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विमर्शः साहित्य से विस्थापित होता अन्य

भारत में रचित साहित्य की एक खास विशिष्टता रही कि उसमें ‘अन्य’ को भी उतना ही महत्त्व दिया गया है, जितना मनुष्य को। ‘अन्य’ से अभिप्राय मनुष्येतर जगत से है, जिसके अंतर्गत पृथ्वी और उस पर विद्यमान पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, पर्वत, नदियां, समुद्र आदि सभी शामिल हैं।

मनुष्य और ‘अन्य’ के बीच अन्योन्याश्रित संबंधों का निर्वाह कमोबेश मध्यकालीन साहित्य तक होता रहा, लेकिन यूरोप से आई आधुनिकता की आंधी से साहित्य से ‘अन्य’ या मनुष्येतर विस्थापित होता गया।

भारत में रचित साहित्य की एक खास विशिष्टता रही कि उसमें ‘अन्य’ को भी उतना ही महत्त्व दिया गया है, जितना मनुष्य को। ‘अन्य’ से अभिप्राय मनुष्येतर जगत से है, जिसके अंतर्गत पृथ्वी और उस पर विद्यमान पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, पर्वत, नदियां, समुद्र आदि सभी शामिल हैं। कहीं-कहीं तो हमारे प्राचीन साहित्य में मनुष्येतर प्राणियों को मनुष्य से भी अधिक महत्त्व दिया गया है। उल्लेखनीय है कि हमारे आदि कवि के रूप में विख्यात वाल्मीकि ने ‘मा निषाद प्रतिष्ठाम्…’ श्लोक की जो रचना की, वह मिथुनरत क्रौंच पक्षी के एक व्याध, जो मनुष्य ही था, द्वारा मारे जाने पर शोकातुर होकर की थी। कहा जाता है कि उस व्याध की क्रूरता ने वाल्मीकि के अंदर ऐसा शोक पैदा किया, जो आदि श्लोक के रूप में उसे शाप देने के लिए उनके अंत:करण से फूट पड़ा।

‘महाभारत’ में राजा शिवि की यह कथा भी बहुश्रुत है कि वे शरणागत कबूतर की प्राण रक्षा के लिए उसका भक्षण करने को तत्पर बाज को अपने शरीर का अंग काट कर देने लगे थे। ऐसी ही प्रवृत्ति कालिदास के महाकाव्य ‘रघुवंशम्’ में दिखाई पड़ती है, जब राजा दिलीप नंदिनी गाय को शेर से बचाने के लिए उसके भोज्य रूप में खुद को समर्पित कर देते हैं। ये सब प्रमाण हैं कि हमारा साहित्य शुरू से ही सिर्फ मनुष्य केंद्रित न रह कर मनुष्य के साथ-साथ ‘अन्य’ के सहअस्तित्व के प्रति भी पाठक को संवेदनशील बनाने वाला रहा है। इसके अलावा हमारे साहित्य में मनुष्य के अंदर पृथ्वी या प्रकृति के प्रति भी आत्मीयता का भाव पैदा करने की प्रवृत्ति रही है।

भारतीय वांग्मय का यह श्लोक इसी का प्रमाण है- ‘समुद्र-वसने! देवि। पर्वत-स्तन-मंडले, विष्णु-पत्नि नमस्तुभ्यम् पाद-स्पर्श क्षमस्व मे।’ यानी समुद्ररूपी वस्त्र को और पर्वतों के रूप में स्तन को धारण करने वाली विष्णु-पत्नी पृथ्वीमाता को नमस्कार करते हुए उस पर पैर रखने के अपराध के लिए क्षमा-याचना का निवेदन किया गया है। गौरतलब है कि पश्चिम की रूमानी कविता या फिर हमारे छायावादी काव्य में प्रकृति के मानवीकरण की खूब चर्चा की जाती है, पर यह मानवीकरण बहुत पहले से भारतीय साहित्य की विशिष्टता रहा है। यह भी ध्यान रखने योग्य बातें है कि हमारे यहां जन्म, विवाह, श्राद्ध आदि से जुड़े कर्मकांडों में जो मंत्र पढ़े जाते हैं, उनमें गंगा, यमुना, सरस्वती, गोदावरी, नर्मदा, सिंधु, कावेरी आदि नदियों की भी स्तुति की जाती है।

ये सारी चीजें हमारे साहित्य में भी मिथकों, आस्थाओं, प्रतीकों, ईश्वर की छवियों के रूप में अभिव्यक्ति पाती हुई मनुष्य का मनुष्येतर जगत से, धरती से लेकर आकाश तक से रिश्ता बनाती रही हैं- धरती को माता और आकाश को पिता के रूप में ही संबोधित किया गया। इन्हीं वास्तविकताओं को ध्यान में रखते हुए आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने काव्य को शेष सृष्टि के साथ मनुष्य के रागात्मक संबंधों की रक्षा और निर्वाह करने के साधन स्वरूप परिभाषित करते हुए मनुष्य और मुनष्येतर के सहसंबंध की महत्ता को उजागर किया था। कथाकार-चिंतक निर्मल वर्मा भी अपने निबंधों में संस्कृति के संदर्भ में बार-बार मिथकों, प्रतीकों, आस्थाओं आदि के महत्त्व को रेखांकित करते हैं, तो इसलिए कि ये सब मनुष्य का ‘अन्य’ से आत्मीय संबंध स्थापित करने वाले रहे हैं।

मनुष्य और ‘अन्य’ के बीच अन्योन्याश्रित संबंधों का निर्वाह कमोबेश मध्यकालीन साहित्य तक होता रहा, लेकिन यूरोप से आई आधुनिकता की आंधी से साहित्य से ‘अन्य’ या मनुष्येतर विस्थापित होता गया। यूरोप में हुई औद्योगिक क्रांति, उससे उत्पन्न पूंजीवाद, फिर पूंजीवाद से उत्पन्न शोषण-दोहन जैसी समस्याओं के निदानार्थ आया मार्क्सवाद या समाजवाद, सबके चिंतन-केंद्र में सिर्फ मनुष्य ही महत्त्व प्राप्त करता गया। कैसे मनुष्य का जीवन अधिक से अधिक खुशहाल हो, समतापरक हो, यही सरोकार प्रधानता पाते गए और ‘अन्य’ के उन्मूलन तथा विनाश की परवाह किए बगैर मनुष्य-समाज को अधिक से अधिक आराम, सुविधा देने का लक्ष्य अर्थनीति और राजनीति के साथ-साथ साहित्य में भी अहमियत पाता गया।

यहां स्मरणीय है कि औद्योगीकरण तथा शहरीकरण की बढ़ती लपटों से ही भयाक्रांत होकर यूरोप के रूमानी कवियों ने ‘प्रकृति की ओर वापसी’ का स्वर मुखरित किया था, लेकिन वह नक्कारखाने में तूती की आवाज सिद्ध हुई और राजनीतिक तथा आर्थिक परिवर्तनों के दबाव में साहित्य यथार्थवाद, अतियथार्थवाद, समाजवाद या फिर मार्क्सवाद के नाम पर मात्र मनुष्य तक सिमटता चला गया। इसे लक्ष्य करते हुए गांधीवादी चिंतक धर्मपाल ने सही कहा है कि आधुनिक सभ्यता मनुष्य केंद्रित सभ्यता है, जिसमें अन्य की चिंता की कोई गुंजाइश नहीं, जो भारतीय चिंतन से बिल्कुल पृथक, विपरीत है। इस लिहाज से निर्मल वर्मा की यह शिकायत वाजिब है कि ‘पश्चिम के ऐतिहासिक हस्तक्षेप ने भारतीयों को उनके इस सांस्कृतिक आवास से विस्थापित किया, ये मिथक, विश्वास और आस्थाएं टूट-बिखर कर सिर्फ मानवशास्त्रीय अवधारणाएं बन कर रह गर्इं, जीवन का स्रोत नहीं, सिर्फ अध्ययन और शोध की सामग्री मात्र।’

दुर्भाग्यवश हमारे हिंदी साहित्य में इस मनुष्य-केंद्रित सभ्यता के प्रभाव में साहित्य-सृजन और आलोचना विमर्श तेजी से होने लगे। यथार्थवाद, प्रगतिवाद, मार्क्सवाद, दलित विर्मश, स्त्री विमर्श आदि सब के सब मनुष्य केंद्रित ही तो है। इनमें कहां है पशु-पक्षियों, नदी पहाड़, जंगल आदि के मिटते जाने की चिंता! मशीनीकरण और शहरीकरण के बढ़ते कदम इस मनुष्येतर जगत को मिटाते जा रहे हैं- कितने पक्षियों, पशुओं की प्रजाति समाप्त हो रही है, पृथ्वी के स्तन-पर्वत निर्ममतापूर्वक तोड़े जा रहे हैं, नदियों को बांधों के हवाले कर मारा जा रहा है, लेकिन हमारा साहित्य सिर्फ नाना वादों और विमर्शों के नाम पर सिर्फ मनुष्य को लेकर बढ़ता चला जा रहा है। छायावाद ने प्रकृति को लेकर जो रागात्मकता प्रकट की, उसे पलायनवादी प्रवृत्ति मान कर परवर्ती रचनाकार कटते चले गए और वर्ग-संघर्ष या फिर दलित या स्त्री विमर्श तक पहुंच कर ‘अन्य’ से और अधिक अलग-थलग पड़ते गए। जिन मुक्तिबोध को कुछेक आलोचकों ने छायावादोत्तर काल का सबसे बड़ा कवि सिद्ध कर रखा है उनके यहां कहां है इस ‘अन्य’ के मिटते जाने की चिंता!

यही नहीं, पश्चिम से आए संरचनावादी, उत्तर-आधुनिकवादी, विखंडनवादी जैसे बौद्धिक विमर्शों ने तो साहित्य-जगत से ‘अन्य’ को खदेड़ने में और अधिक कारगर भूमिका निभाई। यथार्थवाद, प्रगतिवाद, साम्यवाद या फिर अस्तित्ववाद भी नहीं ‘अन्य’ को तो, कम-से-कम मनुष्य को तो केंद्र में रख कर चले, लेकिन संरचनावाद, उत्तर-आधुनिकतावाद, विखंडनवाद तो शब्दों की बाजीगरी के सिवा कुछ नहीं हैं। इनके विमर्शों में ‘अन्य’ तो है ही नहीं, मनुष्य भी गायब है, है तो सिर्फ शब्द-क्रीड़ा़, वाक-चातुर्य, बाल की खाल निकालने की बौद्धिक कवायद। इन विमर्शों ने भी कुछेक आलोचकों को इस कदर मोहाविष्ट कर रखा है कि उन्हें शब्दों-वाक्यों की शल्य-चिकित्सा करने में ही परम संतोष का अनुभव होता है।

निस्संदेह ‘अन्य’ का या मनुष्येतर का साहित्य जगत से बहिष्कृत होते जाना खेदजनक है। यह साहित्य को मनुष्य केंद्रित बना कर शेष सृष्टि से उसके रागात्मक संबंध को छिन्न-भिन्न कर आत्मकेंद्रित बनाता जा रहा है, संवेदनशीलता का अपहरण करता जा रहा है। इसे देखते हुए यह कहने में संकोच नहीं है कि साहित्य की उस भारतीय परंपरा की वापसी अत्यंत वांछनीय है, जो पशु-पक्षी, धरती, आकाश, नदी, पहाड़, जंगल सबके प्रति आत्मीयता और मैत्री का रिश्ता स्थापित करती आई थी। अंतत: जयशंकर प्रसाद के शब्दों में यही कहा जा सकता है- ‘अपने से सब कुछ भर, कैसे व्यक्ति विकास करेगा, यह एकांत स्वार्थ भीषण है अपना नाश करेगा। ‘अपना नाश’ करने वाले इस एकांत स्वार्थ से ऊपर उठ कर साहित्य सृजन को ‘अन्य’ को पुन: अपने दामन में समेटना होगा, तभी उस संवेदनशीलता का विकास हो सकेगा, जो अपने नाश को रोक सकेगा।

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