ताज़ा खबर
 

चिंता : तेजाब पीड़ितों के पक्ष में

हाल में, सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों द्वारा तेजाब हमलों में हलफनामा दाखिल नहीं करने पर नाराजगी जताई है।

Author नई दिल्ली | April 24, 2016 4:12 AM
एक महत्त्वपूर्ण बात कि भारत की अधिकतर आदिवासी भाषाओं में कोई स्त्री-सूचक गाली नहीं है।

दिल्ली उच्च न्यायालय ने हाल ही में कहा है कि तेजाब-पीड़ितों के इलाज की जिम्मेदारी सरकार की है। न्यायालय का यह फैसला प्रशंसनीय है। तेजाब हमलों में न जाने देश की कितनी महिलाएं झुलस गर्इं और उनके साथ उनके स्वप्न भी धूल धूसरित हो गए। अपनी शारीरिक तकलीफ को भूल कर खड़े हो पाना क्या सहज है? ऐसे बहुत से सवाल हैं जिनका उत्तर देश का हर संवेदनशील व्यक्ति ढूंढ रहा है और स्वयं तेजाब पीड़िताएं भी। ‘तेजाब सिर्फ चेहरा ही नहीं जलाता पूरी जिंदगी बर्बाद कर देता है। एक-एक सुई, आॅपरेशन, टांके, दर्द… पूरा शरीर, घर सब कुछ बर्बाद कर देता है। वह हंसी जो कभी दिल में हंसी हुई थी बहुत याद आती है। वह पल जो मम्मी-पापा, भाई इन सबसे साथ बिताए थे, अब सपनों की तरह हो गए हैं। मेरे साथ क्या हुआ आप सब देख सकते हैं, कुछ देर पहले वही इंसान प्यार के दावे कर रहा था और कुछ देर बाद उसी लड़की पर, जिससे इतना प्यार था, तेजाब डालकर जला दिया। नहीं, वह प्यार हो ही नहीं सकता….।’ लक्ष्मी का यह पत्र सभी तेजाब पीड़ित लड़की की व्यथा है।

HOT DEALS
  • Honor 9I 64GB Blue
    ₹ 14784 MRP ₹ 19990 -26%
    ₹2000 Cashback
  • Lenovo K8 Plus 32GB Venom Black
    ₹ 8925 MRP ₹ 11999 -26%
    ₹446 Cashback

लक्ष्मी से प्यार का दावा करने वाले युवक को, उसकी ‘न’ इतनी नागवार गुजरी कि उसने उसके चेहरे पर तेजाब डाल दिया। सोनाली तो अपने स्वाभिमान और स्त्रीत्व के विरुद्ध लड़ रही थी। 22 अप्रैल 2003 की वह रात सोनाली के जीवन में अमावस्या बन कर आई। इसकी वजह से उसकी आंखों की रोशनी चली गई और दाहिने कान से सुनाई भी देना बंद हो गया।

सोनाली, लक्ष्मी और ऐसी ही सैकड़ों लड़कियों का दोष क्या है? आखिर यह तेजाब इतनी सहजता से मिल कैसे जाता है? यह तय बात है कि हमलावर युवा मानसिक विकृति के शिकार हैं? कोई भी विकृति एक लंबे सामाजिक और पारिवारिक पर्यावरण का परिणाम होती है। स्त्री सशक्तीकरण की पैरवी करने वाले भी यह जानते हैं कि पितृसत्तात्मक समाज की जड़ों में गहराई से बेटों की चाह इस कदर समाई हुई है कि हर पिता धृतराष्ट्र बन चुका होता है। आधिपत्य, स्वामित्व और प्रभुत्व ये भावनाएं शिशु से किशोर बनते बच्चों में इस कदर बलवती होती जाती हैं कि उनके जीवन में किसी भी प्रकार की अस्वीकारोक्ति उन्हें बौखला देती है।

सदियों से जड़ें जमाई लैंगिक विभेद की यह भावना कभी भी सिर उठा लेती है, और स्त्री से पूछ बैठती है, ‘तू कौन… क्या है तेरी पहचान… तेरा अस्तित्व पुरुष बिना नगण्य है… ।’ यह इस देश का दुर्भाग्य है कि यहां स्त्री को मानव होने का अधिकार ही नहीं मिला। देवी तुल्य कह कर उसे इतना भ्रमित कर दिया गया है कि उसने पुरुषों द्वारा रची इस माया को ही सच माना और अपने जीवन की सफलता इस भ्रम में ही जीने में मानी और जिन्होंने इस भ्रमजाल को तोड़ स्त्री होने का अधिकार मांगा उन्हें डायन जैसे शब्दों से लादकर लहूलुहान कर दिया। सदियों से यह लड़ाई चल रही है। इसका अंत कब होगा कोई नहीं जानता, पर यह तय है कि इतनी पाबंदियों के बीच स्त्री अपने पंखों को परवाज देने की चेष्टा कर रही है और ऐसी चेष्टाओं को दबाने के लिए उनके पंखों को कतरने की कोशिशें भी अनवरत जारी हैं। पर क्या वह कायर कभी समझ पाए हैं कि उड़ान हौंसलों से होती है, पंखों से नहीं।

तेजाब में झुलसे किसी चेहरे को देखकर एक बारगी सहम जाना लाजमी है। दया और खौफ से लड़ने की हिम्मत जुटाना बहुत दूर की बात है, हम में से कई तो इससे आगे का सोच भी नहीं पाते। लेकिन कुछ ऐसे लोग भी तेजाब पीड़िताओं की मदद के लिए आगे आ रहे हैं। आगरा में एक रेस्तरां हैं, जहां खाने का आॅर्डर लेने से लेकर खाना परोसने का सारा काम कुछ ऐसी युवतियां-महिलाएं करती हैं, जो खुद तेजाब हमले का शिकार रही हैं। नीतू जब तीन साल की थी तब उसके पिता और रिश्तेदारों ने मिलकर उसे, उसकी बहन और मां को तेजाब से जला दिया था। एक गैर सरकारी संगठन ‘छांव’ की पहल पर तेजाब पीड़िता- लक्ष्मी, रूपा, रितु, सोनिया और चंचल आदि की तस्वीरें खींच कर कैलेंडर निकाला गया-स्टॉप एसिड अटैक्स। कई बाधाओं को पार करने वाली लक्ष्मी ने न सिर्फ टीवी पर समाचार चैनल में प्रस्तोता की भूमिका निभाई बल्कि गायिका बनने की चाहत रखने वाली इस साहसी महिला को अमेरिका की प्रथम महिला मिशेल ओबामा ने ‘इंटरनेशनल वूमन आॅफ करेज’ सम्मान से सम्मानित किया।

हाल में, सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों द्वारा तेजाब हमलों में हलफनामा दाखिल नहीं करने पर नाराजगी जताई है। कोर्ट ने मध्यप्रदेश, मिजोरम, केरल और कर्नाटक के मुख्य सचिवों को नोटिस जारी करते हुए कहा कि क्यों न उन राज्यों के मुख्य सचिवों के खिलाफ कोर्ट की अवमानना का मामला चलाया जाए जिन्हें हलफनामा देने या पेश होने के लिए कहा गया था। कोर्ट ने महिलाओं के खिलाफ तेजाब हमले की बढ़ती घटनाओं पर चिंता जताते हुए 2015 में दिशा-निर्देश दिए थे। कोर्ट ने राज्य सरकारों को निर्देश दिए थे कि वे अपने राज्य में तेजाब बिक्री के लिए कड़े नियम बनाएं। इसी के साथ तेजाब हमलों की शिकार हुई महिलाओं को कम से कम तीन लाख रुपए का मुआवजा दिए जाने के साथ ही उनके इलाज और पुनर्वास आदि का खर्च भी उठाने की जिम्मेदारी संबंधित राज्य सरकारों पर डाली थी। अदालत ने कहा था कि तेजाब हमलों के आरोपियों को कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए। इसके लिए तेजाब हमलों की वारदात को जहर अधिनियम के तहत रखने को कहा। अदालत ने कहा था कि राज्य सरकारें पीड़ितों के इलाज और पुनर्वास का खर्च वहन करेंगी। इसी के साथ खंडपीठ ने तेजाबी हमलों को गैर-जमानती अपराध बनाने के भी निर्देश दिए थे।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App