ताज़ा खबर
 

अनुवाद कॉलम में देवशंकर नवीन का लेख : अनुवाद का मकसद

साहित्य अकादेमी या अन्य संस्थान बेशक आज अनुवाद-कार्य से जुड़े लोगों को सम्मानित करते हैं, पर तथ्य है कि भाषा और साहित्य के ज्ञान से संपन्न प्रथम श्रेणी की प्रतिभाएं इस क्षेत्र में पांव रखने से अब हिचकती हैं।

Author नई दिल्ली | June 12, 2016 2:45 AM
representative image

अनुवाद कौशल से धनार्जन के अवसर इधर बढ़े हैं। संचार माध्यमों, सरकारी-गैरसरकारी कार्यालयों, पर्यटन, व्यापार, शिक्षण, प्रकाशन-उद्योग- सभी क्षेत्रों में अनुवादकों की मांग बढ़ी है। अनुवाद के हुनर की पहचान पिछले कुछ वर्षों में कमाई के साधन के रूप में हुई है। इसके कई कारण हैं- शिक्षण, संचार-तंत्र और व्यापार के क्षेत्र में बीते तीन दशकों में आए बेशुमार विस्तार से अनुवाद का सहयोग अनिवार्य हो गया है। विज्ञान के अवदान से इन क्षेत्रों में संभावनाएं इतनी बढ़ीं कि ज्ञान, संचार और व्यापार के छोटे-छोटे अंशों में विशेषज्ञता की आवश्यकता होने लगी। मनुष्य की यही आवश्यकता कभी अनुवाद के आविष्कार की जननी बनी थी; इधर आकर इसी आवश्यकता ने अनुवाद की उपयोगिता बढ़ाई; और आज अनुवाद-उद्यम का उर्वर बाजार खूब फलता-फूलता नजर आ रहा है।

अंगरेजी समेत विभिन्न भारतीय भाषाओं से हिंदी में बड़े पैमाने पर अनुवाद हो रहे हैं, बड़ी संख्या में अनूदित किताबें छप और बिक रही हैं। हिंदी प्रकाशन के पिछले छह दशकों का जायजा लें, तो कुल प्रकाशित सामग्री में अनूदित पाठ का बड़ा हिस्सा मिलेगा। इनमें साहित्यिक और कार्यालयी पाठ के अलावा पाठ्य-पुस्तकों के अनुवाद भी शामिल हैं। पर तथ्य है कि अधिकतर अनुवादक अनुवाद-कर्म को गंभीरता से नहीं लेते। अनुवादक की नैतिकता का उनकी नजर में कोई अर्थ नहीं है। दरअसल, हर अनुवादक को इस नैतिक सवाल पर विचार करना चाहिए कि आखिरकार वे अनुवाद करते क्यों हैं। इसका उद्देश्य केवल धनार्जन रहता है या इस उद्यम में उनका कोई नैतिक दायित्व भी है!

किसी पाठ के अनुवाद की जरूरत इसलिए होती है कि देश-दुनिया की किसी भाषा में कही गई ज्ञान की किसी बात से वे लोग भी वाकिफ हों, जिन्हें वह भाषा नहीं आती। तब तो हर अनुवादक, संपादक और प्रकाशक का दायित्व है कि वे अनूदित पाठ को बोधगम्य बना कर प्रस्तुत करें! पर व्यावहारिक तौर पर ऐसा होता नहीं। देखा जा रहा है कि अनुवाद की अपठनीयता और अबूझपन के कारण पाठक अंतत: उसके अंगरेजी पाठ की शरण में जाते हैं। जब पाठ समझ में ही न आए, तो आखिरकार ऐसे अनुवाद का प्रयोजन क्या है!जाहिर है कि अंगरेजी पढ़ कर समझ लेने वालों के लिए किसी अंगरेजी पाठ का हिंदी अनुवाद नहीं होता। यह अनुवाद उनके लिए होता है, जिनका अंगरेजी ज्ञान कमजोर है। फिर ये अनुवादक क्या काम निपटाने के लिए हैं!

मानविकी, समाजशास्त्र, संचार-तंत्र और ज्ञानात्मक साहित्य के अनुवाद में तो इस दायित्वहीनता का साम्राज्य छाया हुआ है। उन्हें इस बात का कतई इल्म नहीं होता कि ऐसे भ्रष्ट अनुवाद से वे एक साथ कितने अपराध करते हैं। पहला अपराध तो यह कि उसके उपयोगकर्ता पुस्तक खरीदने में अपना धन लगाते हैं, पढ़ने में अपना श्रम और समय लगाते हैं, पर लाभान्वित नहीं हो पाते। यानी उनके साथ छल होता है। यह एक किस्म की ठगी है। इस अनुभव के कारण भविष्य में वे हिंदी की किताबें खरीदने और पढ़ने से कतराएंगे।

दूसरा अपराध है कि मूल भाषा के एक बड़े रचनाकार के रचनात्मक उद्यम का हिंदी में यथोचित स्वागत नहीं होता, पाठक उनके रचनात्मक सरोकार का मर्म नहीं समझ पाते। इस कारण हिंदी समाज की समझ और सहृदयता पर एक अनावश्यक आरोप जड़ दिया जाता है। तीसरा अपराध है कि कई स्थितियों में अनुवाद के लिए इन दिनों हिंदी सेतु-भाषा का काम कर रही है। भारतीय भाषाओं में सीधे अनुवाद के लिए आजकल अनुवादक नहीं मिलते; कन्नड़ से असमिया, तमिल से डोगरी या मलयालम से ओड़िया में सीधे अनुवाद करने वालों का नितांत अभाव है। अन्य भाषाओं में भी यही हाल है। ऐसे में हिंदी अनुवाद सेतु-भाषा के रूप में काम करती है। साहित्य अकादेमी, नेशनल बुक ट्रस्ट, प्रकाशन विभाग जैसे सरकारी संस्थानों के साथ-साथ कई गैर-सरकारी प्रकाशन संस्थान भी विभिन्न भाषाओं में प्रकाशन करते हैं, उन्हें ऐसी विसंगतियों का सामना करना पड़ता होगा। अब अगर सेतु भाषा खुद संप्रेषणीयता में विपन्न हो, तो उस पाठ का अगली भाषा में प्रवेश कितना अभद्र होगा, यह विचारणीय है।

चौथा अपराध विश्वविद्यालयों के पुस्तकालयों में ऐसी पुस्तकों की उपस्थिति का है। चाहे-अनचाहे ये पुस्तकें वहां पहुंच कर भारत के युवा-मानस को खीझ से भर देती हैं। इससे शोध की दिशाएं भी आहत होती हैं। पांचवां अपराध प्रकाशन उद्योग के सामाजिक सरोकार को लेकर है। अनुवादकों की ऐसी दायित्वहीनता के कारण प्रकाशन-उद्योग का मूल-धर्म लांछित होता है। अपराधों की सूची और लंबी हो सकती है। स्पष्ट है कि ऐसे अनुवादों से इस कर्म का एक भी उद्देश्य पूरा नहीं होता, फिर ये अनुवाद किस लिए?

गौरतलब है कि इस पूरी प्रक्रिया में किसी न किसी तरह कमाई तो सब कर लेते हैं, पर इस वृत्ति का मूल उद्देश्य धरा का धरा रह जाता। प्रारंभिक दौर के प्रकाशन व्यवसायियों और अनुवाद उद्यमियों की यह मंशा कतई नहीं रही होगी। उन्नत सामाजिक सरोकार के आग्रह की पुनीत धारणा से ही उन पुण्यात्माओं ने इस जोखिम भरे क्षेत्र में पांव रखा था। उनके लिए अनुवाद एक मिशन था, व्यवसाय नहीं। जब से अनुवाद की व्यावसायिकता स्पष्ट हुई है, इस क्षेत्र में दुर्गंध फैलने लगी है। जाहिर है कि इस उद्देश्यविमुखता का कारण धनलाभ की उग्र कामना है। लगाए हुए श्रम और समय का मूल्य पूरी तरह वसूल लेना ही अब उनका धर्म हो गया है, अपना मूल धर्म वे भूल चुके हैं।

साहित्य अकादेमी या अन्य संस्थान बेशक आज अनुवाद-कार्य से जुड़े लोगों को सम्मानित करते हैं, पर तथ्य है कि भाषा और साहित्य के ज्ञान से संपन्न प्रथम श्रेणी की प्रतिभाएं इस क्षेत्र में पांव रखने से अब हिचकती हैं। दरअसल, यह स्थिति कई कारणों से आई है, हिंदी पट्टी में भाषाई ज्ञान के बूते धनार्जन करने वाले अधिकतर बौद्धिकों की नैतिकता में तेजी से हुए ह्रास के साथ-साथ और भी कई कारण हैं।

बढ़ती बेरोजगारी के कारण सस्ते मूल्य पर अनुवादक जुटाने की सहज वृत्ति ने अनुवाद-कर्म की स्तरीयता लांछित कर दी है। दायित्वहीन अनुवादकों की भरमार और अनुवाद-शुल्क की न्यूनता देख कर ज्ञान-संपन्न श्रेष्ठ अनुवादक इस बाजार में झांकना मुनासिब नहीं समझते। वे अब उन्हीं पुस्तकों के अनुवाद में रुचि लेते हैं, जिनमें उनका मन रमता है या जिसका सामाजिक सरोकार उन्हें उन्नत दिखता है, या किसी बेहतरीन पाठ के अनुवाद के लिए कोई संस्था उन्हें समुचित सम्मान और मानद राशि देती है। भारत की सारी संस्थाएं अनुबंध के समय सरकारी संस्थाओं द्वारा निर्धारित अनुवाद-शुल्क का अनुशरण करते हुए अनुवादकों का शोषण करने लगती हैं। सरकारी संस्थानों में अनुवाद-शुल्क निर्धारित करने वे लोग बैठते हैं, जिन्हें अनुवाद-कर्म के मर्म का ज्ञान नहीं होता। रोजगारहीनता के कारण इस क्षेत्र में कूद पड़े लोगों का परम धर्म तो धनार्जन होता है। रोजगार के लिए निकले ऐसे लोगों से और अधिक की उम्मीद भी नहीं की जानी चाहिए।

अब बचे पुनर्वीक्षक और संपादक; उन्हें तो राय देकर अपना वर्चस्व बनाए रखना है, और अनूदित पाठ का संपादन पूरा कर अपनी नौकरी निपटा लेनी है। फिर प्रकाशक को अंतत: किसी पर तो विश्वास करना होगा, वे इन अनुभवियों (?) की अनुशंसा पर भरोसा कर आगे बढ़ जाते हैं। विक्रेताओं का तो सीधा संबंध बिक्री से है। आखिरकार इन सभी की सामाजिक दायित्वहीनता का शिकार वे पाठक होते हैं, जो अपनी ज्ञानाकुलता के कारण सारी क्षुद्रताओं का शिकार होते हैं। और, आहत होते हैं दूसरी भाषाओं के वे लेखक, जो हिंदी की बड़ी दुनिया में आकर अपनी रचनात्मकता का अलख जगाने के यश:प्रार्थी हैं, और इस शृंखलाबद्ध दुष्कृत्य में उनकी सारी कामनाओं पर अनुवादक की अज्ञानता की गाज गिरती है। इस बौद्धिक छद्म से हमारे देश के उद्यमियों को बचने की जरूरत है।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App