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संस्कृति: रूहानी रिश्तों की मिसाल

शालीमार बाग के बगल में शाह हुसैन की मजार है, जहां ‘मेला चरागां’ मनाया जाता है। यह एक दिलचस्प बात है कि शाह हुसैन के साथ उनके दोस्त माधोलाल को भी याद किया जाता है।

माधोलाल हुसैन की दरगाह।

पिछले दिनों लाहौर में एक बार फिर सांस्कृतिक जमघट लगी। माधोलाल हुसैन की सूफियाना दोस्ती को शिद्दत के साथ याद किया गया। दोनों देशों के मध्य सियासी तनाव के बावजूद हजारों की संख्या में लोगों ने माधोलाल हुसैन की दरगाह पर पूरी श्रद्धा के साथ अपनी हाजिरी लगाई। कव्वालियां गाई गर्इं। चादरें चढ़ाईं गईं। मन्नतें मानी गईं, मन्नतें उतारी गईं। पूरे तीन दिन चला यह उर्स। एक दिन तो वहां की प्रदेश सरकार ने सरकारी अवकाश भी घोषित कर दिया।

सोलहवीं सदी के पंजाबी सूफी शायर शाह हुसैन को अब भी पूरी अकीदत (श्रद्धा) से याद किया जाता है। शालीमार बाग के बगल में शाह हुसैन की मजार है, जहां ‘मेला चरागां’ मनाया जाता है। यह एक दिलचस्प बात है कि शाह हुसैन के साथ उनके दोस्त माधोलाल को भी याद किया जाता है। माधोलाल हिंदू ब्राह्मण थे और शाह हुसैन हालांकि उम्र में बड़े थे, फिर भी उन्हें अपना ‘यार’ मानते थे। इसी रिश्ते के हवाले से कुछ लोग शाह हुसैन को माधोलाल हुसैन के नाम से भी पुकारते हैं। यह मेला मार्च में आयोजित होता है। उस दिन ढोल बजते हैं और लोग ‘धमाल’ मचाते हैं। धमाल भी एक तरह का नृत्य है। इसमें गजब की मस्ती होती है। यह मेला तीन दिन तक चलता है। जिया-उल हक के शासन में एक बार इस मेले पर पाबंदी लगा दी गई थी। यह पाबंदी मजार पर ढोल बजाने और ‘धमाल’ मचाने पर लगी थी। लगभग सात साल लोग तरसते रहे। जब पाबंदी हटी तो हजारों की संख्या में तरसे हुए लाहौरी पुरुष और औरतें मजार की ओर ढोल-धमाकों के साथ चल पड़े। ढोलों की थाप पर जवान लोग गाते,
माधो लाल! माधो लाल!
महंगी रोटी महंगी दाल
हो गए पूरे सत्त साल
माधो लाल! माधो लाल!

मेला चरागां की खूबसूरती यह है कि इसमें औरतें भी खुल कर हिस्सा लेती हैं। शाह हुसैन के बगल में ही माधोलाल की मजार भी है। अब यह बहस बेमानी है कि क्या माधोलाल को दफनाया गया था या चिता जली थी। हकीकत यही है कि दोनों दोस्त जिंदगी भर साथ रहे और मरने के बाद भी साथ-साथ। मेला चरागां सौहार्दपूर्ण चरित्र और फिरकापरस्ती की मुखालफत का एक जीता-जागता सबूत है और मेरे आवाम हर साल यहां आकर इस वैचारिकता पर पूरी अकीकत और जोश के साथ मुहर लगाते हैं। मेला चरागां के जश्नों में आगे-आगे रहने वाले पंजाबी विद्वान नजम हुसैन सईद के घर पर हर सप्ताह ‘संगत’ के नाम से एक नशिस्त (गोष्ठी) होती है, जिसमें नज्में पढ़ी जाती हैं, गुरु ग्रंथ साहब के कुछ अंशों पर चर्चा होती है और बानी में से ही कुछ ‘शबद’ गाए जाते हैं। चर्चा-परिचर्चा के मुख्य केंद्र सार्इं मियां मीर, शाह हुसैन और गुरु अर्जुन देव रहते हैं। पंजाबियत यहां की रग-रग में है। लाहौर के कमोबेश हर बाशिंदे में है। सईदा दीप जब हर साल तेईस मार्च को अपने दोस्तों के साथ कैंडल मार्च करती हुई शादमान चौक जाती हैं और वहां पर उस इलाके की अनेक नाटक मंडलियां, शहीदों पर आधारित नुक्कड़ नाटकों का मंचन करती हैं, तो पंजाबियत कुनमुनाती है। अब भी उस दिन ‘इन्कलाब जिंदाबाद’, ‘शहीदे आजम जिंदाबाद’ के नारे शादमान चौक में गूंजते हैं।

इन्ही दिनों पतंगबाजी भी खूब चलती है। हालांकि अदालती तौर पर पतंगबाजी पर सख्त पाबंदी है, मगर अपने घरों की छतों से कानून को ठेंगा दिखाते हुए यह मस्ती जारी रहती है। यह पाबंदी 2007 में पतंगबाजी के दौरान हुए एक हादसे के बाद लगाई गई थी। उस दिन ग्यारह लोग पतंगबाजी के बाद हुई फायरिंग में मारे गए थे। उस फायरिंग का सबब भी पतंगबाजी ही थी। यानी पतंग कटी, तो समझा जाता कि नाक कटी। पतंग इज्ज्जत-आबरू का परचम मानी जाती थी।
हुसैन को ‘काफी’ शैली की कविताओं का जनक माना जाता है। ‘काफी’ में चार से दस तक पंक्तियां होती हैं। कभी-कभार कुछ शायर थोड़ी छूट ले लेते हैं। हुसैन की काफियां गाने वालों में नुसरत फतेह अली खान, आबिदा परवीन, गुलाम अली, नूरजहां, अमजद परवेज आदि के नाम शामिल हैं।
हुसैन की एक ‘काफी’ है-
‘सजन बिन रातां होइयां वड्डियां
रांझा जोगी, मैं जोगियानी, कमली
कर कर सदीयां
मांस झुरे, झुर पिंजर होया
कडकण लग्गीयां हड्डियां
कह हुसैन, फकीर सार्इं दा
लड़ तेरे मैं लग्गियां’
इसी तरह हुसैन की एक काफी अपने दोस्त माधोलाल को समर्पित है-
‘माधोलाल प्यारे, की परवासा दम दा
उड्डया भोर भया परदेसी
अग्गे राह अगम दा
जिन्हा साडा शौह रिझाया
तिन्ना नूं भौह जम दा?
आक्खे हुसैन फकीर निमाणा
छड्ड सरीर भसम दा’
इस बार मेले के मौके पर एक ‘काफी’ तीन दिन तक गाई जाती रही। एक अनाम दरवेश वहां ‘माधोलाल हुसैन’ की दरगाह पर बैठ तीनों दिन गाता रहा, ‘रब्बा मेरे हाल दा महरम तूं’।

कुछ बरस पहले लाहौर गया था, तो वहीं दरगाह पर बैठे एक दरवेश से पूछ लिया, ‘इन दोनों फकीरों- शाह हुसैन और माधोलाल के आपसी रिश्तों के सूफीयाना मानी क्या हैं?’ दरवेश ने हंसते हुए जवाब दिया, ‘सवाल जितना दिलचस्प है उतना ही जवाब भी दिलचस्प है। माधो दरअसल शाह हुसैन का रूहानी दोस्त था। दोनों में वही रिश्ता था, जो सूफी परंपरा में मौलाना रूमी और शम्स के बीच था। शाह हुसैन हालांकि ढुढ्ढी राजपूतों के परिवार से थे, फिर भी उनकी मस्तमौला जिंदगी के मद्देनजर उन्हें ‘शाह हुसैन फकीर’ कहा जाता था। माधोलाल ब्राह्मण थे। दोनों के बीच बेइंतिहा दोस्ती और मुहब्बत थी। दोनों घंटों रूहानी चर्चा में डूबे रहते। यह दोस्ती इस बात का भी सबूत थी कि उन दिनों अलग-अलग धर्मों/ मजहबों के लोग भी बातचीत में खुल कर भाग लेते। उनके रूहानी रिश्तों की मजबूती की वजह से यह दरगाह माधोलाल हुसैन के नाम से वाबस्ता है। दरगाह आपसी भाईचारे और रूहानी सोच की प्रतीक है। मैंने दरवेश से पूछा, ‘क्या माधोलाल ने इस्लाम कबूल किया था?’ दरवेश फिर जोर से हंसा, ‘तुम लोग इस सूफियाना राज (रहस्यों) को क्या समझो? अरे भाई माधोलाल ने इस्लाम कबूल किया होता तो क्या दरगाह का या माधोलाल का नाम कुछ और नहीं रखा जाता? और यह भी यकीनी होता कि अगर शाह हुसैन फकीर ने माधोलाल से अपने रूहानी रिश्तों को तंग नजरिए से देखा होता और अपने यार को इस्लाम कबूल करने के लिए कहा होता तो शायद माधोलाल भी इन्कार न करता। मगर रूहानी रिश्तों की गहराई का तकाजा था कि ऐसी कोई नौबत नहीं आई।’ दरवेश अपनी बात पूरी होते ही फिर जोर से हंसा और मेरे अगले सवाल का इंतजार किए बिना बोला, ‘अब यह मत पूछना कि माधोलाल को चिता में जलाया गया था या दफनाया गया था। ऐसे सवाल रूहानी रिश्तों में बेमानी होते हैं। मुमकिन है उसे जलाया गया हो और शाह हुसैन फकीर के हुक्म पर राख को कब्र की शक्ल दे दी गई हो, ताकि दोनों रूहानी दोस्तों का साथ इंतकाल के बाद भी बना रहे। हो सकता है हुसैन ने खुद ही माधोलाल को दफनाया हो, ताकि रूहानी रिश्तों की मिसाल बनी रहे।’ मैंने दरवेश के पैरों को छुआ और वापस चला आया, सोचते-सोचते कि काश हम लोगों ने इन रूहानी रिश्तों का राज समझा होता!

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