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शख्सियतः दादाभाई नौरोजी

मैं धर्म और जाति से परे एक भारतीय हूं।’ यह वाक्य दादाभाई नौरोजी ने तब कहा जब वे ब्रिटिश संसद के सदस्य चुने गए थे।

Author September 2, 2018 6:54 AM
दादाभाई जब ब्रिटिश संसद में सदस्य बने तो उन्होंने भारत की लूट के संबंध में ड्रेन थ्योरी पेश की।

जन्म : 4 सितंबर, 1825/ निधन : 30 जून, 1917

मैं धर्म और जाति से परे एक भारतीय हूं।’ यह वाक्य दादाभाई नौरोजी ने तब कहा जब वे ब्रिटिश संसद के सदस्य चुने गए थे। अपनी वाकपटुता से सभी को मंत्रमुग्ध करने वाले स्वतंत्रता सेनानी, बुद्धिजीवी, शिक्षाशास्त्री और व्यापारी दादाभाई नौरोजी कांग्रेस के संस्थापक सदस्यों में एक थे। वे कांग्रेस के तीन बार अध्यक्ष चुने गए। वे द ग्रैंड ओल्ड मैन ऑफ इंडिया के नाम से मशहूर हुए और ब्रिटिश संसद में पहले भारतीय थे। अहिंसा में विश्वास रखने वाले दादाभाई का मानना था कि सरकार को पशुबल पर नहीं, नैतिक बल पर आधारित होना चाहिए।

प्रारंभिक जीवन

एक गरीब पारसी परिवार में जन्मे दादाभाई जब चार साल के थे उनके सिर से पिता का साया उठ गया। ऐसी परिस्थितियों में उनकी मां ने उन्हें समुचित शिक्षा दिलाई। बचपन से ही मेधावी छात्र रहे दादाभाई की शुरुआती शिक्षा नेटिव एजुकेशन सोसायटी स्कूल से हुई। आगे की पढ़ाई एलफिंस्टन कॉलेज में हुई। पढ़ाई पूरी होने के बाद वे वहीं शिक्षक नियुक्त हो गए। बाद में वे लंदन यूनिवर्सिटी में पढ़ाने लगे। वहां उनसे भारतीय छात्र पढ़ने आते थे, जिनमें से गांधी जी भी एक थे। दादाभाई की शादी मात्र ग्यारह वर्ष की उम्र में सात साल की गुलबाई से हो गई थी।

राजनीतिक जीवन

दादाभाई जब ब्रिटिश संसद में सदस्य बने तो उन्होंने भारत की लूट के संबंध में ड्रेन थ्योरी पेश की। इस सिद्धांत में उन्होंने भारत से लूटे गए धन को ब्रिटेन ले जाने का उल्लेख किया था। वे ऐसे व्यक्तित्व थे जो विदेशी जमीन पर भी देसी गीत गा रहे थे। उन्होंने ब्रिटिश संसद के सामने भी भारत के प्रति अन्यायों को समाप्त करने की वकालत की। उन्होंने यह भी कहा कि अगर भारत की नैतिक और भौतिक रूप से अवनति होती रही, तो भारतीयों को ब्रिटिश वस्तुओं का ही नहीं, ब्रिटिश शासन का भी बहिष्कार करना पड़ेगा। उन्होंने भारतीयों की राजनीतिक दासता और दयनीय स्थिति की ओर लोगों का ध्यान दिलाने के लिए ‘पावर्टी ऐंड अनब्रिटिश रूल इन इंडिया’ पुस्तक लिखी।

ईस्ट इंडिया एसोसिएशन की स्थापना

कांग्रेस की मुख्य संस्था ईस्ट इंडिया एसोसिएशन की स्थापना में दादाभाई ने सहायता की। इस एसोसिएशन का मुख्य उद्देश्य अंग्रेजों के सामने भारतीयों की ताकत को रखना था। इस संस्था का प्रभाव इतना बढ़ा कि उसे यूरोपीय लोगों का सहयोग तो मिला ही, उसने ब्रिटिश संसद पर भी अपना प्रभाव छोड़ना शुरू किया।

आर्थिक विचार

दादाभाई ने हाउस ऑफ कामन्स में भारतीयों की निर्धनता और अशिक्षा के लिए ब्रिटिश शासन को जिम्मेदार ठहराया था। उन्होंने बताया कि ब्रिटिश राज में रहने वाले भारतीयों की औसत आमदनी बीस रुपए प्रतिवर्ष भी नहीं है। वे 1886 के कलकत्ता अधिवेशन के अध्यक्ष थे। यह वही समय था जब दादाभाई तीन बार इंग्लैंड भी गए। दादाभाई जब भारत आए तो उन्होंने देखा कि यहां अंग्रेजी राज में भारत का आर्थिक नुकसान हो रहा है। भारत गरीब होता जा रहा है। उनके विचार इतने प्रभावशाली थे कि तिलक, गोखले और गांधीजी जैसे नेताओं पर भी उनके विचारों का प्रभाव पड़ा। वे भारत और इंग्लैंड के बीच न्यायोचित आर्थिक संबंध चाहते थे। गोपाल कृष्ण गोखले ने दादाभाई के लिए कहा कि अगर मनुष्य में कहीं दिव्यता हो सकती है, तो वह दादाभाई नौरोजी में है। दादाभाई नौरोजी के विचार आज भी देश की राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियों में मानक हैं।

निधन

वे 30 जून 1917 को दुनिया को अलविदा कह गए।

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