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विचार बोध: धर्म दर्शन और मानवता

धर्म के संबंध में जिस कसौटी की बात बीसवीं सदी में महात्मा गांधी करते हैं, उस कसौटी की चर्चा उनसे बहुत पहले सुकरात के यहां एक तार्किक टेक के तौर पर मिलती है। सुकरात का मानना था कि किसी भी बात को आंख मूंदकर न मानो, पहले तर्क के साथ विचार करो।

धर्म के संबंध में जिस कसौटी की बात बीसवीं सदी में महात्मा गांधी करते हैं, उस कसौटी की चर्चा उनसे बहुत पहले सुकरात ने की।

रोहित कुमार

धर्म और आस्था की निजता जब भी सामाजिकता या राष्ट्रीयता के संदर्भ के साथ रेखांकित होती है, तो वह एक विवादित प्रसंग बन जाता है। दिलचस्प यह कि यही विवाद तब एक व्यापक सहमति में बदल जाता है जब धर्म और उसके प्रति आस्था के बजाय बात मानवता की होती है। आधुनिक दौर में दार्शनिकता की जिस जमीन पर खड़े होकर हम व्यक्ति, समाज और इनसे जुड़ी संस्थाओं की भूमिका की बात करते हैं उसमें सुकरात और उनके शिष्यों की दार्शनिक मान्यताओं की काफी अहमियत है।

एक दार्शनिक के तौर पर सुकरात यह मानते थे कि विचार के माध्यम से ही समाज में सकरात्मक बदलाव लाए जा सकते हैं। उन्होंने धार्मिक सिद्धांतों के बजाय मानवीय आधार पर एक नैतिक प्रणाली स्थापित करने का प्रयास किया। उन्होंने कहा कि परम ज्ञान खुद को जानने से आता है। जितना ज्यादा व्यक्ति जानता है, उतनी ही उसकी क्षमता में विस्तार होता है जिससे वह तर्क करना सीखता है तथा सच्ची खुशी जीवन में ला पाता है।

सुकरात जो बातें व्यक्ति और समाज के लिए नीति और दर्शन की व्याख्या करते हुए या यूं कहें कि सूत्र रचते हुए करते हैं, वही बातें महात्मा गांधी जीवन और आचरण की कसौटी के तौर पर कहते हैं। गांधी इस बारे में काफी स्पष्टता के साथ कहते हैं, ‘मैं लकीर का फकीर नहीं हूं। इसलिए संसार के सभी धर्मग्रंथों की भावना को समझने का प्रयत्न करता हूं। मैं उन्हें सत्य और अहिंसा की कसौटी पर कसना चाहता हूं, जो इन ग्रंथों में ही निहित है। जो कुछ उस कसौटी पर खरा नहीं उतरता मैं उन्हें अस्वीकार कर देता हूं, जो खरा उतरता है उसे ग्रहण कर लेता हूं।’

दिलचस्प है कि सुकरात का जन्म 470 ईसा पूर्व एथेंस, ग्रीस में एक गरीब परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम सोफरोनिसकस था जो एक मूर्तिकार थे। सुकरात ने प्राचीन ग्रीस में मिलने वाली शिक्षा ग्रहण की थी। शुरुआत में सुकरात पिता का पुश्तैनी धंधे में हाथ बटाया करते थे। इतिहास में उनके जीवन के बारे में अत्यधिक जानकारी नहीं मिलती है। उनके बारे में उनके शिष्य प्लेटो और जेनोफोन से जानने को मिलता है। उनके बारे में यह उल्लेख या इससे जुड़े कई संदर्भ हैं कि वे निहायत ही सहनशील प्रवृत्ति के थे और कभी भी गुस्सा नहीं होते थे।

उनकी सहनशीलता का एक उदाहरण है कि एक बार उनके घर एक शिष्य आया हुआ था और वो उससे विमर्श करने में व्यस्त थे। पत्नी ने उन्हें कई बार आवाज लगाई लेकिन वो सुने नहीं। इस बात पर उनकी पत्नी को गुस्सा आया और उन्होंने पानी से भरी बाल्टी सुकरात पर उड़ेल डाली। यह देखकर शिष्य ने कहा कि आपको गुस्सा नहीं आया क्या और आप ये सब कैसे सहन कर लेते है। इस प्रश्न पर सुकरात का जवाब था कि ‘वह योग्य है, ठोकर लगा कर देखती है कि सुकरात कच्चा है या पक्का।’
सुकरात दिखने में साधारण थे लेकिन उनका मानना था कि कुरूपता को अच्छे कामों से ढका जा सकता है। वे एक शिक्षक थे, जिन्होंने अपनी उच्च शिक्षाओं से समाज को महान व्यक्ति दिए।

धर्म के संबंध में जिस कसौटी की बात बीसवीं सदी में महात्मा गांधी करते हैं, उस कसौटी की चर्चा उनसे बहुत पहले सुकरात के यहां एक तार्किक टेक के तौर पर मिलती है। सुकरात का मानना था कि किसी भी बात को आंख मूंदकर न मानो, पहले तर्क के साथ विचार करो। सुकरात के ये विचार धार्मिक लोगों को नहीं भाते थे। इसलिए उनके कई सारे विरोधी भी हो गए थे। गांधी के समय में भी वे लोग ही उनके सबसे बड़े विरोधी रहे, जो धर्म और विचार के नाम पर कट्टरतावादी आग्रह रखते थे। यही नहीं, इसी कट्टरता ने आखिरकार उनकी जान भी ली।

सभ्यता और विकास के साझे में मानवता के गौण या कमजोर पड़ने का खतरा गांधी की बड़ी चिंता थी। सत्य प्रेम और करुणा की सीख देने वाले महात्मा के लिए मानवता से ऊपर कोई धर्म नहीं हो सकता। सुकरात के लिए मानवता का पक्ष ही ज्ञान का पक्ष है, ज्ञान का तर्क है। वे इस बात को बार-बार दोहराते हुए यह भी कहते हैं कि ज्ञान का अभिप्राय कभी भी बाह्य या ऊपरी ज्ञान नहीं है। ज्ञान उनके लिए खुद को जानना है, खुद से तार्किक मुठभेड़ है। गांधी भी जिस सत्य की बात बार-बार करते हैं, वो खुद से एक नैतिक मुठभेड़ ही है। नैतिकता का आग्रह इतना बड़ा और सधा कि इसके लिए वे किसी विचार या दर्शन की शरण नहीं लेते बल्कि निर्भीकता के साथ आगे बढ़कर कहते हैं- मेरा जीवन ही मेरा संदेश है।

सुकरात और गांधी के यहां उनके विचारों के साथ जो एक बात और गौर करने की है, वह यह कि वे जीवन की सहजता और सरलता को महत्व देते हैं। स्थूल और सूक्ष्म के भेद को लेकर जो बातें भौतकितावादी दर्शन की सीमा रेखांकित करते हुए अकसर की जाती है, उसका बीज तर्क साधारण, विनम्र और सहज रहने की मानवीय विशिष्टता को महत्व देता है, उसे विचार और आचरण के लिहाज से समादर प्रदान करता है। बात एक बार फिर धर्म की करें तो कोई भी धर्म अपने प्रतीकों, ग्रंथों से ज्यादा अपने मानने वालों के आचरण से महान बनता है, इस सीख के प्रति आगाह ये दोनों ही महापुरुष करते हैं।

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