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साहित्यः गालिब और जौक- एक जुगलबंदी

यह मसायले-तसव्वुफ यह तेरा बयान गालिब, तुझे हम वली समझते जो न बादाख्वार होता’, कहकर खुद पर भी तंज कसने वाले शायर मिर्जा असद उल्लाह खां ‘ गालिब’ के किस्से आज भी लाजवाब हैं।

Author January 22, 2017 12:28 AM

गालिब ने बहादुरशाह जफर के पुत्र मिर्जा जवांबख्त की शादी के लिए एक सेहरा जीनत महल की फरमाइश पर कुछ इस तरह लिखा था, ‘हम सुखन फहम हैं, गालिब के तरफदार नहीं, देखें इस सेहरे से कह दे कोई बेहतर सेहरा।’ इस सेहरे को काफी पसंद किया गया, क्योंकि इसे सुनकर बहादुरशाह जफर समझ गए कि गÞालिब का इशारा जौ़क की तरफ है। उन्होंने जौ़क से भी एक सेहरा लिखने को कहा।

यह मसायले-तसव्वुफ यह तेरा बयान गालिब, तुझे हम वली समझते जो न बादाख्वार होता’, कहकर खुद पर भी तंज कसने वाले शायर मिर्जा असद उल्लाह खां ‘ गालिब’ के किस्से आज भी लाजवाब हैं। आम इंसानी उलझनों से लेकर जन्नत की हकीकत को बेबाकी से बयां करने वाले गालिब के लिए दोस्ती जितनी अहम थी, उतना ही खास था उनका अपने प्रतिद्वंद्वियों को जवाब देने का अंदाज भी। उनकी खुशमिजाजी और जिंदादिली का असर उनके कलाम में भी नजर आता है। शेअरों-अदब की महफिलों में उनके अंदाज के अलग ही चर्चे रहे। कभी महफिल में अपने कलाम से वाहवाही लूटी तो कभी अपने प्रतिद्वंद्वियों पर तंज कसकर भी तारीफ के हकदार बने।
गÞालिब की शेअरो-अदब में दिल्ली का पूरा असर दिखाई देता है। इसी दिल्ली में उन्हें आखिरी मुगल बादशाह बहादुरशाह जÞफर का उस्ताद होने का गौरव हासिल हुआ। हालांकि पहले जÞौक, बहादुरशाह जफर के उस्ताद थे, जो कि उस समय के गÞालिब और कसीदा के उस्ताद शायर माने जाते थे। वहीं गÞालिब को भी फारसी, उर्दू में महारत हासिल थी। इस दौर में शेअरो-अदब की महफिलों पर जÞौक और गÞालिब की शायरी का रंग चढ़ा नजर आता है। ऐसे कई किस्से इतिहास में दर्ज हैं जो बताते हैं कि गÞालिब और जÞौक की आपस में कभी बनती नहीं थी। गÞालिब ने कई मौकों पर जÞौक पर तंज कसे तो जÞौक ने भी गÞालिब को कमतर दिखाने का कोई मौका शायद ही छोड़ा हो, लेकिन इतना साफ है कि इनकी प्रतिद्वंद्विता शायरी को लेकर और अदब की हदों तक ही रही। इसमें कोई भद्दापन नहीं था और अगर यह कहा जाए कि इनकी प्रतिद्वंद्विता से भी उर्दू अदब में बेशकीमती कलाम का इजाफा हुआ तो गलत नहीं होगा।

गÞालिब ने बहादुरशाह जफर के पुत्र मिर्जा जवांबख्त की शादी के लिए एक सेहरा जीनत महल की फरमाइश पर कुछ इस तरह लिखा था, ‘हम सुखन फहम हैं, गÞालिब के तरफदार नहीं, देखें इस सेहरे से कह दे कोई बेहतर सेहरा।’ इस सेहरे को काफी पसंद किया गया, क्योंकि इसे सुनकर बहादुरशाह जफर समझ गए कि गÞालिब का इशारा जÞौक की तरफ है। उन्होंने जÞौक से भी एक सेहरा लिखने को कहा। जÞौक ने भी एक सेहरा लिखकर गÞालिब पर जवाबी वार किया। ‘जिसको दावा हो सुखन का यह सुना दे उसको, देख इस तरह से कहते हैं सुखनवर सेहरा।’ जौक और गालिब की इस तनातनी का आलम यह था कि हर खासो-आम इससे वाकिफ हो चुके थे। यह पहली बार नहीं था बल्कि ऐसे कई मौके आए, जब दोनों आमने-सामने हुए। एक महफिल में जÞौक ने गÞालिब पर यह शेअर कहकर तंज कसा, ‘न हुआ, पर न हुआ मीर का अंदाज नसीब, जÞौक यारों ने बहुत जोर गजल में मारा।’ दरअसल, मिर्जा गÞालिब मीर तकी ‘मीर’ से काफी प्रभावित थे।

मीर ने भी उनके बचपन का शुरुआती कलाम देखकर उनके बेहतर शायर बनने की भविष्यवाणी कर दी थी। एक महफिल में गÞालिब, मीर की तारीफ में कसीदे कह रहे थे। इसी महफिल में जÞौक भी मौजूद थे। गÞालिब के मुंह से मीर की तारीफ जÞौक ने पहली बार सुनी तो उन्होंने भी मिर्जा मुहम्मद रफी ‘सौदा’ की शायरी की तारीफ में कई शेअर कहे। हाजिर जवाब गÞालिब ने भी पलटवार किया, ‘मैं तो आपको मीरी समझता था, अब जाकर मालूम हुआ कि आप तो सौदाई हैं।’ ऐसे ही एक मुशायरे का जिक्र है जिसमें गÞालिब और जÞौक दोनों शामिल थे। मगर बादशाह का बुलावा आ जाने की वजह से जÞौक दूसरों की गजल सुने बगैर ही अपनी सुना कर चल दिए। उनके उठते ही मुशायरा समाप्त हो गया और हर शख्स यह कहते हुए चल दिया कि जो सुनना था सुन लिया अब चलो और सो रहो। उस समय किसी अदबी महफिल में कलाम पर दाद न मिलना और किसी की गÞजल सुने बिना चले जाना बड़ी बेअदबी के तौर पर देखा जाता था। मगर गÞालिब यारों के यार थे और दुश्मनों से दुश्मनी भी बड़े सलीके से निभाते थे। यही वजह है कि उनके घर आखिरी दम तक उनके दोस्तों, मिलने वालों का आना-जाना लगा रहा तो खतों का सिलसिला भी रहा। एक ऐसा ही किस्सा मशहूर है जब दोस्तों के कहने पर गÞालिब ने एक मिसरा कहा। दरअसल, गÞालिब अपने दोस्तों के साथ थे कि तभी कहारों के कंधों पर लदी पालकी में जÞौक बाजार से गुजरे। गÞालिब ने भी जÞौक की तंज भरी मुस्कान को देखा और नजरें नीचे कर लीं, लेकिन उनके दोस्तों ने जÞौक पर शेअर कहने की जिद की तो गÞालिब ने भी ऊंची आवाज में एक मिसरा हवा में उछाल दिया कि, ‘बना है शाह का मुसाहिब, फिरे है इतराता।’ जÞौक ने यह समझने में जरा भी देर नहीं की कि यह मिसरा उन्हीं पर कहा गया है।

इसकी शिकायत जÞौक ने बादशाह जफर से की, क्योंकि जÞौक बादशाह के उस्ताद भी थे। ऐसे में उस्ताद की शान में किसी का तंज कसना उन्हें भी नागवार गुजरा और जÞौक के कहने पर एक मुशायरे का आयोजन किया गया। इसमें गÞालिब को खास तौर पर बुलाया गया। हालांकि, गÞालिब को ताज्जुब तो हुआ कि बहादुरशाह के यहां से उनको बुलावा क्यों आया। मगर वह समझ चुके थे। मुशायरे की महफिल सज गई। तमाम शायरों के साथ गÞालिब भी तय समय पर पहुंच चुके थे तो बहादुरशाह ने कहा, ‘कुछ लोग हमारे उस्ताद जÞौक पर तंज कसते हैं।’ वहां मौजूद जÞौक के साथियों में से एक ने गालिब का नाम लेते हुए कहा कि नौशे मियां ने जÞौक पर तंज कसा है। मिर्जा गÞालिब को दिल्ली में नौशे मियां कहा जाता था, क्योंकि दिल्ली में उनकी ससुराल थी। बादशाह ने गालिब से पूछा, आपने ऐसा कहा?
गÞालिब ने जवाब दिया हुजूर यह मेरी नई गजल का मिसरा है। बादशाह ने गालिब से उसे सुनाने को कहा। गÞालिब ने मक्ता सुना दिया, सारी महफिल ने वाह-वाह किया। मगर जÞौक समझ चुके थे कि गÞालिब ने इसे अभी गढ़ा है, इसलिए जÞौक ने भी गालिबके मक्ते की तारीफ करते हुए बादशाह से पूरी गजल सुनाने पर जोर दिया। बादशाह ने कहा कि आज के मुशायरे की शुरुआत नौशे मियां की गजल से होगी। गालिब कुछ देर के लिए खामोश रहे फिर जेब से कागज का एक छोटा-सा टुकड़ा निकाला और उसे देखते हुए शेअर कहने लगे, ‘हर एक बात पे कहते हो कि तू क्या है, तुम्हीं कहो कि यह अंदाजे-गुफ्तगू क्या है। अंत गालिब ने इसी आखिरी शेअर से किया कि ‘बना है शाह का मुसाहिब, फिरे है इतराता, वरना इस शहर में गालिब की आबरू क्या है।’ महफिल वाहवाही से गूंज उठी। दरअसल, गालिब ने इसे उसी समय गढ़ी थी और दिखाने के लिए खाली कागज का टुकड़ा हाथ में ले लिया था जो हकीकत में कोरा कागज था।
गÞालिब ने दिल्ली के मुशायरे देखे तो 1857 का गदर और दिल्ली में मचे कोहराम को भी न सिर्फ देखा था, बल्कि कलमबंद भी किया था। यह वह दौर था जब उनकी माली हालत बेहद खराब हो चुकी थी। उनके भाई को मार दिया गया था। दिल्ली में हर तरफ अफरा-तफरी का माहौल था और अंगे्रज हर बाशिंदे को शक की निगाह से देख रहे थे। एक दिन गÞालिब को भी गिरफ्तार करके कर्नल ब्राउन के सामने ले जाया गया। कर्नल ने गÞालिब से पूछा, तुम मुसलमान हो?
गÞालिब ने जवाब दिया-आधा। कर्नल उनका जवाब सुनकर समझ नहीं पाया और पूछा आधा किस तरह? कहने लगे, ‘शराब पीता हूं, सुअर नहीं खाता।’ अपने आखिरी समय में गÞालिब बीमार रहने लगे थे। मगर कलम का साथ आखिरी दम तक रहा। मृत्यु से एक दिन पहले गालिब ने एक खत का जवाब कुछ इस तरह दिया, ‘मेरा हाल मुझसे क्या पूछते हो। एक आध रोज में हमसायों से पूछना। तमाम उम्र परेशानियों में गुजारने के बावजूद वे एक जिंदादिल इंसान थे और हाजिर जवाबी उनके लहजे में थी। यहां तक कि गुमनाम खतों में लिखी गालियों पर भी वह मुस्कुरा कर कहते थे कि, गालियां लिखने वालों को यह भी नहीं मालूम कि किस उम्र में किस तरह की गाली देनी चाहिए। ०

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