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चर्चा: प्रकाशन में भागीदारी का सवाल

विश्व पुस्तक मेला शुरू हो चुका है। एक बार फिर पुस्तक , प्रकाशक, पाठक के आपसी संबंधों को लेकर चर्चा हो रही है। तथ्य यह भी है कि हमारे देश में प्रकाशन उद्योग निरंतर प्रगति कर रहा है। हर साल कुछ अधिक किताबें छपने लगी हैं। विषय-वस्तु के मामले में प्रकाशन उद्योग का दायरा बढ़ा है। इसके बावजूद लेखक-प्रकाशक संबंधों में कड़वाहट की बातें होती रहती हैं। पर अब प्रकाशन उद्योग एक नए दौर में प्रवेश कर चुका है, जहां प्रचार-प्रसार के तरीके बदले हैं, प्रकाशक सिर्फ सरकारी खरीद पर निर्भर नहीं रह गए हैं। पाठकों से सीधा संपर्क बढ़ा है। इस बार की चर्चा इसी पर। - संपादक

Author January 6, 2019 4:58 AM
सोशल मीडिया की उपस्थिति ने पुस्तक और प्रकाशन व्यवसाय को नए तरह का लोकतांत्रिक आयाम दिया है। यहां एक ऐसी जगह बनी है, जहां छोटा से छोटा प्रकाशक अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा सकता है। लेखक निजी तौर पर अपनी पुस्तक को प्रचारित-प्रसारित कर सकता है। बिक्री के आनलाइन केंद्रों ने ब्रांडों के एकाधिकार को चुनौती दी है।

पिछले कुछ दशक में हिंदी किताबों की दुनिया दिल्ली केंद्रित होती गई है। गढ़ और मठ केवल आलोचना के बने हों, ऐसा नहीं है- प्रकाशनों ने भी गढ़ और मठ बनाए हैं। कुछ प्रकाशनों का रुतबा बेहिसाब है। यह रुतबा प्रकाशनों ने एक दिन में नहीं हासिल किया है। यह एक दीर्घकालीन सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक प्रक्रिया का परिणाम है। राजनीति में विकेंद्रीकरण की चाहे जितनी बात की जाती रही हो, उसका आचरण केंद्रीकरण का ही रहा है। राजनीति के केंद्रीकरण ने जीवन के अन्य क्षेत्रों में भी इसे बढ़ावा दिया। ज्ञान-विज्ञान, साहित्य, कला और संस्कृति के क्षेत्र में भी केंद्रीकरण का रोग पसरता गया। इसका सबसे बड़ा दुष्परिणाम यह हुआ कि संस्कृति के क्षेत्रीय और स्थानीय केंद्र तबाह होते चले गए। मुंबई, कोलकाता, पटना, बनारस, इलाहाबाद, लखनऊ, गोरखपुर, इंदौर, भोपाल, जबलपुर, जयपुर, उदयपुर जैसे शहरों से संस्कृति उद्यम या तो उजड़ते या फिर मद्धिम पड़ते चले गए। इसी के साथ सब कुछ दिल्ली केंद्रित होता गया। प्रकाशन व्यवसाय दिल्ली में सिमटता गया या दिल्ली पर निर्भर होता गया।

दिल्ली के कुछ प्रकाशनों ने धीरे-धीरे अपनी ब्रांडिंग की। इस ब्रांडिंग में केवल विज्ञापन कौशल का योगदान नहीं था। इन प्रकाशकों ने पुस्तक बिक्री का अपना तंत्र विकसित किया और सरकारी खरीद के तंत्र को सिद्ध किया। कुछ लेखकों को स्टार भी बनाया और इन स्टार लेखकों/ आलोचकों को अपने ब्रांड अंबेसेडर की भूमिका दे दी। जैसे कोई बड़ा स्टार या अभिनेता किसी उत्पादन का विज्ञापन करता है, उसी तरह कुछ लेखक प्रकाशनों के प्रचारक बन गए। पुरस्कार और सम्मान के तंत्र ने भी इस ब्रांड निर्माण में भूमिका अदा की। किताबों को चर्चित और पुरस्कृत करने-कराने का साझा उद्योग विकसित हो गया। इस तरह पुरस्कार-सम्मान, नौकरशाह, विज्ञापन और कतिपय नामी-गिरामी लेखकों के गठजोड़ से कुछ प्रकाशनों ने ब्रांड की छवि अर्जित कर ली। पुस्तक प्रकाशन में ब्रांड निर्माण ने साहित्य और लेखन की दुनिया के भीतर से लोकतांत्रिक जगह को कम किया। चंद प्रकाशनों की ब्रांडिंग से नए और दूर-दराज के लेखकों का रास्ता कठिन होता गया। किसी खास प्रकाशन से किताब का छपना बेहतर लेखक होने की गारंटी बन गया। ब्रांडेड प्रकाशनों से किसी की किताब छप गई, तो वह बहुत आसानी से रातोंरात कवि/ लेखक/ आलोचक होने का तमगा हासिल कर लेता है। एक बार ब्रांड बन जाने के बाद कुछ प्रकाशकों का रवैया सामंतों जैसा हो गया। बहुतेरे लेखकों ने रातोंरात लेखक बनने के लिए ब्रांडेड प्रकाशनों की उल-जुलूल शर्तों को माना या कहें कि उन्हें मानना पड़ा। किस्सा कोताह यह कि लेखन और प्रकाशन जो मुख्यतया लोकतांत्रिक चेतना की उपज हैं, और जिन्हें स्वयं लोकतांत्रिक चेतना का प्रसार करना था, वे स्वयं आलोकतांत्रिक होते चले गए।

पुस्तक मेलों के आयोजन ने कुछ हद तक इस यथास्थिति को बदला है। मेलों के माध्यम से ऐसे प्रकाशनों की उपस्थिति दर्ज होने लगी, जिन्हें सुविधा के लिए हाशिये के प्रकाशन कह सकते हैं। उन्हें अपने वांछित पाठकों और पुस्तक प्रेमियों तक पहुंचने का अवसर मिला। इस प्रक्रिया में पुस्तक प्रेमियों को भी अपनी रुचि के अनुरूप पुस्तकों तक पहुंचने का अवसर मिला। अनेक ऐसे लेखकों, जिनका प्रकाशन तंत्र से तालमेल नहीं बन पाया और वे खुद अपने प्रकाशक हुए, को भी अपनी किताबें अपने अज्ञात पाठकों तक ले जाने का अवसर मिला। वे सुविधाजनक ढंग से अपनी बात अपने श्रोता वर्ग तक पहुंचा सके। पुस्तक मेले एक तरह से वैकल्पिक सांस्कृतिक उत्सव बनते गए। पुस्तक मेलों ने लेखकों को आपस में मिलने-जुलने, लेखक-पाठक संवाद आदि के अवसर दिए। इस नाते पुस्तक मेले साहित्यिक कुंभ के रूप में लोकप्रिय हुए। आखिर कुंभ में भी तो देश की विविधता उपस्थित होकर संवाद करती रही है। वह संवाद पुस्तक मेलों में अपने ढंग से होने लगा। खासकर नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा दिल्ली के प्रगति मैदान में आयोजित होने वाला पुस्तक मेला बहुत सारे लेखकों-पाठकों के सालाना कलेंडर का हिस्सा, तो बहुतों के लिए हसरत और सपना बन गया। क्षेत्रीय भाषाओं की पुस्तकों के लिए भी पुस्तक मेला एक अवसर की तरह बनता गया। हालांकि मेले में भागीदारी के दिनोंदिन महंगी होते जाने से पुस्तक संस्कृति के भीतर का लोकतंत्र एक बार फिर सीमित होता गया। यह बात जरूर ध्यान रखनी चाहिए कि पुस्तक मेले महज व्यवसाय नहीं हैं। पुस्तकें हमारी चित्ति का निर्माण करती और हमें नए सिरे से गढ़ती हैं। वे ज्ञान का स्रोत, नए ज्ञान का सृजन और ज्ञान के प्रसार का माध्यम होती हैं। मध्यकाल में जो महिमा सत्संगति की थी, वही महिमा आज पुस्तकों को हासिल है। इसलिए मेलों के आयोजन को अधिक से अधिक भागीदारिता वाला बनाया जाना चाहिए। मतलब यह कि जो क्षेत्रीय भाषाओं के प्रकाशन हैं, जो हाशिये के प्रकाशन हैं या जो अपरंपरित प्रकाशन हैं उनको अतिरिक्त सुविधा देकर उनकी सहभागिता सुनिश्चित की जानी चाहिए।

भारतीय मनीषा सदियों से लोक और शास्त्र के संतुलन से जीवन रस प्राप्त करती रही है। ब्रांडिंग के कारण एक तरह का असंतुलन पैदा होता है। ब्रांडिंग में शास्त्र पक्ष तो प्रभावी रूप में सामने आता है, लेकिन लोक पक्ष कहीं छूट जाता है। लोक पक्ष यानी हमारा देशज ज्ञान। देशज ज्ञान से दूर होते जाने की वजह से बहुतेरी समस्याएं पैदा हुई हैं। अपरंपरित प्रकाशन इस छूटे हुए की भरपाई करते हैं। इसलिए भी छोटे और हाशिये के प्रकाशनों को अवसर उपलब्ध कराना चाहिए। ज्ञान की संपूर्णता और उसके लोकतंत्रीकरण के लिए यह अति आवश्यक है। अच्छी बात यह है कि सोशल मीडिया की उपस्थिति ने पुस्तक और प्रकाशन व्यवसाय को नए तरह का लोकतांत्रिक आयाम दिया है। यहां एक ऐसी जगह बनी है, जहां छोटा से छोटा प्रकाशक अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा सकता है। लेखक निजी तौर पर अपनी पुस्तक को प्रचारित-प्रसारित कर सकता है। बिक्री के आनलाइन केंद्रों ने ब्रांडों के एकाधिकार को चुनौती दी है। अगर आपकी पुस्तक में दम है तो वह अब बिना ब्रांड के भी पाठकों का ध्यान आकृष्ट कर और उन तक पहुंच सकती है। ऐसे में छोटे प्रकाशकों के लिए एक नए तरह की लोकतांत्रिक जगह बनी है। इसने पुस्तक/ प्रकाशन उद्योग में एक नए तरह की गतिशीलता पैदा की है। दूरस्थ जगहों से भी कुछ नए और महत्त्वपूर्ण प्रकाशन संभव हुए हैं और भविष्य में संभव होंगे।

कुछ लोग कह सकते हैं कि सोशल मीडिया ने एक तरह की अराजकता पैदा की है, बड़बोले और आत्म मुग्ध लोगों को कहीं ज्यादा अवसर दे दिया है। लेकिन भारतीय समाज में यह एक सामाजिक रोग की तरह है। सोशल मीडिया के जन्म से सदियों पहले तुलसीदास- पंडित सोई जो गाल बजावा- कह कर इसका संकेत कर चुके हैं। सोशल मीडिया पर ऐसे लोगों की बहुतायत है, जो इसका इस्तेमाल गाल बजाने के लिए और निर्लज्जता पूर्वक अपनी करनी को ‘भांति अनेक बार बहुबरनी’ करते रहते हैं। लेकिन यह भी सही है कि सोशल मीडिया में बेहतर के लिए भी बराबर गुंजाइश है। इस गुंजाइश का भरपूर सकारात्मक लाभ उठाया जाना चाहिए। देखने में यह भी आया है कि इस नए वातावरण में छोटे प्रकाशकों में एक अघोषित-सी सहकारिता विकसित हो रही है। जरूरत इस बात की है कि कम से कम हिंदी और हिंदी क्षेत्र की जनपदीय भाषाओं में औपचारिक रूप से सहकारी प्रकाशनों को विकसित करने की पहल हो। भारत की अनेक भाषाओं में ऐसे सहकारी प्रयास सफलता से चल रहे हैं। मलयाली और बांग्ला के उदाहरणों से बहुत कुछ सीख सकते हैं। ऐसे सहकारी प्रयासों से ही प्रकाशन को ब्रांड के अधिनायकत्व से मुक्ति दिलाई जा सकती है। जाहिर है, ऐसी सहकारिता ज्ञान, सर्जना और कला पर इजारेदारी की कोशिशों को खत्म कर सर्व सुलभ बना सकती है।

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