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प्रसंगवशः हिंदी और उर्दू गजल का आपसी रिश्ता

हिंदी और उर्दू गजल की उम्र में काफी अंतर है। वली दकनी से आरंभ उर्दू गजल की समृद्ध परंपरा लगभग ढाई सौ सालों में फैली हुई है, जबकि दुष्यंत कुमार से शुरू हिंदी गजल ने अभी आधी सदी का वक्त तय किया है।

Author April 15, 2018 00:59 am

जहीर कुरैशी

हिंदी और उर्दू गजल की उम्र में काफी अंतर है। वली दकनी से आरंभ उर्दू गजल की समृद्ध परंपरा लगभग ढाई सौ सालों में फैली हुई है, जबकि दुष्यंत कुमार से शुरू हिंदी गजल ने अभी आधी सदी का वक्त तय किया है। जहां तक उर्दू का सवाल है- वह तो हिंदी की सहोदरा है। हिंदुस्तान के तत्कालीन लश्करी परिवेश में ही जन्मी और हिंदी के साथ-साथ पली-बढ़ी। प्रारंभिक तौर पर लश्करी जुबान उर्दू तत्कालीन हिंदी सहित अनेक बोली-बानियों को आत्मसात कर लेने वाली खिचड़ी भाषा के रूप में ही दृष्टिगोचर हुई। लेकिन, उर्दू भाषा को माधुर्य और तरतीब दी उसकी शायरी ने। उर्दू शायरी में भी उसका कंठहार बनी उर्दू गजल, जो शब्दों की मितव्ययिता, उद्धरणशीलता और अचूक व्यंजना के कारण न केवल एशिया, बल्कि पूरी दुनिया में सुनी, पढ़ी और सराही जाती है।

समकालीन हिंदी गजल ने उर्दू गजल के रास्ते पर चल कर पांच दशक की यात्रा पूरी की है। वह भी वजन और बहर को मानती है और अरेबिक अकार्नों का पालन करने वाले इल्मे-अरूज को स्वीकार करते हुए हिंदी की प्रकृति, पहचान, शब्द-शक्ति, मिथक और मुहावरे से हिंदी साहित्य के अनुभव-कोष को विस्तार दे रही है। हिंदी गजल भी ‘तगज्जुल’ को स्वीकार करती और शेर कहते हुए अभीष्ट सांकेतिकता की अधिकतम रक्षा करना चाहती है।

हालांकि अलग-अलग लिपियों में लिखे और पढ़े जाने के कारण हिंदी और उर्दू के बीच वैसा ताल-मेल नहीं बन पाया, जैसा दो सहोदरा भाषाओं के बीच होना चाहिए। रही-सही कसर देश की वोट केंद्रित राजनीति ने पूरी कर दी, जिसने उर्दू को मुसलमानों और हिंदी को हिंदुओं की भाषा का रंग देने का प्रयत्न किया। फलस्वरूप दोनों भाषाओं के साहित्यकारों द्वारा सामंजस्य के लगातार प्रयत्नों के बाद भी हिंदी और उर्दू के बीच संवादहीनता पसरी रही। एक अरसे तक, उर्दू गजल के शायर समझते रहे कि हिंदी वालों को त्रुटिहीन शेर कहना नहीं आता। मूलत: वे वजन और बहर की गलतियां करते हैं और उन्हें गजल के ‘मेनरिज्म’ का भी इल्म नहीं।

मगर, भला हो बाजारवाद का- जिसने हिंदी को एक ऐसी भाषा का दर्जा दिया, जो अस्सी करोड़ से अधिक लोगों द्वारा बोली और समझी जाती है। पिछले पचास-साठ सालों में पॉकेट बुक सीरीज ने मीर, गालिब, सौदा, मोमिन, दाग, हाली, इकबाल, फैज, फिराक जैसे कालजयी शायरों को पाठकों के सम्मुख हिंदी यानी देवनागरी में परोसा। बेगम अख्तर, मेहदी हसन, गुलाम अली के अलावा जगजीत सिंह, लता मंगेशकर, आशा भोंसले, चंदन दास आदि गजल-गायकों ने उर्दू गजल को हिंदुस्तानी श्रोताओं और दर्शकों में लोकप्रिय बनाया। देवनागरी लिपि में, इल्मे-अरूज (गजल छंद-शास्त्र) की विविध पुस्तकें प्रकाशित हुर्इं। मुशायरे और कवि सम्मेलनों के सम्यक आयोजनों ने उर्दू और हिंदी के गजलकारों को एक साथ मिलने-बैठने के अवसर प्रदान किए। फलस्वरूप हिंदी और उर्दू गजल के रचनाकारों के बीच जमी बर्फ पिघली, संवादहीनता टूटी और आपसी सामंजस्य स्थापित हुआ।
गजल में गहरी रुचि रखने वाला हर व्यक्ति जानता है- गजल की बाहरी और भीतरी दो संरचनाएं हैं। बाहरी संरचना रदीफ-काफिए की पाबंदी से लेकर शेर के वजन को जांचने-परखने के स्वीकृत छंद-अनुशासन तक सीमित होती है। भीतरी संरचना में; विचार, संवेदना और कल्पनाशीलता के युक्ति-युक्त सम्मिश्रण से शेर जन्म लेता है। हर हिंदी या उर्दू या अन्य भाषा के शायर के सामने दोनों संरचनाओं के साथ अपने रचनात्मक व्यवहार की चुनौतियां होती हैं।

उल्लेखनीय है कि उर्दू शायरी की शहरी मध्यवर्गीय सीमा को हिंदी सोच की शायरी करने वालों ने थोड़ा और विस्तृत किया है। हिंदी में लिखी जा रही गजलों के विषय-वैविध्य उर्दू गजलों से अधिक हैं। तमाम विषय तो ऐसे हैं, जिनसे शायरी को सिर्फ हिंदी गजल ने अवगत कराया। जैसे, स्त्री की ओर से पुरुष के प्रति प्रेमाभिव्यक्ति, शायरी में बाल-मन की छवियां, महबूबा के अलावा स्त्री के अन्य रूप, घरेलू जीवन, परिवार, लोकतंत्र, समाज में शीर्ष स्थान पर बैठे लोगों के प्रति संदेह करने का साहस, जनसामान्य से जुड़ाव और संघर्ष का पौरुष, जटिल और निरंतर गतिशील यथार्थ की पहचान-पकड़ आदि। मसलन, अपने लिए वोट मांगने से पहले, देश का प्राय: हर राजनेता अंतिम आदमी तक पहुंचने की बात करता है, लेकिन अब मुल्क का अंतिम आदमी भी समझ गया है कि यह सब छलावा है। विनोद तिवारी के अनुसार, अंतिम आदमी जानता है-
आपने सुख टांग रक्खे हैं वहां,
हाथ मेरे जिस जगह जाते नहीं।
ऐसा ही एक शेर जहीर कुरेशी का है-
समुद्र शक्ल से कितना शरीफ लगता है,
ये तस्करों से मिला है, पता नहीं लगता!
सलीम खां फरीद राजनेताओं की ‘जैसा बोओगे, वैसा काटोगे’ मानसिकता पर एक ऐसा शेर कह जाते हैं, जो देर तक सोचने के लिए मजबूर करता है।
खेतों में पर्वत उग आए,
तुमने पत्थर डाले होंगे।
हिंदी गजल के उन्नयन के विगत पचास वर्षों में आदमी की जिंदगी बहुत बदली है। आधुनिक तकनीक हमारे समय का एक बहुत बड़ा सच है। उसके प्रवेश के साथ, आज के मनुष्य का स्वभाव बदला है। आधुनिक तकनीक के अनुसार, हमारे रिश्ते-नाते भी बदल रहे हैं।
आजकल बाजारवाद पर भी हिंदी गजलकारों की पैनी नजर है। विश्व-बाजार और उसके अनुसार बदलता मनुष्य का मन, बाजार के अनुसार बदलती आकांक्षाएं, सीमा से बाहर जाने पर उसके दुष्परिणाम आदि समकालीन विषयों पर हिंदी गजल में उल्लेखनीय शेर कहे जा रहे हैं। बाजारवादी मानसिकता पर डॉ. कुमार विनोद का स्मरणीय शेर है-
खूबसूरत जिस्म हो या सौ टका ईमान हो,
बेचने की ठान लो तो हर तरफ बाजार है।
आज आस्था, आतंक, घृणा, प्यार, आत्मा, परमात्मा- जैसी अनेक ऐसी चीजें बिक रही हैं जिनके विक्रय के विषय में इंसान कभी सोचता भी नहीं था। इस विषय पर देवेंद्र आर्य का एक शेर-
यहां है एक ही मौसम, खरीदो या बेचो,
सबाब भी यहां सौदागरी से तय होगा।
आतंकवाद आज पूरी दुनिया के लिए समस्या बना हुआ है। नोन, तेल, लकड़ी की तरह आज आतंक भी बेचा जा रहा है। हरे राम समीप खौफ को बेचने की एक अलग शैली में पड़ताल करते हैं। इस विषय पर उनका शेर-
खौफ बेचा जा रहा बाजार में कम दाम पर,
क्योंकि जालिम को मुनाफे में तबाही चाहिए।
आज की हिंदी गजलों के विषय में पर्यावरण-विनाश भी एक प्रमुख मुद्दा है। तथाकथित तरक्की के लिए जिस तेजी से पेड़ काटे जा रहे हैं, उसी गति से हम प्रकृति से दूर होते जा रहे हैं। यहां तक कि आज के आदमी के घर-आंगन में भी पेड़ अनुपस्थित हैं। कमलेश भट्ट कमल के अनुसार-
पेड़ कटे तो छांव कटी फिर आना छूटा चिड़ियों का,
आंगन-आंगन रोज फुदकना, गाना छूटा चिड़ियों का।
मिट्टी के घर में इक कोना चिड़ियों का भी होता था,
अब पत्थर के घर से आबोदाना छूटा चिड़ियों का।
खासकर शहर का आदमी, भांति-भांति के पखेरुओं के नाम भी नहीं जानता। वह (प्रकृति की जान) पक्षियों को घर के अंदर भी आने देना नहीं चाहता। जबकि पंछी शहरी आदमी से भी दोस्ती करना चाहते हैं। हरजीत सिंह के शेर के मुताबिक-
खिड़की के पास आऊं तो भीतर भी आ सकूं,
चिड़िया ये कह रही है कि जाली उतार दे!
संवादहीनता टूटने के बाद, हिंदी और उर्दू गजल के विषयों में भी आदान-प्रदान हो रहा है। लेकिन, चूंकि हिंदी गजल की स्पर्धा समकालीन छंद मुक्त और मुक्त-छंद कविता से है, इसलिए हिंदी गजल विषयगत नवाचार के प्रति उर्दू गजल से अधिक सचेत है।
पचास वर्षों की निरंतर यात्रा के बाद, हिंदी गजल मुझे समकालीन (छंद मुक्त और मुक्त छंद) कविता का ही गेय रूप लगती है।
पहली बात तो यह कि हिंदी गजल की उर्दू गजल से कोई स्पर्धा नहीं है। उर्दू गजल की जमीन पर चल कर ही हिंदी की भाषा प्रकृति के अनुरूप हिंदी काव्य में गजल का यह रूप विकसित हुआ है। इस बात को यों भी समझा जा सकता है कि जैसे फारसी गजल की राह पर चल कर उर्दू गजल ने आकार ग्रहण किया उसी प्रकार, उर्दू गजल के मार्ग पर चल कर हिंदी गजल पल्लवित हुई है, हो रही है। यही हिंदी गजल और उर्दू गजल का आपसी रिश्ता है। ०

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