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Diwali 2018: प्रकाश की परंपरा

दिवाली स्वच्छता, पवित्रता, सौभाग्य, संपन्नता, ज्ञान और सौहार्द का त्योहार है। यह नई फसल, नए मौसम के स्वागत का भी त्योहार है। दिवाली पर पांच त्योहार एक साथ आते हैं, परस्पर गुंथे हुए। दिवाली मनाने को लेकर अलग-अलग मान्यताएं हैं।

Author Updated: November 4, 2018 5:24 AM
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर (सोर्स: फाइल)

दिवाली स्वच्छता, पवित्रता, सौभाग्य, संपन्नता, ज्ञान और सौहार्द का त्योहार है। यह नई फसल, नए मौसम के स्वागत का भी त्योहार है। दिवाली पर पांच त्योहार एक साथ आते हैं, परस्पर गुंथे हुए। दिवाली मनाने को लेकर अलग-अलग मान्यताएं हैं। इसे केवल हिंदू नहीं, अन्य समुदायों के लोग भी मनाते हैं। दिवाली से संबंधित मान्यताओं, इसकी प्रकृति और इसे कहां-कहां, किस-किस रूप में मनाया जाता है, एक विहंगम दृष्टि।

दिवाली अंधकार पर प्रकाश की विजय के रूप में मनाया जाने वाला त्योहार है। भारत में प्राचीन काल से दिवाली को हिंदू कैलेंडर के कार्तिक माह की अमावस्या को एक त्योहार के रूप में दर्शाया जाता है। दिवाली का उल्लेख पद्मपुराण और स्कंदपुराण नामक संस्कृत ग्रंथों में मिलता है, जो माना जाता है कि पहली सहस्राब्दी के दूसरे भाग में लिखे गए थे। स्कंद पुराण में दीपक को सूर्य के हिस्से का प्रतिनिधित्व करने वाला माना गया है। सूर्य जीवन के लिए प्रकाश और ऊर्जा देता है और जो हिंदू कैलंडर के अनुसार कार्तिक माह में अपनी स्थिति बदलता है।

अलग-अलग नाम
सातवीं शताब्दी के संस्कृत नाटक ‘नागनंद’ में राजा हर्ष ने इसे ‘दीपप्रतिपादुत्सव:’ कहा है, जिसमें दीये जलाए जाते थे और दुल्हन और दूल्हे को उपहार स्वरूप दिए जाते थे। नौवीं शताब्दी में राजशेखर ने ‘काव्यमीमांसा’ में इसे ‘दीपमालिका’ कहा है, जिसमें घरों की पुताई की जाती थी और तेल के दीयों से रात में घरों, सड़कों और बाजारों को सजाया जाता था। फारसी यात्री और इतिहासकार अल-बेरुनी ने भारत पर अपने ग्यारहवीं सदी के संस्मरण में, दिवाली को कार्तिक महीने में नए चंद्रमा के दिन पर हिंदुओं द्वारा मनाया जाने वाला त्योहार कहा है।

अलग-अलग मान्यताएं
आमतौर पर दिवाली को लंका विजय के बाद राम के अयोध्या लौटने की तिथि के रूप में मनाया जाता है। पर कुछ क्षेत्रों में लोग दिवाली को यम और नचिकेता की कथा के साथ भी जोड़ते हैं। नचिकेता की कथा, जो सही बनाम गलत, ज्ञान बनाम अज्ञान, सच्चा धन बनाम क्षणिक धन आदि के बारे में बताती है। नेपालियों के लिए यह त्योहार इसलिए महान है, क्योंकि इस दिन से नेपाल संवत में नया वर्ष शुरू होता है। कृष्ण भक्तिधारा के लोगों का मत है कि इस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने अत्याचारी राजा नरकासुर का वध किया था। इस नृशंस राक्षस के वध से जनता में अपार हर्ष फैल गया और प्रसन्नता से भरे लोगों ने घी के दीए जलाए। एक पौराणिक कथा के अनुसार विष्णु ने नरसिंह रूप धारण कर हिरण्यकश्यप का वध किया था तथा इसी दिन समुद्रमंथन के बाद लक्ष्मी और धन्वंतरि प्रकट हुए।

जैन मतावलंबियों के अनुसार चौबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी को इस दिन मोक्ष की प्राप्ति हुई थी। इसी दिन उनके प्रथम शिष्य, गौतम गणधर को ज्ञान प्राप्त हुआ था।सिखों के लिए भी दिवाली महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इसी दिन अमृतसर में 1577 में स्वर्ण मंदिर का शिलान्यास हुआ था। इसके अलावा 1619 में दिवाली के दिन सिखों के छठे गुरु हरगोबिंद सिंह जी को जेल से रिहा किया गया था। इसके अलावा पंजाब में जन्मे स्वामी रामतीर्थ का जन्म और महाप्रयाण दोनों दिवाली के दिन ही हुआ। भारत के पूर्वी क्षेत्र ओडीशा और पश्चिम बंगाल में लोग लक्ष्मी की जगह काली की पूजा करते हैं, और इस त्योहार को काली पूजा कहते हैं। मथुरा और उत्तर मध्य क्षेत्रों में इसे भगवान कृष्ण से जुड़ा मानते हैं। अन्य क्षेत्रों में गोवर्धन पूजा (या अन्नकूट) के भोज में कृष्ण के लिए छप्पन या एक सौ आठ विभिन्न व्यंजनों का भोग लगाया जाता है और इसे साझा तौर पर स्थानीय समुदाय द्वारा मनाया जाता है।

त्योहारों का समुच्चय
दिवाली अकेला त्योहार नहीं, बल्कि यह त्योहारों का समुच्चय है। दशहरे के बाद से ही इसकी तैयारियां शुरू हो जाती हैं। यह पांच दिवसीय महोत्सव देवताओं और राक्षसों द्वारा क्षीर सागर के मंथन से पैदा हुई लक्ष्मी के जन्म दिवस से शुरू होता है। दिवाली की रात वह दिन है, जब लक्ष्मी ने अपने पति के रूप में विष्णु को चुना और फिर उनसे विवाह किया। लक्ष्मी के साथ-साथ भक्त बाधाओं को दूर करने के प्रतीक गणेश; संगीत, साहित्य की प्रतीक सरस्वती; और धन प्रबंधक कुबेर को प्रसाद अर्पित करते हैं।’ दिवाली से दो दिन पूर्व धनतेरस का त्योहार आता है। मान्यता है कि इस दिन धातु की चीजें खरीदना सौभाग्य की बात है। इसलिए सोने-चांदी के आभूषण और विभिन्न धातुओं के बरतन खरीदना शुभ माना जाता है। इस दिन तुलसी या घर के द्वार पर एक दीपक जलाया जाता है। इससे अगले दिन नरक चतुर्दशी या छोटी दिवाली होती है। इस दिन यम पूजा के लिए दीपक जलाए जाते हैं। अगले दिन दिवाली आती है। पूरे घर की साफ-सफाई करके इस दिन तरह-तरह के पकवान बनाए जाते हैं। बाजारों में खील-बताशे, मिठाइयां, खांड़ के खिलौने, लक्ष्मी-गणेश आदि की मूर्तियां बिकने लगती हैं। सुबह से ही लोग रिश्तेदारों, मित्रों, सगे-संबंधियों के घर मिठाइयां और उपहार बांटने लगते हैं। दिवाली की शाम लक्ष्मी और गणेश जी की पूजा की जाती है। पूजा के बाद लोग अपने-अपने घरों के बाहर दीपक और मोमबत्तियां जलाकर रखते हैं। देर रात तक कार्तिक की अंधेरी रात पूर्णिमा से भी से भी अधिक प्रकाशयुक्त दिखाई पड़ती है।

दिवाली से अगले दिन गोवर्धन पूजा की जाती है। माना जाता है कि इसी दिन कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी अंगुली पर उठा कर इंद्र के कोप से डूबते ब्रजवासियों को बचाया था। इस दिन लोग अपने गाय-बैलों को सजाते और गोबर का पर्वत बना कर पूजा करते हैं। अगले दिन भाई दूज का पर्व होता है। इस दिन भाई और बहन के गांठ जोड़ कर यमुना नदी में स्नान करने की परंपरा है। बहन अपने भाई के मस्तक पर तिलक लगा कर उसके मंगल की कामना करती है और भाई उसे कुछ न कुछ भेंट देता है।’ दिवाली के दूसरे दिन व्यापारी अपने पुराने बहीखाते बदल देते हैं। उनका मानना है कि ऐसा करने से धन की देवी लक्ष्मी की उन पर विशेष अनुकंपा रहेगी।’ कृषक समाज के लिए इस पर्व का विशेष महत्त्व है। खरीफ की फसल पक कर तैयार हो जाने से कृषकों के खलिहान समृद्ध हो जाते हैं। कृषक समाज अपनी समृद्धि का यह पर्व उल्लासपूर्वक मनाता है।

मुगलकाल में दिवाली
आमतौर पर दिवाली हिंदू मनाते हैं, पर सिख, जैन आदि समुदाय के लोगों के अलावा अनेक जगहों पर मुसलिम समुदाय के लोग भी बढ़-चढ़ इसमें हिस्सा लेते हैं। मुगल काल में दीन-ए-इलाही के प्रवर्तक सम्राट अकबर के शासनकाल में दौलतखाने के सामने चालीस गज ऊंचे बांस पर एक बड़ा आकाशदीप दिवाली के दिन लटकाया जाता था। बादशाह जहांगीर भी दिवाली धूमधाम से मनाते थे। मुगल वंश के अंतिम सम्राट बहादुर शाह जफर दिवाली को त्योहार के रूप में मनाते थे और इस अवसर पर आयोजित कार्यक्रमों में वे भाग लेते थे। शाह आलम द्वितीय के समय में समूचे शाही महल को दीपों से सजाया जाता था और लालकिले में आयोजित कार्यक्रमों में हिंदू-मुसलमान दोनों भाग लेते थे।

दिवाली पर कुरीतियां
दिवाली जहां स्वच्छता, पवित्रता और सौहार्द का त्योहार है, वहीं इसके साथ कुरीतियां भी जुड़ गई हैं। कई लोग इस दिन जुआ खेलने को शुभ मानते हैं। कुछ लोग शराब का सेवन करते हैं। इसके अलावा पटाखे फोड़ने की प्रथा अब समस्या का रूप ले चुकी है। कोई भी त्योहार मनुष्य के जीवन में मंगलकामना के साथ मनाया जाता है, उसमें लोग खुद से यह तर्क क्यों नहीं करते कि ऐसी कुरीतियों की त्योहारों में क्यों जगह होनी चाहिए।

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