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मुद्दा: पर्व पर प्रदूषण क्यों

आतिशबाजी और पटाखों के प्रदूषण पर सर्वोच्च न्यायालय ने सख्ती दिखाई है। कोर्ट ने पटाखों की आॅनलाइन बिक्री बंद कर दी। इस फैसले से एक सवाल छिड़ा है, जिसका ताल्लुक पटाखों के इतिहास से जुड़ा है। भारतीय अर्थशास्त्र के प्रतीक पर्व दीपावली पर आतिशबाजी कब, कैसे और क्यों शुरू हुई?

Author November 4, 2018 6:02 AM
प्रतीकात्मक फोटो

शास्त्री कोसलेंद्रदास

आतिशबाजी और पटाखों के प्रदूषण पर सर्वोच्च न्यायालय ने सख्ती दिखाई है। कोर्ट ने पटाखों की आॅनलाइन बिक्री बंद कर दी। इस फैसले से एक सवाल छिड़ा है, जिसका ताल्लुक पटाखों के इतिहास से जुड़ा है। भारतीय अर्थशास्त्र के प्रतीक पर्व दीपावली पर आतिशबाजी कब, कैसे और क्यों शुरू हुई? क्या यह किसी धार्मिक विधान का हिस्सा है? अगर हां, तो आतिशबाजी का जिक्र किसी धर्मग्रंथ में है? इन सवालों के जवाब से तय होगा कि भारत में पटाखों की परंपरा रही है या नहीं? कहा जाता है कि पुरातन साहित्य में आतिशबाजी और पटाखों का जिक्र नहीं है। यहां तक कि संस्कृत कोशों में आतिशबाजी, बंदूक और बारूद के लिए कोई शब्द नहीं है। पर यह बात संस्कृत शास्त्रों से जुड़े अध्येताओं को मान्य नहीं है। उनके हिसाब से अथर्ववेद से लेकर आधुनिक ग्रंथों तक आतिशबाजी, बंदूक और बारूद के पटाखों का जिक्र है।

अथर्ववेद में एक मंत्र है- ‘यदि नो गां हंसि यद्यश्वं यदि पूरुषम्। तं त्वा सीसेन विध्यामो यथा नोऽसौ अवीरहा।।’ इसका अर्थ है- अगर तू हमारी गाय, घोड़े तथा लोगों की हत्या करेगा तो तुझे गोली मार देंगे, यानी नष्ट कर देंगे, जिससे तू वीरों का वध न कर सके। सीस का मतलब बंदूक है। संस्कृत में बंदूक के लिए भुशुंडि और स्फोटक शब्द हैं। बारूद से चलने वाली तोप के लिए संस्कृत शब्द है ‘शतघ्नी’। महाभारत युद्ध में ‘शतघ्नी’ के उपयोग के साक्ष्य हैं। महाभारत में अर्जुन के चलाए अग्निवर्षक बाण कौरव सेना पर गिरे, जिनका रोमांचक उल्लेख है। आग्नेया तथा प्रक्षेपण यंत्र के प्रमाण महर्षि वाल्मीकि की रामायण में हैं। लंका में सीता को खोजते हुए हनुमान ने वहां शस्त्रागार तथा यंत्रागार देखे।

अथर्ववेद का उपवेद है धनुर्वेद। इसमें धनुर्विद्या यानी शस्त्र विद्या तथा सैन्य विज्ञान है। सुदीर्घ काल तक धनुर्वेद के अध्ययन की परंपरा रही है। वैशम्पायन द्वारा रचित ‘नीतिप्रकाशिका’ में धनुर्वेद की विस्तृत जानकारी है। तक्षशिला में वैशम्पायन द्वारा राजा जनमेजय को कराया शिक्षण इस ग्रंथ में राजधर्मोपदेश, खड्गोत्पत्ति, मुक्तायुधनिरूपण, सेनानयन, सैन्यप्रयोग एवं राजव्यापार के रूप में आठ अध्यायों में संकलित है। लुप्तप्राय इस ग्रंथ का जिक्र डॉ. गुस्ताव सोलोमन आॅप्पर्ट ने अपनी पुस्तक ‘प्राचीन हिंदुओं के शस्त्र, सेना, संगठन तथा राजनैतिक आचार संहिता’ में किया है, जो मद्रास से 1880 में छपी थी। आॅप्पर्ट ने नीतिप्रकाशिका का एक श्लोक (5/52) उद्धृत किया है- ‘यंत्रााणि लोहसीसानां गुलिकाक्षेपकाणि च। तथा चोपलयंत्राणि कृत्रिमाण्यपराणि च।।’ तात्पर्य है कि हथियारों में यंत्र, लोहे की बंदूक से गोली, पत्थर मारने के यंत्र तथा दूसरे कृत्रिम शस्त्र हैं।

सत्रहवीं शताब्दी में कांचीपुरम् में हुए कवि वेंकटाध्वरि द्वारा रचित एक ग्रंथ है-विश्वगुणादर्शचम्पू। इसमें वेंकटाध्वरि ने दक्षिण भारत के मंदिरों में आतिशबाजी का मनोहारी वर्णन किया है, जो सम्मोहित करता है कि मंदिर से निकलने वाली भगवान की शोभायात्रा के सामने मशाल जला कर बारूद से आतिशबाजी की जाती है। संस्कृत विद्वान कलानाथ शास्त्री का मानना है कि भारत में प्राचीन काल से ही बंदूक एवं तोप आदि शस्त्रों का वर्णन है। अग्नि से चलने वाले शस्त्रों के शतघ्नी-भुशुंडी जैसे नामों से शब्दकोश भरे पड़े हैं। स्पष्ट है कि बारूद से चलने वाले शस्त्रों का परिज्ञान भारत में बहुत पहले से था।

वहीं, इतिहासकारों का मानना है कि 1526 ईस्वी में काबुल के सुल्तान बाबर ने दिल्ली पर हमला किया। बारूदी तोपों के धमाकों से हिंदुस्तानी सैनिकों के छक्के छूटे और वे भाग खड़े हुए। इससे एक मान्यता बन गई कि बारूद का प्रयोग मुगलों की देन है। मुगल दौर में शादी और जश्नों में बारूद से बने पटाखों से आतिशबाजी होती थी। अकबर के सेनापति मानसिंह प्रथम काबुल और कंधार को जीत कर वहां से बारूद से चलने वाली तोपें लेकर आए, जिन्हें आज भी जयपुर में देखा जा सकता है। इस तरह कहा जाने लगा कि आतिशबाजी मुगलों के बाद शुरू हुई। लेकिन इतिहास के कई विद्वान इसे अधूरी जानकारी बताते हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास विभाग के प्रो. फरहत हसन की राय है कि हिंदुस्तान में पटाखे मुगलों के आने के पहले से थे। यह कहना सही नहीं है कि हिंदुस्तान में पटाखे मुगल लाए। दरअसल, उनसे पहले भी आतिशबाजी होती थी। मुगलों के दौर में आतिशबाजी का इस्तेमाल बढ़ा, पर यह शासक वर्ग तक ही सीमित रहा। आम लोगों तक इसकी पहुंच नहीं के बराबर थी।

सुख्यात मराठी विद्वान परशुराम कृष्ण गोडे ने लिखित साक्ष्यों के सहारे आतिशबाजी के इतिहास पर लंबा शोध किया। उनकी पुस्तक ‘भारत में आतिशबाजी का इतिहास’ में आतिशबाजी की जानकारी के दुर्लभ स्रोत मिलते हंै। पीके गोडे ने अनुसंधान में पाया कि आतिशबाजी के जिक्र का सबसे पुराना ज्ञात पाठ सोलहवीं शताब्दी की शुरुआत का है। ओडीशा के गजपति प्रताप रुद्रदेव द्वारा लिखित ‘कौतुकचिंतामणि’ में गाय के मूत्र से तैयार आतिशबाजी के निर्माण की विधि पर लिखे संस्कृत श्लोक मिलते हैं। गोडे को आतिशबाजी का वर्णन कर्नाटक में 1400 इस्वी के बाद लिखे एक ग्रंथ से और मिला। मराठी संत-कवि एकनाथ ने 1570 इस्वी में लिखे एक पद्य में श्रीकृष्ण और रुक्मिणी के विवाह में आतिशबाजी करवाई है। 1518 में भारत आए पुर्तगाली यात्री बारबोसा ने गुजरात में एक ब्राह्मण परिवार की शादी में आतिशबाजी का संदर्भ लिखा है।

गोडे के अनुसार दीवाली के दौरान आतिशबाजी की शुरुआत 1700 इस्वी के आसपास मराठा क्षेत्र से पेशवा काल में हुई। जाहिर है, दिवाली पर पटाखों की परंपरा महज तीन सौ साल पुरानी है, जो प्राचीन काल में दिवाली का हिस्सा कभी नहीं थी। एक दावा यह भी है कि बारूद का आविष्कार चीन में 850 इस्वी के करीब हुआ। पहली बार बारूद की बंदूक का युद्ध में उपयोग 919 इस्वी में चीन में हुआ। चीन में ही बारूदी कलाबाजियों का खेल पहले-पहल शुरू हुआ। जबकि भारत में बारूद की बंदूकें और तोपें मंगोल लेकर आए। अब दिवाली पर समाज को पटाखों की आदत लग चुकी है। इसे खुशी जाहिर करने का एक तरीका माना जाने लगा है। पटाखे दिवाली के पर्याय हो गए हैं। लोगों के मन-मष्तिष्क में यह बात गहरे से बैठ गई है कि ‘लक्ष्मी-पूजा’ तब तक पूरी नहीं होती, जब तक पटाखे न चलाए जाएं। पर्यावरणविदों का कहना है कि पटाखों से सिर्फ ध्वनि प्रदूषण नहीं होता, बल्कि इससे आसपास के सारे वातावरण का भी दम घुटता है। अंधेरे को मिटाने की चाहत में हम अपने इर्द-गिर्द इतना अंधेरा इकठ्ठा कर लेते हैं, जिससे सांस लेने तक में कठिनाई होने लगती है। रोशनी का त्योहार आतिशबाजी के प्रदर्शन में बदल गया है। दिवाली का ऐतिहासिक प्रकाश मंद पड़ गया है।

भला इतने शोर और धुएं के बीच परम शुद्ध और पवित्र माता लक्ष्मी कैसे अपने चरण धरेंगी? इस विषाक्त वातावरण में वे अपने वैभव का वितरण कैसे और किसे करेगी? पर्यावरण सुरक्षा को पटाखों के धुएं में नहीं उड़ाया जा सकता। दिवाली की जगमग रात में पटाखों के काले धुएं का क्या काम? आज साफ और प्रदूषणमुक्त दीपावली की दरकार है। भविष्य की दिवाली ऐसी हो कि हमारी आने वाली पीढ़ी को शुद्ध हवा, पानी, दूध, अन्न और भाषा आसानी से उपलब्ध हो सके। दिवाली वही है, जिससे आतिशबाजी की बाहरी चमक-धमक के बजाय आंतरिक उजास फैले, जिस पर धमाके के बजाय धर्म का प्रभाव हो। शोर और धुंए में किसी की सांस रुके नहीं, बल्कि हर कोई त्योहारी माहौल में खुलकर खुशियां मना सके। प्रकृति का कण-कण दमक उठे। जब ऐसा होगा तभी सच्चे मायने में दीपावली मनेगी और ‘लक्ष्मी पूजा’ हो सकेगी।

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