय को उनके इस अजीब बयान का खंडन करना पड़ा।

मोदी जितने कमजोर इस साल दिखे हैं नेतृत्व के मामले में, उतने कमजोर शायद पहले नहीं दिखे हैं। इसके बावजूद उनकी लोकप्रियता का कम न होना वास्तव में आश्चर्यजनक है। इसके बारे में लेकिन जब मैंने सोच-विचार किया तो मेरे सामने गांधी परिवार के चेहरे आए और समझ आने लगा मुझे मोदी की लोकप्रियता का राज।

मोदी इतने ताकतवर हैं दूसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद कि उनको चुनौती अगर कोई दे सकता है तो सिर्फ कांग्रेस पार्टी, लेकिन ऐसा लगता है कि दो आम चुनाव हारने के बाद भी अपने देश की इस सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी ने कुछ नहीं सीखा है। न हारने के बाद कांग्रेस की रणनीति या नीतियों में कोई परिवर्तन आया है और न ही उनके बड़े नेताओं का घमंड कम हुआ है।

इस राजनीतिक दल के तीन बड़े नेता हैं और तीनों आते हैं उस परिवार से, जिसने आधुनिक भारत पर ऐसे राज किया है जैसे प्राचीन काल में राजा-महाराजा कभी किया करते थे। सो, थोड़ा-बहुत घमंड इस परिवार के सदस्यों में दिखना स्वाभाविक है, लेकिन इतना नहीं, जितना उनके वर्तमान सदस्यों में दिखता है।

आजकल इस परिवार के बुरे दिन चल रहे हैं। मोदी सरकार ने राजीव गांधी फाउंडेशन और राजीव गांधी के नाम पर स्थापित अन्य संस्थाओं की जांच शुरू कराई है, जबसे मालूम हुआ है कि राजीव गांधी फाउंडेशन को चीनी सरकार से चंदा मिला था तीन लाख डॉलर का। इतना ही नहीं, पिछले सप्ताह प्रियंका गांधी का सरकारी मकान वापस ले लिया गया। यानी हर तरह से इस शाही परिवार के बुरे दिन चल रहे हैं, लेकिन उनका घमंड कम नहीं हुआ है।

सो, सोनिया गांधी जब भी दिखती हैं टीवी पर कोई बयान देती हुई, तो ऐसे दिखती हैं जैसे कोई महारानी अपनी खोई हुई जागीर वापस मांग रही हो, किसी हड़पने वाले नौकर से। मोदी सरकार की आलोचना नहीं करती हैं, मोदी को डांटती हैं।

राहुल गांधी जब ट्वीट करते हैं या कोई बयान देते हैं तो या तो बचकाने तरीके से या फिर बदतमीज व्यंग करते हुए। उनकी बहन हैं कि ऐसे पेश आती हैं जैसे वे अभी से बन गई हों उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री। अपने हर दूसरे बयान में याद दिलाती हैं धमकाने के अंदाज में कि ‘मैं इंदिरा गांधी की पोती हूं’। जैसे कि इतना ही काफी होना चाहिए उनका राजनीति की ऊंचाइयों तक पहुंचने के लिए। राजनीति में विनम्रता उतनी ही जरूरी है, जितना साहस और सहनशीलता। विनम्रता इस परिवार के किसी सदस्य में नहीं दिखती है।

ऐसा नहीं कि मोदी और उनके मंत्रियों में कोई खास विनम्रता दिखती हो। उनमें भी सत्ता की अकड़ दिखने लगी है, लेकिन उतनी नहीं, जितनी गांधी परिवार के सदस्यों में दिखती है। आज भी सोनिया गांधी और उनके वारिस ऐसे पेश आते हैं जैसे उनसे उनका जन्मसिद्ध अधिकार छीन लिया गया हो और उसको दुबारा हासिल करके ही रहेंगे। इनके सामने मोदी अच्छे दिखते हैं।

समस्या यह है कि लोकतंत्र की गाड़ी मजबूत विपक्ष के बिना नहीं चल सकती। समस्या यह भी है कि राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष की भूमिका अब भी सिर्फ कांग्रेस अदा कर सकती है। इस भूमिका को अगर ठीक से अदा करना चाहती है कांग्रस पार्टी, तो उसको स्वीकार करना होगा कि जिस परिवार के नाम पर कभी वोट मिलते थे अब नहीं मिलते हैं।

कांग्रेस पार्टी को यह भी स्वीकार करना पड़ेगा कि दो बार लोकसभा चुनावों में पराजित होने के बाद भी कभी गंभीरता से आत्ममंथन नहीं हुआ है। दूसरी बार हारने के बाद राहुल गांधी ने इस्तीफा जरूर दिया अपना, लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष न रहने के बाद भी वे कांग्रेस अध्यक्ष ही रहे हैं।

उनकी माताजी औपचारिक तौर पर होंगी उस पद पर आसीन, लेकिन दुनिया को दिखने लगा है अब कि जब भी उनके बेटे वापस गद्दी पर बैठना चाहेंगे, वे हट जाएंगी अध्यक्ष पद से और वापस अपने बेटे के हाथ में कांग्रेस की कमान दे देंगी। इतनी उलझी रही है कांग्रेस पार्टी नेतृत्व की समस्याओं में कि मोदी की गलतियों का लाभ नहीं उठा पाई है।

मोदी ने अपना परिवर्तन और विकास लाने का वादा न राजनीतिक तौर पर पूरा किया है और न आर्थिक तौर पर। लेकिन उनकी तुलना जब होती है कांग्रेस के शाही परिवार के साथ तो उनका कद ऊंचा दिखता है। यही कारण है शायद कि देश उनकी तरफ आज भी देखता है नेतृत्व के लिए।

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