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प्रसंगः बहुमत पर अल्पमत की भाषा

हिंदी को अंग्रेजी के साथ चलने के लिए एक और बैसाखी पकड़ा दी गई। इस बैसाखी को अधिनियम की भाषा में धारा 3(3) कहते हैं। इस धारा के तहत सामान्य आदेशों, संकल्पों, नियमों, अधिसूचना, प्रशासनिक या अन्य प्रतिवेदनों, प्रेस विज्ञप्ति, संसद के सदनों में रखे जाने वाले प्रशासनिक तथा अन्य प्रतिवेदनों व कागजात के लिए संविदाओं, करारों, अनुज्ञप्ति, अनुज्ञा पत्र, निविदा प्रारूपों के लिए हिंदी-अंग्रेजी दोनों का एक साथ प्रयोग अनिवार्य कर दिया गया।

Author July 14, 2019 1:17 AM
हिंदी को संघ की राजभाषा स्वीकार करते हुए अनुच्छेद 343 में कहा गया था कि संविधान के प्रारंभ से पंद्रह वर्षों की अवधि तक संघ के शासकीय प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी भाषा का प्रयोग किया जाता रहेगा।

ओम निश्चल

विधान में राजभाषा के संबंध में व्यवस्थाएं दी गई हैं। ये अनुच्छेद संघ की भाषा, प्रादेशिक भाषाओं, उच्चतम न्यायालय, उच्च न्यायालयों आदि की भाषा, हिंदी के संबंध में विशेष निर्देश, संसद और विधान मंडलों की भाषाओं से संबंधित हैं। संसद द्वारा 1968 में पारित राजभाषा संकल्प में हिंदी के विकास हेतु भारत सरकार द्वारा व्यापक कार्यक्रम तैयार किए जाने, आठवीं अनुसूची की सभी भाषाओं के विकास, त्रिभाषा सूत्र के कार्यान्वयन, संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं में आठवीं अनुसूची की सभी भाषाओं तथा अंग्रेजी को वैकल्पिक माध्यम के रूप में रखे जाने आदि के संबंध में संकल्प लिया गया है। इसके बावजूद राजभाषा नीति के मूल स्वर में अंग्रेजी की यथास्थिति का वर्चस्व बनाए रखा गया है। संविधान की मान्य आठवीं अनुसूची में अंग्रेजी कहीं नहीं नहीं है, फिर भी उसे संविधान में सिर माथे बिठाया गया है।

हिंदी को संघ की राजभाषा स्वीकार करते हुए अनुच्छेद 343 में कहा गया था कि संविधान के प्रारंभ से पंद्रह वर्षों की अवधि तक संघ के शासकीय प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी भाषा का प्रयोग किया जाता रहेगा। यह भी व्यवस्था दी गई कि संसद उक्त 15 वर्ष की अवधि के बाद भी विधि द्वारा अंग्रेजी भाषा का ऐसे प्रयोजनों के लिए प्रयोग कर सकेगी, जो ऐसी विधि में विनिर्दिष्ट किए जाएं। यानी 1965 के बाद अंग्रेजी का प्रयोग केवल कुछ निश्चित कार्यों के लिए हो सकता था, पर अपरिहार्य दबाव के कारण संसद में राजभाषा विधेयक 1963 लाया गया और उसमें अनुच्छेद 343(3) के प्रावधानों की अनदेखी करते हुए अंग्रेजी के प्रयोग को 1965 के बाद उन सभी सरकारी कामों एवं संसद के कार्य व्यवहार के लिए हिंदी के अतिरिक्त जारी रखने का प्रावधान किया गया, जो अंतत: हिंदी के विकास के लिए काफी घातक सिद्ध हुआ है। अलबत्ता इस प्रावधान से नौकरशाही को अंग्रेजी के प्रयोग का जैसे लाइसेंस मिल गया।

हिंदी को अंग्रेजी के साथ चलने के लिए एक और बैसाखी पकड़ा दी गई। इस बैसाखी को अधिनियम की भाषा में धारा 3(3) कहते हैं। इस धारा के तहत सामान्य आदेशों, संकल्पों, नियमों, अधिसूचना, प्रशासनिक या अन्य प्रतिवेदनों, प्रेस विज्ञप्ति, संसद के सदनों में रखे जाने वाले प्रशासनिक तथा अन्य प्रतिवेदनों व कागजात के लिए संविदाओं, करारों, अनुज्ञप्ति, अनुज्ञा पत्र, निविदा प्रारूपों के लिए हिंदी-अंग्रेजी दोनों का एक साथ प्रयोग अनिवार्य कर दिया गया। हिंदी, हिंदीभाषी प्रदेशों में भी इस कानूनी असंगति की नियति स्वीकार करने के लिए बाध्य है। हिंदीभाषी प्रदेशों के कार्यालयों द्वारा कई बार इस युक्तिसंगत सवाल को उठाया गया कि हिंदी क्षेत्रों में उक्त कार्यों के लिए अंग्रेजी की अनिवार्यता नहीं होनी चाहिए, क्योंकि यहां के कर्मचारी, अधिकारी और निवासी सभी भली-भांति हिंदी समझते और व्यवहार करते हैं। पर हर बार इस सवाल को यह मान कर अनदेखा किया जाता रहा है कि यह संविधान-सम्मत प्रावधानों की अवहेलना होगी।

मौजूदा स्थिति में अंग्रेजी की प्रेत छाया से हिंदी को शायद ही छुटकारा मिले, क्योंकि धारा 3(5) में यह भी स्पष्ट कर दिया गया था कि यह उपबंध तब तक लागू रहेगा, जब तक उन सभी राज्यों की विधानसभाएं, जिनकी सरकारी भाषा हिंदी नहीं है, अंग्रेजी को हटाने के लिए प्रस्ताव पारित नहीं कर देतीं और इन प्रस्तावों पर विचार करने के उपरांत संसद भी अंग्रेजी के निषेध के लिए किसी प्रकार का प्रस्ताव पास नहीं करती। स्पष्ट है कि वह दिन कभी नहीं आएगा, जब सभी राज्य सरकारें अंग्रेजी को हटाने का प्रस्ताव करेंगी।

निचली अदालतों को छोड़कर उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय में अंग्रेजी का बोलबाला है। यहां तक कि हिंदी माध्यम से पढ़े विधि स्नातक को बार काउंसिल की सदस्यता तक नहीं मिलती। न्यायालयों में अंग्रेजी को बने रहने का अधिकार संविधान ने ही दिया है। 348वें अनुच्छेद में यह प्रावधान किया गया है कि जब तक संसद दूसरा कानून नहीं बनाती, तब तक उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों की सभी कार्यवाहियों में अंग्रेजी का ही प्रयोग होगा। संसद और राज्य विधानमंडलों के कानूनों तथा संविधान के तहत संसद या किसी भी राज्य के विधान मंडलों द्वारा बनाए गए सभी आदेशों, नियमों और विधियों के प्राधिकृत पाठ अंग्रेजी में होंगे।

इस बारे में संसदीय समिति की सिफारिश भी गौरतलब है। समिति यह तो मानती है कि उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय की कार्यवाही अंतत: हिंदी में की जाए तथा निर्णयों, डिक्रियों और आदेशों की भाषा सब प्रदेशों में हिंदी में होनी चाहिए। परंतु उसका कहना है कि ऐसा ‘इस परिवर्तन के लिए उपयुक्त समय आने पर ही’ किया जाए। समिति को सिफारिश दिए हुए भी काफी समय हो चुका है। इस अवधि में संसदीय राजभाषा समिति 1959 से जून 2011 तक राष्ट्रपति को अपनी रिपोर्ट के नौ खंड पेश कर चुकी है, जिसकी बहुत-सी सिफारिशें राष्ट्रपति मान चुके हैं तथा उन पर आदेश भी जारी कर चुके हैं। संसदीय समिति ने सीबीएसई से जुड़े सभी स्कूलों और केंद्रीय विद्यालयों में कक्षा दस तक हिंदी को अनिवार्य विषय के रूप में पढ़ाने का प्रस्ताव भी दिया था, जहां अभी इन स्कूलों में कक्षा आठ तक ही हिंदी पढ़ना अनिवार्य है। वहीं गैर-हिंदीभाषी राज्यों के विश्वविद्यालयों को कहा गया है कि परीक्षाओं और साक्षात्कार में हिंदी में उत्तर देने का विकल्प दें। यह सिफारिश भी स्वीकार की गई है कि सरकार सरकारी संवाद में कठिन हिंदी शब्दों के उपयोग से बचे और हिंदी शब्दों के अंग्रेजी लिप्यंतरण का एक शब्दकोश तैयार करे। पर सरकारी नौकरी के लिए हिंदी के न्यूनतम ज्ञान की अनिवार्यता की सिफारिश को अभी स्वीकार नहीं किया गया है, जो कि हिंदी के प्रयोग की आधारभित्ति है। ऐसे हालात में हम अनुवाद के जरिए संवैधानिक आवश्यकताओं की पूर्ति तो कर सकते हैं पर हिंदी का स्वाभाविक कामकाजी माहौल नहीं तैयार कर सकते।

फिर, हमारे यहां आज भी कमोबेश मैकाले की शिक्षा पद्धति लागू है। राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा नीति में समानता नहीं है। 1968 के राजभाषा संकल्प में समूचे भारत में त्रिभाषा सूत्र लागू किए जाने की आवश्यकता पर बल दिया गया था, पर यह सूत्र न जाने कहां विलीन हो गया। इसमें हिंदीभाषी क्षेत्रों में हिंदी अंग्रेजी के अलावा दक्षिण भारत की भाषाओं में से किसी एक और हिंदीभाषी क्षेत्रों में प्रादेशिक भाषाओं और अंग्रेजी के साथ-साथ हिंदी के अध्ययन का प्रावधान रखे जाने का संकल्प लिया गया था, पर राष्ट्रीय शिक्षा नीति इस बिंदु पर भी विफल रही है। आज न तो सर्वत्र माध्यम के रूप में और न त्रिभाषा सूत्र की एक भाषा के रूप में हिंदी और अन्य दक्षिण भारतीय भाषाओं का अस्तित्व शिक्षा नीति के मसौदे में कायम है।

क्या विडंबना है कि कानून कहता है, हिंदी किसी पर थोपी नहीं जाएगी, अधिनियम कहता है, हिंदी के साथ फलां-फलां चीजों के लिए अंग्रेजी का प्रयोग अनिवार्य होगा। राजभाषा नियम कहता है, कोई भी कर्मचारी किसी भी फाइल पर टिप्पणी या नोटिंग हिंदी या अंग्रेजी में लिख सकता है; उससे अनुवाद की अपेक्षा नहीं की जाएगी। नियम कहता है हिंदी भाषा-भाषी क्षेत्रों के कार्यालयों और अर्ध हिंदीभाषी क्षेत्रों के कार्यालय के साथ पत्राचार हिंदी या अंग्रेजी में किया जा सकता है। पर अहिंदीभाषी इलाके के कार्यालयों को हिंदी में पत्र भेजने पर उसका अंग्रेजी अनुवाद भी भेजना होगा। जब अंग्रेजी के प्रयोग को जारी रखने के लिए राजभाषा नीति ही आश्रय देती हो, तो वहां हिंदी प्रयोग के लिए हिंदी जनों की कोशिश या सरकार की कोशिशें सफल नहीं हो सकतीं। आज के संदर्भ में क्या यह जरूरी नहीं हो गया है संविधान के अनुच्छेदों पर राजभाषा अधिनियम और नियमों पर फिर से गौर किया जाए तथा हिंदी को उसका खोया हुआ आत्मसम्मान वापस किया जाए! कम से कम हिंदी क्षेत्रों में द्विभाषिकता की अनिवार्यता को खत्म कर हिंदी को अंग्रेजी की छाया से मुक्ति दिलाई जाए। बहुमत पर अल्पमत की भाषा थोपने का प्रयत्न अब तो कम से कम खत्म होना चाहिए। ०

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