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मुद्दा: अनसुनी गुहारें

मदद के कई रूप हैं, लेकिन इनकी शुरुआत गुहार या पुकार से होती है। इस पुकार का एक आधुनिक रूप टेलीफोन की हेल्पलाइन या सेवाओं के टोल-फ्री नंबर हैं।

Author October 14, 2018 6:54 AM
महिलाओं और बच्चों को शोषण से बचाने, आत्महत्या का विचार आने पर कोई राह सुझाने वाले और इसी तरह की कोई सामाजिक मदद पहुंचाने वाले हेल्पलाइन नंबरों की उपयोगिता से इनकार नहीं किया जा सकता।

मदद के कई रूप हैं, लेकिन इनकी शुरुआत गुहार या पुकार से होती है। इस पुकार का एक आधुनिक रूप टेलीफोन की हेल्पलाइन या सेवाओं के टोल-फ्री नंबर हैं। अरसे से लोग पुलिस, फायर ब्रिगेड और एंबुलेंस बुलाने के लिए हेल्पलाइन नंबरों से परिचित रहे हैं, पर हाल के वर्षों में मदद और सेवा उपलब्ध कराने के दर्जनों नंबर वजूद में आए हैं। इनमें कुछ हेल्पलाइन नंबर ऐसे हैं जिन्हें किसी खास सेवा के संबंध में आम लोगों की मुसीबत के वक्त सहायता के लिए बनाया गया है। खासकर महिलाओं और बच्चों को शोषण से बचाने, आत्महत्या का विचार आने पर कोई राह सुझाने वाले और इसी तरह की कोई सामाजिक मदद पहुंचाने वाले हेल्पलाइन नंबरों की उपयोगिता से इनकार नहीं किया जा सकता। मगर इधर ये हेल्पलाइन नंबर कई वजहों से चर्चा और विवादों में हैं। सवाल पैदा हुआ है कि अगर ये अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो पा रहे हैं, तो इन पर करोड़ों रुपए खर्च करने की जरूरत क्या है।

इसके दो बड़े उदाहरण हाल में मिले हैं। एक उदाहरण देश की राजधानी दिल्ली में चालीस सरकारी सेवाओं की घर के दरवाजे पर आपूर्ति के संबंध में बनाई गई हेल्पलाइन नंबर की है, जिसके बारे में दिल्ली के मुख्यमंत्री ने दावा किया था कि कुछ लोग इस योजना को विफल करने की साजिश रच रहे हैं। ऐसे लोग इस हेल्पलाइन पर फोन करके फर्जी पता देते हैं और जब मोबाइल सहायक बताए हुए पते पर पहुंचते हैं और आवेदक को फोन किया जाता है, तो आवेदक या तो फोन नहीं उठाते या फिर कह देते हैं कि उन्हें यह सेवा नहीं चाहिए। दावा किया गया कि इस हेल्पलाइन पर मदद मांगने वाले दर्जनों लोगों के पते जांच में फर्जी निकले।

दूसरा उदाहरण बच्चों के उत्पीड़न संबंधी शिकायतों के लिए चालू की गई चाइल्ड हेल्पलाइन का है, जिसके बारे में इधर खुलासा हुआ है कि बीते तीन सालों में इस पर मदद की पुकार के रूप में की गई करोड़ों कॉल्स को सिर्फ इसलिए अनसुना कर दिया गया, क्योंकि फोन उठाने पर दूसरी तरफ से हैलो का कोई जवाब तत्काल नहीं मिला तो फोन रख दिया गया। सवाल है कि किसी हेल्पलाइन का शुरुआती मकसद क्या है। क्या कोई हेल्पलाइन तभी मदद की किसी गुहार पर ध्यान देगी, जब उसे पूरा मामला तफसील से बताया जाएगा या फिर संकेत समझ कर वह अपनी ओर से कोई पहल करेगी। चाइल्ड हेल्पलाइन के इस प्रकरण से यह समझा जा सकता है कि उसे चलाने वालों को किस किस्म के प्रशिक्षण की जरूरत है और उस पर आई कोई खामोश कॉल भी मदद की कारुणिक पुकार होती है- यह समझने की जरूरत है।

हाल में यह जानकारी प्रकाश में आई है कि चाइल्ड हेल्पलाइन पर पिछले तीन सालों में भारतीय पुलिस को एक करोड़ छत्तीस लाख ‘खामोश टेलीफोन कॉल्स’ मिलीं। इन्हें खामोश कॉल कहने का आशय है कि इन पर थाने में घंटी बजी, लेकिन फोन उठाने पर दूसरी तरफ से पंखा चलने या कपड़े सरसराने की आवाजें आती रहीं, लेकिन उधर से कोई कुछ बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। यों कहा जा सकता है कि कुछ शरारती लोग पुलिस को तंग करने के लिए भी ऐसे फोन करते हैं, लेकिन ऐसे मामले इन आंकड़ों से पहले ही हटाए जा चुके हैं। ऐसी खामोश कॉल्स कुल तीन करोड़ चालीस लाख कॉल्स की लगभग एक तिहाई हैं।

पुलिस कंट्रोल रूम को निर्देश होते हैं कि ऐसे फोन उठाने वाले पुलिसकर्मी दूसरी तरफ मौजूद व्यक्ति को खुल कर अपनी बात कहने का हौसला दें, जो बच्चा या वयस्क कोई भी हो सकता है। बच्चे कई बार अजीब स्थितियों से घिरे होते हैं, वे अनाथ हो सकते हैं या जीवन निर्वाह के लिए किसी अन्य व्यक्ति पर निर्भर हो सकते हैं, जो हो सकता है कि इसके लिए उनका उत्पीड़न करता हो। बच्चों में भी खासकर लड़कियों की यातना कोई सीमा ही नहीं है। इन सारे हालात में कोई भी बच्चा या उसकी पीड़ा से द्रवित होकर कोई वयस्क जोखिम लेते हुए ही पुलिस से संपर्क साधता है। पर ऐन वक्त पर अगर वह फोन करने के बावजूद अपना दुख कह नहीं पाता है, तो पुलिस की ओर से उसकी पीड़ा समझने का कोई प्रयास नहीं होता, करोड़ों खामोश कॉल्स का किस्सा यही साबित कर रहा है। क्या यह पुलिस को बताने की जरूरत है कि किसी भी उत्पीड़न के खिलाफ पहली चीत्कार अक्सर मौन की भाषा में फूटती है। खामोश कॉल्स के रूप में हो सकता है कि कोई बच्चा खुद को उत्पीड़न और अत्याचार से बचाने की कोशिश कर रहा हो। आज की दुनिया में हम बच्चों के साथ जैसे घृणित हादसे होते देख रहे हैं उनके मद्देनजर इन आशंकाओं को खारिज करना आसान नहीं है।

हेल्पलाइन पर आने वाली मदद की गुहारों की अनदेखी का किस्सा इतना बड़ा है कि कोई न कोई पीड़ित हर रोज यह बताता मिल जाएगा कि उसने वक्त रहते पुलिस से मदद मांगने का प्रयास किया, लेकिन या तो उसकी गुहार अनसुनी कर दी गई या फिर वक्त पर मदद नहीं पहुंचाई गई। पुलिस हेल्पलाइन नंबर के अलावा उत्तर प्रदेश में महिला हेल्पलाइन नंबर के बारे में भी कई महिलाओं की शिकायत रही है कि इस पर दर्ज कराई गई शिकायत पर जल्द कार्रवाई नहीं होती, हालांकि सरकार इसका दावा जरूर करती है। इसी वर्ष आगरा में एक महिला पत्रकार ने दफ्तर से घर लौटते वक्त कुछ शोहदों द्वारा छेड़छाड़ की शिकायत की थी। उन्हें बताया गया कि इस शिकायत पर कंप्लेंट रजिस्टर नंबर आएगा और जल्द कार्रवाई होगी, लेकिन कोई नंबर न आने और तीन दिन तक कार्रवाई न होने पर उन्होंने सारा मामला सोशल मीडिया पर शोहदों के फोटो के साथ डाल दिया। तब जाकर पुलिस हरकत में आई और उसने आरोपियों को पकड़ा। इससे जाहिर है कि उत्पीड़न आदि मामलों में ज्यादातर हेल्पलाइनें बेहद सरकारी ढंग से चलाई जा रही हैं। नाउम्मीदी का ऐसा माहौल कितनी विपरीत स्थितियां पैदा कर देता है- इसका अहसास बहुतों को होगा। कई बार व्यवस्था से हताश लोग आत्महत्या तक कर लेते हैं, वहीं दूसरी ओर उत्पीड़क का इससे हौसला बढ़ता है और वह एक के बाद एक नई वारदात करता चला जाता है।

यों दावा किया जाता है कि बच्चों-महिलाओं के उत्पीड़न संबंधी हेल्पलाइनें संभालने वाले कर्मचारियों को इसका प्रशिक्षण दिया जाता है कि ऐसे फोन आने पर वे दूसरे छोर पर मौजूद व्यक्ति को ढांढस बंधाएं, उन्हें धीरज से अपनी बात निसंकोच कहने का साहस दें, पर लगता है कि या तो इस व्यवस्था में अभी कोई खामी है या फिर पुलिस की छवि ही ऐसी है कि कोई उसके पास जाकर अपना दुखड़ा रोने के बजाय उत्पीड़न सह लेना ज्यादा बेहतर समझता है। खासकर बच्चों और महिलाओं के मामले में यह बात निराधार नहीं है, क्योंकि रेप तक की शिकायत लेकर थाने गई महिलाओं से पुलिसकर्मियों ने ही एक बार फिर रेप कर डाला- ऐसे किस्सों की देश में भरमार है। भारी जोखिम उठा कर अपने साथ हो रही ज्यादती बताने वाले बच्चों और महिलाओं के लिए अब हेल्पलाइन के ऐसे प्रबंध करने की भी जरूरत है कि उन्हें अपनी आवाज उठाने में कोई डर या संकोच का सामना न करना पड़े।

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