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सिनेमा और इतिहास का द्वंद्व

सिनेमा चूंकि मनोरंजन का माध्यम है, उसमें बहुत सारे तथ्यों और घटनाओं का हूबहू नाटकीय रूपांतरण संभव नहीं होता। काफी कुछ कल्पना और दर्शकों के मानस को ध्यान में रख कर रचना पड़ता है। इसी के चलते आज फिल्म पद्मावती को विरोध का सामना करना पड़ रहा है।
Author November 19, 2017 01:02 am
रानी पद्मावती के रोल में अभिनेत्री दीपिका पादुकोण

भारतीय सिनेमा में ऐतिहासिक, मिथकीय और धार्मिक पृष्ठभूमि पर फिल्में बनाने का सिलसिला पुराना है। फिल्म मुगल-ए-आजम बनी और उसने शोहरत और कमाई के सारे कीर्तिमान तोड़ डाले, तो कई फिल्मकारों का ध्यान भी ऐसी फिल्में बनाने की तरफ गया। मगर उनमें से शायद ही कोई ऐसी रही हो, जिसे लेकर कोई विवाद न हुआ हो। इसकी बड़ी वजह है कि सिनेमा चूंकि मनोरंजन का माध्यम है, उसमें बहुत सारे तथ्यों और घटनाओं का हूबहू नाटकीय रूपांतरण संभव नहीं होता। काफी कुछ कल्पना और दर्शकों के मानस को ध्यान में रख कर रचना पड़ता है। इसी के चलते आज फिल्म पद्मावती को विरोध का सामना करना पड़ रहा है। ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर बनने वाली फिल्मों को लेकर विवाद के सिलिसिले पर नजर डाल रही हैं नाज खान।

भारतीय सिनेमा अपने सौ वर्षों के इतिहास में एक से बढ़ कर एक फिल्मों का साक्षी बना है। जहां रूपहले परदे पर आम आदमी की जिंदगी को चित्रित करते पात्र नजर आते हैं, वहीं शुरुआत से ही ऐतिहासिक, धार्मिक और साहित्यिक पृष्ठभूमि पर फिल्में बनती रही हैं। मगर बीते कुछ दशकों में ऐसी फिल्मों पर ऐतिहासिक तथ्यों से खिलवाड़ करने के आरोप भी लगते रहे हैं। दरअसल, इसकी वजह यही है कि अब फिल्में व्यावसायिक पहलू को ध्यान में रख कर बनाई जाती हैं और भरपूर मनोरंजन के लिए उनमें कुछ ऐसे बदलाव किए जाते हैं, जिनसे ऐतिहासिक तथ्यों की अनदेखी होती है।  अपने निर्माण के समय से ही विवादों में रही फिल्म ‘पद्मावती’ ऐसे ही विरोधों का सामना कर रही है। ऐसे में जहां सवाल दिन-ब-दिन हिंसक होते विरोध का है, वहीं प्रश्न यह भी है कि क्या महज मनोरंजन परोसना फिल्मों का मकसद है या फिर सत्य को ज्यों का त्यों चित्रित करना भी इनकी जिम्मेदारी है? एक व्यावसायिक उद्यम के तौर पर फिल्में बनाते समय इस बात का पूरा ख्याल रखा जाता है कि वे ज्यादा से ज्यादा मनोरंजन करने के साथ बेहतर कमाई भी करें। मगर इस बीच एक जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए कि ऐतिहासिक या कुछ खास व्यक्तित्व और घटनाओं पर आधारित फिल्मों को बनाते समय इसमें अहम तथ्यों की अनदेखी न हो।

सोहराब मोदी की 1941 में ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर बनाई फिल्म ‘सिकंदर’ ऐसी पहली फिल्म बताई जाती है, जिसमें इतिहास के साथ कल्पना का घालमेल किया गया। वहीं के. आसिफ की फिल्म मुगल-ए-आजम पर भी आरोप लगा कि इसमें ऐतिहासिक तथ्यों की अनदेखी की गई है। हालांकि यह फिल्म सलीम और अनारकली के बीच पनपे पे्रम पर केंद्रित थी। हालांकि इतिहासकार अनारकली के पात्र को ही काल्पनिक मानते रहे हैं। ऐसे में इसे ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के नाम पर एक काल्पनिक फिल्म माना गया। हालांकि फिल्म ने कमाई के कई रिकॉर्ड तोड़े। इसके बाद तो ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने की होड़ में ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित फिल्में बनाने का एक सिलसिला ही चल पड़ा। आम्रपाली, जोधा-अकबर, मंगलपांडे, बाजीराव मस्तानी जैसी कितनी ही फिल्में हैं जो ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर बनीं। इन फिल्मों में पे्रम कहानी अहम बिंदु था। चाहे ‘आम्रपाली’ हो, ‘जोधा-अकबर’ या हाल में प्रदर्शित ‘पद्मावती’, सबमें प्रेम प्रसंग प्रमुख हैं।  दरअसल, दर्शकों को ज्यादा से ज्यादा अपनी तरफ मोड़ने और उनके मनोरंजन को ध्यान में रखते हुए फिल्मों का निर्माण किया जाता है, ताकि फिल्म अपने प्रदर्शन से दर्शकों की भीड़ खींचने में कामयाब हो और अच्छी कमाई करे। किसी व्यावसायिक उद्योग के लिए अपना फायदा सोचना सही है, लेकिन यहां सवाल सिर्फ मनोरंजन का नहीं, उस इतिहास का भी है, जिसकी घटनाओं का हवाला देते हुए कल्पना को जोड़ कर फिल्में बनाई जाती रही हैं। जहां इतिहासकार ऐसी फिल्मों से सहमत नजर नहीं आते, वहीं समुदाय विशेष की भावना से जुड़ी होने की वजह से भी फिल्मेंविरोध का शिकार बनती रही हैं। हालांकि फिल्मों के लगातार विरोध का फायदा भी फिल्मों की अच्छी कमाई के रूप में इसे बनाने वाले को ही मिलता है, क्योंकि जब इनका विरोध होता है तो इनकी लोकप्रियता के साथ इनके सफल होने की संभावना भी बढ़ जाती है। ऐसे में इतिहास की जिन घटनाओं या पात्रों की वास्तविकता को लेकर सवाल उठते रहे हैं, बावजूद इसके उन्हीं विवादित विषयों, घटनाओं पर फिल्में बनती रही हैं। यही वजह है कि इतिहास में दर्ज विवादित घटनाओं पर फिल्म बनाना निर्माताओं को भाता रहा है और इस तरह के विषयों पर फिल्में बनाने की एक तरह की प्रतिस्पर्द्धा चल रही है।

मुगल साम्राज्य में पनपी सलीम-अनारकली की जिस पे्रम कहानी को लेकर इतिहासकार ही एकमत नहीं हैं और अनारकली के अस्तित्व पर ही सवाल उठाते हैं, उसी को फिल्म मुगल-ए- आजम में अहम किरदार के तौर पर पेश किया गया और अच्छा मुनाफा भी कमाया गया। अनारकली की तरह कुछ इतिहासकारों ने रानी पद्मावती को भी काल्पनिक पात्र माना है। हालांकि उसके रूप, सौंदर्य से लेकर जौहर व्रत तक की कथा लोकगायकों, कवियों आदि द्वारा व्यक्त भी होती रही है। दरअसल, कोई विषय बिकता है तो उस पर फिल्में बनाने की होड़ लग जाती है। जैसा कि सारागढ़ी के युद्ध पर इस समय एक साथ कई लोगों के फिल्म बनाने की चर्चा है। इसी तरह कुछ साल पहले क्रांतिकारी भगत सिंह के जीवन पर भी करीब पांच फिल्में लगभग एक ही समय बनीं और प्रदर्शित भी हुर्इं। जहां लोगों में इतिहास को जानने की ललक है, वहीं ऐतिहासिक और मुख्य घटनाओं से उनकी भावनाएं भी जुड़ी होने की वजह से भी उनकी दिलचस्पी ऐसी फिल्मों में होती है। दर्शकों की इस नब्ज को फिल्म निर्माता अच्छी तरह पहचानते हैं। इस अवसर को भुनाने के लिए ही वे तथ्यों में बदलाव के साथ इसमें गीत-संगीत का तड़का लगा कर उसे और मनमोहक फिल्म के तौर पर पेश करते हैं। ऐसे में दर्शकों का ध्यान उसकी वास्तविक पृष्ठभूमि से हट कर उसके आकर्षण में मगन हो जाता है।

हालांकि ऐतिहासिक विषयों पर फिल्में बनाते समय ध्यान रखना चाहिए कि यह एक विवादास्पद विषय हो सकता है और इस पर फिल्म बनाने के लिए काफी शोध की जरूरत है। यों भी इस तरह की फिल्मों के निर्माण में कहीं ज्यादा सावधानी बरतने की जरूरत इसलिए भी है कि इन्हें बनाते समय वास्तविक तथ्यों की अनदेखी न हो। सिनेमा अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम है और इसका लोगों पर ज्यादा प्रभाव पड़ता है। ऐसे में इस तरफ जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। दरअसल, तथ्यों के साथ मनोरंजन के लिए फिल्मी मसाला मिलाना फिल्मकारों की व्यावसायिक मजबूरी कही जा सकती है, मगर किसी ऐतिहासिक घटना पर आधारित फिल्म को महज पे्रम संबंधों से जोड़ कर घटना की गंभीरता को कम और वास्तविकता से अलग करके पेश करना कितना सही ठहराया जा सकता है, यह बहस का मुद्दा रहा है। जब इस तरह की फिल्म के किसी दृश्य और संवाद पर विवाद होता है तो उसमें मामूली बदलाव करके या कुछ दृश्य काट कर फिल्म प्रदर्शन का रास्ता निकाल लिया जाता है। इससे किसी को भी खास फर्क नहीं पड़ता कि फिल्म को वास्तविकता से कितना अलग पेश किया गया है।

फिल्म ‘उत्सव’ और ‘भारत एक खोज’ जैसे धारावाहिकों में इतिहास को वास्तविकता के साथ प्रस्तुत करने की कोशिश की गई। हालांकि इस तरह की फिल्में पूरी तरह व्यावसायिक नहीं कही जा सकतीं। इसके बावजूद यह एक अच्छी पहल कही जा सकती है कि इतिहास के पन्नों से फिल्मी पर्दे पर कोई कहानी अपने तथ्यों के साथ हूबहू उतरी हो। मगर व्यावसायिक फिल्म निर्माताओं की सोच एकदम अलग है। वे फिल्में मनोरंजन के मकसद से बनाते हैं। उसमें इस हद तक बदलाव किए जाते हैं कि फिल्म असल कहानी से अलग मनोरंजन का साधन भर बन कर रह जाती है। दरअसल, फिल्मों को ज्यादा मनोरंजक बनाने की जुगत में वास्तविक कहानी और तथ्यों से किनारा करना आम बात इसलिए भी हो गई है, क्योंकि इस पर नजर रखने वाली संस्थाएं अपनी जिम्मेदारी पूरी चौकसी के साथ नहीं निभा पा रही हैं। चाहे तथ्यों से खिलवाड़ की बात हो या अश्लील दृश्यों, संवादों और गीतों की, अक्सर देखा गया है कि केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) उन्हें मामूली बदलाव करके प्रदर्शित करने की इजाजत दे देता है। जबकि सवाल कुछ दृश्यों का नहीं, बल्कि ऐतिहासिक तथ्यों के बदलाव का भी होता है। इसका नतीजा यह होता है कि ऐसी फिल्में बिना किसी शोध के बनती रहती हैं। उन्हें विवाद के बाद थोड़े बदलाव के साथ प्रदर्शन की इजाजत भी मिल जाती है और दर्शक इतिहास के नाम पर मनगढ़ंत और अधूरे तथ्यों से रूबरू होते हैं। ०

विवाद का सिलसिला

तिहासिक पृष्ठभूमि पर फिल्म बनाने का न तो चलन नया है और न ऐसी किसी फिल्म का विरोध पहली बार हो रहा है। ऐसी कई फिल्में हैं, जिन्हें इतिहास के नाम पर बनाया गया और उनमें काल्पनिक दृश्य जोड़ दिए गए। 1941 में प्रदर्शित हुई फिल्म ‘सिकंदर’ पृथ्वीराज कपूर के अभिनय से सजी ऐसी पहली फिल्म कही जाती है, जिस पर ऐतिहासिक तथ्यों से खिलवाड़ का आरोप लगता है। हालांकि तब सिनेमा अपनी तरुणावस्था में था, इसलिए इस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया। ‘मुगल-ए-आजम’ ऐतिहासिक घटना पर बनी फिल्मों में सबसे सफल फिल्म मानी जाती है। हालांकि यह फिल्म उच्च कोटि के संवादों और लोकप्रिय गीत-संगीत की वजह से भी कामयाब हुई। इसके निर्देशक के .आसिफ को इसकी प्रेरणा इम्तियाज अली ताज के नाटक ‘अनारकली’ से मिली थी। उस समय यह करीब डेढ़ सौ सिनेमाघरों में प्रदर्शित हुई थी और करीब डेढ़ दशक तक यह बॉलीवुड की सबसे अधिक कमाई करने वाली फिल्म बनी रही।  फिर 1966 में सुनील दत्त और वैजयंती माला की फिल्म ‘आम्रपाली’ प्रदर्शित हुई। यों तो यह मगध के सम्राट अजातशत्रु और उनके साम्राज्य पर केंद्रित थी, मगर इसको अजातशत्रु और वैशाली की नगरवधू- आम्रपाली की पे्रमकहानी के तौर पर पेश किया गया। यह इसकी सफलता ही है कि इसी ऐतिहासिक घटना पर एक बार फिर फिल्म बनाने की तैयारी चल रही है।

2005 में आमिर खान की फिल्म ‘मंगल पांडे’ का विरोध भी किया गया। दरअसल, इसमें उन्हें हीरा नाम की एक महिला के कोठे पर जाते हुए दिखाया गया था। इन दृश्यों का विरोध हुआ और कहा गया कि यह गलत तथ्य है और इससे एक महान क्रांतिकारी की छवि को धूमिल करने की कोशिश की जा रही है। नतीजे में फिल्म के कई दृश्यों पर कैंची चला कर इसे प्रदर्शित किया गया। कुछ समय पहले मुअन जोदड़ो सभ्यता पर इसी नाम से फिल्म बनी थी। इसमें मुख्य भूमिका में रितिक रोशन थे। इसे लेकर आम लोगों की तरफ से तो कोई विरोध सामने नहीं आया, पर इतिहासकारों ने जरूर नाक-भौंह सिकोड़ते हुए इसे महज नाटक करार दिया। इसमें सिंधुघाटी सभ्यता के बजाय आर्य सभ्यता की तरह दिखाया गया था। इसका केंद्र बिंदु भी एक प्रेम कहानी थी। निर्माता-निर्देशक संजय लीला भंसाली की इससे पहले की फिल्म ‘बाजीराव मस्तानी’ भी विवादों में रही। उसमें बाजीराव के वंशजों ने उनकी दोनों पत्नियों के साथ-साथ नृत्य करने और बाजीराव के नाचने को लेकर आपत्ति दर्ज की थी।

आशुतोष गोवारिकर की फिल्म ‘जोधा-अकबर’ को भी राजपूत समुदाय का गुस्सा झेलना पड़ा था। शाहरुख खान की फिल्म ‘अशोका’ भी आलोचनाओं का शिकार हुई औरइतिहासकारों ने इसे इतिहास कम, प्रेम कहानी अधिक बताया। इसके अलावा कुछ अन्य सत्य घटनाओं पर बनी फिल्मों का भी विरोध हुआ है, तो वहीं साहित्यिक पृष्ठभूमि पर बनी कुछ फिल्मों के दृश्यों पर भी विवाद उठते रहे हैं। इसमें ‘देवदास’ भी शामिल है। इसमें एक राजपूत महिला का एक वेश्या के साथ नृत्य करने को लेकर विरोध हुआ था। फिल्म ‘इंदु सरकार’ को कांग्रेस के विरोध का सामना इसलिए करना पड़ा, क्योंकि यह आपातकाल पर आधारित थी।  हाल में प्रदर्शित मिलन लूथरिया की फिल्म ‘बादशाहो’ का विरोध इसलिए किया गया, क्योंकि यह इमरजंसी के दौर की कहानी को ध्यान में रख कर बनाई गई है। यह एक सत्य घटना पर आधारित बताई गई। जयपुर के पूर्व राजवंश के खिलाफ तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के निर्देश पर छापा मारा गया था। फिल्म की मुख्य घटना इसी से प्रेरित है।

यही हाल टीवी पर दिखाए जाने वाले धारावाहिकों का भी है। छोटे पर्दे पर एक बार फिर ऐतिहासिक पात्रों को दिखाने का चलन बढ़ा है और जोधा-अकबर, महाराणा प्रताप, सम्राट अशोक, मीरा बाई जैसे कितने ही ऐतिहासिक धारावाहिक आए हैं। इनमें भी इतिहास को बदल कर रख देने के आरोप कम नहीं लगे। एकता कपूर के टीवी धारावाहिक ‘जोधा-अकबर’ को लेकर इतना विवाद हुआ था कि इसको निबटाने के लिए न सिर्फ पे्रस कांफ्रेंस करके माफी ही मांगनी पड़ी, बल्कि धारावाहिक की शुरुआत में यह बयान भी अनिवार्य कर दिया गया कि इसका किसी ऐतिहासिक या वास्तविक घटना से संबंध नहीं है। धारावाहिक ‘शेर-ए-पंजाब महाराजा रणजीत सिंह’ को लेकर भी विवाद खड़ा हो गया था। इस पर भी इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश करने का आरोप लगाया गया। ०

 

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  1. M
    manish agrawal
    Nov 19, 2017 at 1:58 pm
    इन तलवारों को टेलीविजन पर दिखाने वालों ! सिकंदर, अलाउद्दीन खिलज़ी, मुहम्मद बिन कासिम, मोहम्मद गौरी, महमूद ग़ज़नवी , बाबर, अकबर और औरंगज़ेब के खिलाफ , आपकी ये तलवारें नाकाम साबित हुयी थीं ! सोमनाथ के ज्योतिर्- की भी रक्षा नहीं कर पायीं थीं , ये तलवारें ! और तो और अंग्रेज़ों को भी हिन्दोस्तान पर काबिज़ होने से नहीं रोक पायीं , ये तलवारें ! ये तलवारें लहराकर अपने सूरमा होने का ढोंग फ़ैलाने वालों ! इन्ही तलवारों ने मुग़लों और अंग्रेज़ों के दरबारों में , खूब जी-हुज़ूरी और ताबेदारी की है ! हिन्दुकुश की पहाड़ियों को लांघकर , इस्लामिक आक्रांता आये , उन्होंने जी भर के हिन्दोस्तान को लूटा, कत्लेआम किये, बस्तियों को जला दिया गया, बुतशिकनी की, औरतों को बेइज़्ज़त किया ! तब कहाँ घुस गयी थीं ये तलवारें ?
    (3)(0)
    Reply
    1. M
      manish agrawal
      Nov 19, 2017 at 8:47 am
      भगवा, अस्मिता और प्रखर राष्ट्रवाद की आड़ में, हिन्दोस्तान में फासीवाद आ चूका है ! जिस बात की हमारे पहले वजीरेआजम पंडित जवाहरलाल नेहरूजी को आशंका थी , वो सच साबित हो गयी ! अब तो हिन्दोस्तान में यही होगा ! भीड़ द्वारा पीट पीट कर बेरहमी से कत्ल किये जायेंगे , किसी खातून की नाक काटी जायेगी , संजय भं जैसे किसी फिल्म निर्माता की ५ करोड़ में गर्दन काटने का फतवा जारी होगा , तोड़फोड़ और आगजनी की जायेगी , मुज़फ्फरनगर और गुजरात की तर्ज़ पर दंगे प्रायोजित किये जाएंगे ! दीपिका पादुकोणे तो महज़ एक अदाकारा है और उसने पटकथा के मुताबिक ही महारानी पद्मावती का किरदार अदा किया है ! डायलाग भी उसने वही बोले होंगे जो उसको लिख कर दिया गए होंगे ! घूमर नृत्य भी उसने कोरियोग्राफर के निर्देश के मुताबिक ही किया होगा ! ऐसे में , यदि कोई controversy है भी तो उसके लिए दीपिका पादुकोणे कहाँ दोषी है ? दीपिका पादुकोणे की नाक काटने की धमकी दिया जाना , ज़हालत और बर्बरता की निशानी है !
      (3)(0)
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      1. S
        som
        Nov 20, 2017 at 1:09 am
        मियाँ साहब, असली नाम से लिखने में खतरा लगा? बनियों को खातून आदि कहते-लिखते आज से पहले कभी नहीं देखा था। फासीवाद सच में आ गया लगता है, तभी बेचारों को फ़र्ज़ी नाम से लिखना पड़ रहा है।
        (0)(0)
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