ताज़ा खबर
 

रविवारी: हारेगी नहीं करुणा

कोरोना विषाणु हमारे बीच सिर्फ एक जानलेवा संक्रमण भर लेकर नहीं आया है बल्कि इसके साथ ही हम सामाजिकता और सभ्यता के नए अर्थ, उसके भावी गंतव्य को लेकर भी फिक्र से भर गए हैं। तमाम तरह की सामाजिक दूरियों के साथ खुद को घर में कैद कर लेना सेहत और सुरक्षा की एक जरूरी हिदायत भले हो, पर इससे प्रेम, करुणा और सद्भाव के पुराने सारे सबक समाज की स्लेट से मिट नहीं गए हैं। करुणा और प्रेम की ताकत बड़ी है। दो विश्वयुद्ध और एटमी धमाके के बाद भी अगर दुनिया बची है, मनुष्य और उसका समाज टिका है, आगे बढ़ा है तो इसलिए क्योंकि कुछ शास्वत मानवीय मूल्यों को हमने आपदा और चुनौती के हर मोर्चे पर बचाना जरूरी समझा है। कोरोना का संकट किसी भी सूरत में मानवीय करुणा को संक्रमित नहीं कर पाएगा, इसी उम्मीद और भरोसे पर रविवारी का अक्षर आयोजन।

Coronavirus Cases Latest News: दुनिया में कोरोना का संक्रमण तेजी से बढ़ रहा है। (file)

देश इक्कीस दिनों की राष्ट्रव्यापी बंदी को लेकर शुरुआती दुविधा के बाद अब इसे न सिर्फ एक जरूरी हिदायत की तरह मानने को तैयार दिख रहा है बल्कि स्वतंत्र भारत के हिस्से आए इस नितांत नए अनुभव को लेकर अपनी समझ और सामाजिकता को नए सिरे से गढ़ भी रहा है। दो विश्वयुद्धों और शीतयुद्ध के बीतने के बाद यह पूरी दुनिया के लिए भी अपने विकास की चरणबद्धता को नए सिरे से परिभाषित करने का वक्त है। कमाल की बात है जिस आधुनिकता ने रातोंरात अपनी छतरी के नीचे पूरे विश्व को आने पर मजबूर कर दिया, उस वैश्वीकरण की प्रक्रिया का आखेट भी कोरोना के खतरे के आगे कमजोर पड़ गया है।

यही नहीं, तकनीक ने भी जिस तरह बीते कुछ दशकों में मनुष्य के पूरे परिवेश को, उसके पूरे कार्य-व्यवहार को बदल कर रख दिया है, हमारे जीवन में तकनीक का वह दखल भी कम से कम कोरोना से जंग लड़ते हुए या तो प्रभावी नहीं दिख रहा या फिर कुछ मोर्चों पर पूरी तरह से खारिज ही हो रहा है। सोशल नेटवर्किंग के दौर तक लाने वाला इंटरनेट आज ‘सोशल डिस्टेंस’ (सामाजिक अलगाव) की हिदायतों से अगर अपने ही विरोधाभासों में उलझा है तो इसलिए कि समाज का आज और उसका अब तक का तकनीकी अभ्यास, दोनों ही कोरोना को परास्त करने में लाचार साबित हो रहे हैं।

इस बीच, कोरोना के प्रकोप को लेकर जो एक बात समझ में आती है वह यह कि इस खतरे से निपटने की तैयारी दुनिया में शिद्दत से चल रही है। जहां एक तरफ आपदा की इस विषम स्थिति में स्वास्थ्य सेवाओं के नए उपक्रम लोगों की मदद कर रहे हैं, वहीं दुनियाभर में शासन-प्रशासन अपने सामर्थ्य के साथ लोगों की बाहरी गतिविधियों को अपने-अपने तरीके से नियंत्रित करने में लगा है। पर ये सारी तैयारी, ये सारे प्रयास कोरोना संक्रमण को फैलने से रोकने में पूरी तरह कारगर कब तक होंगे, यह कहना मुश्किल है।

कुछ विशेषज्ञों के आकलन के मुताबिक कम से कम छह महीने लगेंगे इस वैश्विक आपदा से बाहर निकलने में। ये छह महीने बाजार, व्यापार, सामाजिक गतिविधियों सबके लिए एक आकस्मिक स्थगन का दौर होगा। फिर जब हम इससे बाहर निकलेंगे तो जीवन और समाज के संबंधों-सरोकारों को नए सिरे से बुनने-समझने की स्थिति में होंगे। इस दौरान सरकार और प्रशासनिक महकमों का विवेक जिस तरह हमारे अनुभवों में दर्ज होगा, उससे भी हम भविष्य को लेकर एक नई समझ विकसित कर रहे होंगे शासन और अनुशासन को लेकर।

समाज और सरोकार
दिलचस्प है कि घर में खुद को कैद करना आज सुरक्षा का महामंत्र है, यह कभी युद्ध के दिनों में लोगों को बताया-समझाया जाता था। आज यह स्वास्थ्य सुरक्षा की सबसे बड़ी हिदायत है कि मिलकर या साथ न रहें, यह खतरनाक है, यह जानलेवा साबित हो सकता है। ऐसे में दुनिया भर में मानव सभ्यता अपने को बचाने के लिए जिस तरह सामाजिक अलगाव जैसी हिदायतों को अपनाने पर मजबूर है, वह समाज और व्यक्तिके रिश्ते को नए सिरे से परिभाषित कर रहा है।

सहयोग, समन्वय, सहकार जैसे उच्च सामाजिक मूल्यों की जगह एकांत और अधिकतम संयम को जीवनाभ्यास बनाते हुए मनुष्य आज कहीं न कहीं इस सवाल से भी जूझ रहा है कि समाज और सभ्यता के विकास के तमाम चरणों को पार करते हुए आखिर वह पहुंचा कहां है? उसका आज इतने खतरे में क्यों है? अतीत के अनुभवों से सीखते हुए वह वर्तमान तक तो आ गया है पर भविष्य की यात्रा के लिए सीख की पुरानी गांठ को वह अपने साथ रखे या कुछ नए सबकउसे सीखने होंगे?

सभ्यता विमर्श का नया तर्क
कोरोना ने सभ्यता विमर्श और कई ऐतिहासिक-सामाजिक आकलनों को भी संक्रमित किया है। आज हम 21वीं सदी में हैं। बीस साल पहले हम जिस सदी को पीछे छोड़ आए हैं, उस सदी की सामाजिक, वैचारिक और आर्थिक उपलब्धियां कम नहीं रही हैं। कोरोना के कहर के बीच इतिहासकार जुआल नोवा हरारी की चर्चा खूब हो रही है। हरारी इजराइल के थे।

उन्होंने बीसवीं सदी की वैज्ञानिक उपलब्धियों पर नाज करते हुए कहा था कि मानव सभ्यता अब हर तरह की तबाही से आगे निकल चुकी है। युद्ध, अकाल और महामारी पर एक तरह से विजय की उन्होंने घोषणा की थी। पर यह विजयघोष आज खारिज होता दिख रहा है। सभ्यता के संकट जैसे किसी निष्कर्ष पर पहुंचने की जल्दबाजी अगर न भी दिखाएं तो भी एक बात तो कही ही जा सकती है कि मनुष्य, उसका समाज, उसकी सभ्यता अगर बची रहेगी तो उसमें वैज्ञानिक विवेक के साथ सहअस्तित्व, सद्भाव जैसे तरल मूल्यों की ही भूमिका सबसे बड़ी होगी।

क्या ये हैरत भरा नहीं कि जिन देशों ने विश्वयुद्ध जैसी त्रासद स्थिति का सामना सबसे ज्यादा किया, आधुनिक साहित्य के ‘क्लासिक टाइटल्स’ सबसे ज्यादा उन्हीं देशों के नाम हैं। रूस, जर्मनी से लेकर अमेरिका तक में अगर आधुनिक विमर्श की जमीन ज्यादा उर्वर दिखती है तो इसलिए क्योंकि जीवन के मर्म और द्वंद्व को नए सिरे से समझने की ललक उनके यहां कहीं ज्यादा है। यही नहीं, उनके पास यह अनुभव भी ज्यादा गाढ़ा है कि युद्ध जैसी आपदा में भी जिंदगी की गरमाहट अगर महसूस होती रही है तो इसका श्रेय मनुष्य के भीतर प्रवाहित होती उस तरलता को है, जिसकी हिफाजत वह हर कीमत पर चाहता है।

करुणा ही कारगर
कोरोना विषाणु के खतरे को लेकर अभी यह तय होना बाकी है कि महामारी के तौर पर आई यह तबाही मानव प्रदत्त है या प्रकृति प्रदत्त। इस बारे में बहुत जल्दी में कोई अध्ययन या विश्लेषण अपने अंतिम नतीजे पर पहुंच जाएगा, इसकी संभावना कम ही है। पर हां, कुछ निष्कर्ष अभी से हमारे सामने हैं इस जानलेवा संक्रमण को लेकर। पहली बात तो यह कि असामाजिकता, करुणाहीनता या संवेदनहीनता जैसी किसी भयावह सूरत तक मानव सभ्यता के पहुंचने का खतरा अगर कुछ लोग इस महामारी के कारण देख रहे हैं तो वे मानव की भीतरी संरचना को समझने में भूल कर रहे हैं। उल्लास और विपदा को जीवन की क्रमिकता समझना, हर सूरत में जीवन में आशावादी होते हुए आगे बढ़ने की समझ मनुष्यता के खाते में केंद्रीय और गूढ़ तौर पर दर्ज है। यही उसकीजीवन की समझ भी है और इसी समझ से वह हर अच्छी-बुरी स्थिति से निकलते हुए सभ्यता और सामाजिकता की अपनी यात्रा को जारी रखता आया है। इसलिए कोरोना का संक्रमण अंतिम तौर पर कम से कम मानवीय करुणा और उसकी संवेदनात्मक तरलता के खिलाफ तो कम से कम नहीं ही जाएगा, यह बात ठोस तरीके से समझ लेनी होगी।

भारत की स्थिति
भारत की स्थिति इन देशों से अलग इसलिए है क्योंकि विश्वयुद्धों में एक तो हमारी प्रत्यक्ष भागीदारी नहीं थी, न ही एटमी धमाके को हमने अपने सिर पर महसूस किया। इसके उलट नवजागरण और सत्याग्रह जैसे आदर्शों-संकल्पों के बीच हमने अपनी आधुनिक सामाजिकता को सिरजा है। कोरोना के संकट के बीच, हमारे प्रधानमंत्री ने भी बहुत सोच-समझकर ही कहा है कि कोरोना को हम करुणा से ही हरा सकते हैं। दुनियाभर में स्वास्थ्य सेवाओं से लेकर प्रशासनिक पहलों के बीच जिस तरह कोरोना के खिलाफ संघर्ष चल रहा है, उसके बीच सहयोग और सहअस्तित्व की एक नई तरह की सामाजिकता भी कहीं न कहीं आकार ले रही है, जिसमें लोग एक दूसरे की मदद और जरूरत में खड़े होने का सबक सीख रहे हैं, सुरक्षित आपसदारी की एक से बढ़कर एक मिसालें पेश कर रहे हैं।

लोक, परंपरा और कोरोना
हिंदी साहित्य और आलोचना में जो दो बीज शब्द हैं, वे हैं- लोक और परंपरा। लोक के साथ कल्याण का अभिप्राय आरंभ से जुड़ा रहा है। यही नहीं, लोक के साथ एक और बात जो गहरे तरीके से जुड़ी है, वह है उसकी रागात्मकता। देश में कोरोना से जब दूसरी-तीसरी मौत ही हुई थी, तब से मैथिली, भोजपुरी और अंगिका जैसी बोलियों-भाषाओं में इस महामारी को लेकर गीत न सिर्फ बनने शुरू हो गए बल्कि लोकप्रिय भी होने लगे। कह सकते हैं कि कुछ दिनों में ही भारत एक ऐसे देश के तौर पर समाने आया, जो एक तरफ कोरोना से संघर्ष कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ इस महामारी के आगमन की क्रूर आकस्मिकता और उसकी विदाई की लोककामना को गाने भी लगा। अखबारों, टीवी चैनलों पर आज अगर ऐसी खबरें आ रही हैं कि लोग खुद से पहल करके कोरोना संक्रमण के खतरों के बीच अपनी रोजी-रोटी खोने वालों के लिए जनता रसोई चला रहे हैं, तो यह कहीं न कहीं दिखाता है कोरोना का कहर मानवीय करुणा को संक्रमित करने में असमर्थ है।

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 रविवारी कहानी: कंजूस मक्खीचूस
2 रविवारी: कमाल का चंबा रुमाल
3 जनसत्ता रविवारी कहानी: करनी का फल
IPL 2020 LIVE
X