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प्रसंगः आधुनिक चेतना का विकास और भारतेंदु

भारतेंदु अपने युग की चेतना के अनुरूप परिवर्तित हो रहे साहित्यिक मूल्यों, प्रतिमानों और उद्देश्यों को ध्यान में रख कर कविता में नए भावबोध को विकसित करते हैं।

भारतेंदु ने प्रकृति को भी दरबारी काव्य परंपरा के बंधनों से मुक्त किया था।

आनंद शुक्ल

भारतेंदु हरिश्चंद्र का उदय जिस साहित्यिक परिवेश में हुआ, उस समय हिंदी कविता में भक्ति और रीति के संस्कारों की प्रधानता थी और वह मध्यकालीन भावबोध में जकड़ी हुई थी। उस दौर में राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक परिस्थितियों में परिवर्तन के कारण समाज और साहित्य में जिस नई चेतना का विकास हो रहा था उसे देखते हुए यह काव्यदृष्टि कुछ असंगत प्रतीत होती है। भारतेंदु नवजागरण की चेतना के अनुरूप अपने निबंधों, नाटकों में युगीन भावबोध और समसामयिक जीवन का वास्तविक चित्रण कर रहे थे, पर कविता में पुरानी परंपरा से जुड़े थे। दरअसल, इस युग की सक्रांतिकालीन मानसिकता का सर्वाधिक प्रभाव भारतेंदु की कविता में दिखता है।

भारतेंदु के काव्य का एक बड़ा अंश प्रेम और शृंगार भाव की कविताओं से आच्छादित है। हालांकि उनके यहां शुद्ध और सात्विक प्रेम की अभिव्यंजना भी है और उनके शृंगार वर्णन में वासना का रीतिकाव्य जैसा वर्णन नहीं है, फिर भी मध्यकालीन भावबोध का विस्तार होने के कारण इसकी अंतर्निहित सीमाएं हैं। इसमें जीवन की वास्तविकता, सहजता और स्वाभाविकता का अभाव है। भारतेंदु ने भक्ति भाव की अनेक कविताएं भी लिखी है, जिनमें कृष्णभक्ति का प्राधान्य है। भारतेंदु के रचनाकर व्यक्तित्व में जहां एक ओर भक्ति और रीति का परंपरागत संस्कार है, तो दूसरी ओर उन्नीसवीं शताब्दी के नवजागरण से उपजा नया भावबोध। नवजागरण की प्रबल चेतना के प्रभाव से भारतेंदु के परंपरागत संस्कारों में परिवर्तन आता है। वे काव्य को मध्ययुगीनता के सांचे से बाहर निकाल कर आधुनिक भावबोध और समसामयिक यथार्थ से संपृक्त करते हैं। मध्ययुगीन काव्य की सीमाओं को पहचानते हुए उन्होंने अपने लिए एक अलग राह चुनी।

भारतेंदु अपने युग की चेतना के अनुरूप परिवर्तित हो रहे साहित्यिक मूल्यों, प्रतिमानों और उद्देश्यों को ध्यान में रख कर कविता में नए भावबोध को विकसित करते हैं। उनके काव्य में युगीन चेतना से संपृक्ति के अलावा आत्माभिव्यक्ति और स्वच्छंदता का स्वर उन्हें मध्ययुगीन रूढ़ियों और बंधनों से मुक्त करता है। इस प्रक्रिया में उनके व्यक्तित्व की मस्ती, सहृदयता, सहजता, स्वच्छंदता, प्रयोगशीलता और लोकजीवन से संपृक्ति ने अपनी गहरी छाप छोड़ी है। भारतेंदु ने ‘नए और पुराने’ के इस ‘संघर्ष काल’ में नई पीढ़ी के रचनाकारों का नेतृत्व किया था। उन्होंने कविता को आधुनिक भावबोध से संपृक्त करने के साथ ही काव्यभाषा और अभिव्यंजना शैली का संस्कार और परिष्कार भी किया।

भारतेंदु के समय देश विषम परिस्थितियों से गुजर रहा था। एक ओर राजनीतिक दासता थी, तो दूसरी ओर सामाजिक अध:पतन। भारतेंदु ने इन दोनों समस्याओं को समान रूप से लिया। उन्होंने ‘भारत में मची है होरी’ कविता में सर्वथा नए ढंग की होली का वर्णन किया है। उन्होंने होली का जो चित्र खींचा है, उसमें दीनजनों के पीले मुख के समान सरसों फूल रही है और बसंत तत्त्वहीन पतझर के रूप में प्रकट हुआ है। देशदशा वर्णन के माध्यम से विकसित हुई इस यथार्थवादी चेतना ने भारतेंदु के रचना संसार को व्यापक स्तर पर प्रभावित किया था।

भारतेंदु का मानना था कि जब तक समाज का संस्कार और परिष्कार करके उसे जागृत और प्रगतिशील नहीं बनाया जाएगा तब तक ‘देशोन्नति’ और ‘पराधीनता से मुक्ति’ संभव नहीं है। भारतेंदु ने भारत दुर्दशा, भारत जननी, वैदिकी ंिहंसा ंिहंसा न भवति, प्रेमजोगिनी, अंधेर नगरी आदि के गीतों, गजलों और हिंदी की उन्नति पर व्याख्यान, प्रबोधिनी, नए जमाने की मुकरी, विजयिनी-विजय-वैजयंती, भारत-भिक्षा, प्रात-समीरन, दैन्य-प्रलाप, उरहना आदि रचनाओं के माध्यम से देश और समाज की दशा का सजीव और यथार्थपरक चित्रण किया है। उन्होंने जाति-वर्ण भेद, अंधविश्वास और पाखंड, निर्धनता, अकाल और महंगाई, रोग, बैर, फूट, आलस्य, टैक्स, छुआछूत, बाल विवाह, विधवा विवाह, अशिक्षा, पुलिस और अमलों के अन्याय और भ्रष्टाचार, पाश्चात्य सभ्यता के अंधानुकरण, नशाखोरी आदि को कविता का विषय बनाया। वे इन कविताओं के माध्यम से लोगों को सचेष्ट और जागृत करना चाहते थे।

भारतीय समाज में व्याप्त विसंगतियों, विडंबनाओं, विकृतियों और मानवीय मूल्यों के ह्रास के यथार्थ चित्रण की दृष्टि से ‘देखी तुमरी कासी’ विशेष उल्लेखनीय है। इस कविता में भारतेंदु ने समाज के अकर्मण्य लोगों, पाखंडी पुजारी-पुरोहित वर्ग, दायित्वहीन मध्यवर्ग, विश्वासघाती अमीर वर्ग आदि का यथार्थ चित्र उपस्थित किया है। उन्होंने देशवासियों में व्याप्त अकर्मण्यता, आलस्य, कायरता, फूट, बैर, कलह, निरूद्यमिता, परमुखापेक्षीभाव, परावलंबन और मानसिक गुलामी आदि का चित्रण यथार्थ के धरातल पर किया है। भारतेंदु ने जहां एक ओर देशदशा और सामाजिक-धार्मिक अध:पतन का यथार्थ चित्रण किया है वहीं उन्होंने ब्रिटिश राज का कच्चा चिट्ठा खोलते हुए कविता में सामाजिक-राजनीतिक यथार्थ की अभिव्यक्ति के लिए नया रास्ता बनाया था।

कभी यह प्रहार सीधे विचार के स्तर पर है, कभी व्यंग्य के स्तर पर और कभी जीवंत चित्रों के रूप में। ‘भारत दुर्दशा’ का असली कारण स्पष्ट करते हुए उन्होंने लिखा: ‘अंग्रेज राज सुख-साज सजे सब भारी / पै धन विदेस चलि जात इहै अति ख्वारी।’ ‘अंधेर नगरी’ प्रहसन में साम्राज्यवादी शोषण तंत्र के अन्याय, भ्रष्टाचार और हिंदुस्तान को हजम कर जाने की मानसिकता का सहज यथार्थ चित्रित किया है: ‘चूरन अमले सब जो खावैं/ दूनी रिश्वत तुरत पचावैं/ चूरन पुलिस वाले खाते/ सब कानून हजम कर जाते/ चूरन साहेब लोग जो खाता/ सारा हिंद हजम कर जाता।’ इसी प्रकार नए जमाने की मुकरी, हिंदी की उन्नति पर व्याख्यान, विजय वल्लरी, अंग्रेज स्तोत्र, लेवी प्राण लेवी आदि कविताओं, लेखों में भारतेंदु ने अंग्रेजी साम्राज्य के असली रूप को जनता के सामने प्रकट किया है।

भारतेंदु ने प्रकृति को भी दरबारी काव्य परंपरा के बंधनों से मुक्त किया था। उनके ब्रजभाषा और खड़ी बोली काव्य में प्रकृति के उस सहज मोहक रूप का चित्रण मिलता है, जो हमारी आंखों के सम्मुख बिखरा रहता और मुग्ध करता है। खड़ी बोली काव्यभाषा के माध्यम से यथार्थ की सहज अभिव्यक्ति की यह एक नई शुरुआत थी।

भारतेंदु में नवजागरण की चेतना और देशदशा के यथार्थ की अभिव्यक्ति में सक्षम काव्यभाषा के निर्माण और जातीय छंदों की खोज की छटपटाहट भी है। भारतेंदु नए भावबोध और यथार्थ की अभिव्यक्ति में ब्रजभाषा की सीमाओं को पहचानते हुए खड़ी बोली काव्य भाषा रूप के निर्माण के लिए निरंतर प्रयोग करते रहे। इसी प्रकार काव्य के रूप-विधान के मामले में या जातीय जीवन के उच्चारण संगीत के अनुकूल छंद की खोज के विषय में भारतेंदु ने कजली, होली, लावनी, मुकरी, फाग, गजल आदि के प्रयोग द्वारा देशदशा वर्णन की नई यथार्थवादी वस्तु के अनुकूल जनप्रिय छंदों में काव्य लेखन की नई परंपरा का सूत्रपात किया। उन्होंने कविता को संगीत के साथ भी जोड़ा।

भारतेंदु के काव्य में व्यक्त राष्ट्रीयता की भावना अपने मूल रूप में उदार और समन्वयवादी है। उन्होंने ‘हंटर शिक्षा आयोग’ के समक्ष प्रस्तुत लिखित वक्तव्य में स्वयं को ‘संस्कृत, हिंदी और उर्दू का कवि कहा था।’ उनके व्यक्तित्व में युगीन प्रभावों के कारण हिंदी-उर्दू का द्वंद्व मौजूद है, पर वह उसके समन्वय का सचेत प्रयास भी करते हैं। वे ‘उर्दू का स्यापा’ लिखते हैं, पर दूसरी तरफ हिंदी-उर्दू कवियों का साझा मंच तैयार करते हैं और ‘गुलजारे पुरबहार’ नामक संकलन भी निकालते हैं। भारतेंदु की दृष्टि में कविता का लक्ष्य यथार्थ की केवल प्रतिलिपि प्रस्तुत करना नहीं, बल्कि उसके माध्यम से यथार्थ को बदलना भी था। वे समाज को समस्त प्रकार की विकृतियों और दुर्बलताओं से मुक्त होकर उन्नति करते हुए देखना चाहते थे। इसके लिए वे कविता में यथार्थ चित्रण और नए-नए विषयों के समावेशन के प्रति निरंतर सचेष्ट रहे। वे नवजागरण की चेतना के मेल में कविता को ला खड़ा करते हैं और आधुनिकता के आरंभ के लिए जमीन तैयार करते हैं।

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