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आधी दुनियाः महिला उत्पीड़न का दायरा

मुहावरों और कहावतों की रचना निश्चित रूप से हमारे पूर्वजों ने काफी चिंतन-मनन, और अनुभवों के आधार पर की गई होगी। ऐसे ही मुहावरों-कहावतों में सास-बहू की लड़ाई और सौतेली मां के जुल्म जैसी बातें भी शामिल हैं।

Author September 9, 2018 5:03 AM
ऐसे में अगर हम केवल पुरुष समाज पर इस बात का दोष मढ़ दें कि वह महिला विरोधी मानसिकता रखता है, तो ऐसा हरगिज नहीं, बल्कि दरअसल महिलाएं ही महिलाओं की बड़ी दुश्मन और विरोधी हैं।

मुहावरों और कहावतों की रचना निश्चित रूप से हमारे पूर्वजों ने काफी चिंतन-मनन, और अनुभवों के आधार पर की गई होगी। ऐसे ही मुहावरों-कहावतों में सास-बहू की लड़ाई और सौतेली मां के जुल्म जैसी बातें भी शामिल हैं। कभी हमने यह नहीं सोचा कि ऐसी कहावतें आखिर क्यों नहीं गढ़ी गर्इं कि ससुर-दामाद में पटरी नहीं खाती या सौतेला बाप अत्याचारी होता है? ऐसी अनेक घटनाएं आए दिन होती रहती हैं, जो इन कहावतों और मुहावरों को सही साबित करती हैं। ऐसी घटनाओं पर अगर हम बारीकी से नजर डालें तो इस नतीजे पर पहुंच सकते हैं कि वास्तव में औरत का सबसे बड़ा दुश्मन मर्द नहीं, बल्कि स्वयं औरत ही है।

मसलन, पिछले दिनों जम्मू-कश्मीर के बारामूला में नौ साल की मासूम बच्ची के साथ सामूहिक बलात्कार और फिर उसके शरीर को क्षत-विक्षत कर लाश जंगल में फेंक देने जैसी हृदयविदारक घटना सामने आई। हैरानी की बात है कि उस बच्ची के साथ बलात्कार का पूरा ताना-बाना रचने वाली कोई और नहीं, उसकी सौतेली मां थी। इतना ही नहीं, इस महिला ने उस नौ साल की सौतेली बेटी का बलात्कार अपने सगे बेटे के साथ-साथ चार अन्य पुरुषों से भी करवाया। हद तो यह है कि वह महिला बलात्कार के समय खुद भी वहां मौजूद रही। उसी के निर्देश पर उसकी लाश को जंगल में फेंक दिया गया। नहीं लगता कि किसी बच्ची के सौतेले बाप ने भी ऐसी क्रूरतम घटना अंजाम दी हो। क्या कोई महिला किसी मासूम बच्ची के प्रति इस कदर कू्रर हो सकती है? अगर महिलाएं ही महिलाओं या कन्याओं के प्रति ऐसा नजरिया रखेंगी तो आखिर पुरुष समाज से महिलाओं के प्रति सहानुभूति रखने की उम्मीद कैसे की जाए?

अगर भारतीय समाज पर व्यापक दृष्टि डालें तो यही पाएंगे कि पुत्रमोह महिलाओं में पुरुष से भी अधिक पाया जाता है। अधिकतर ऐसे परिवार, जहां एक दो या तीन लड़कियां पैदा हो जाएं और पुत्र प्राप्ति न हो, वहां पिता तो एक बार भले लड़कियों को भगवान की सौगात समझ कर स्वीकार कर ले, पर एक औरत की अंत तक यही चाहत होती है कि किसी तरह उसे पुत्र अवश्य पैदा हो। हमारे समाज में अनेक ऐसे परिवार भी मिल सकते हैं, जहां अगर किसी दंपति को एक ही बेटी है और कुछ वर्षों तक पुत्र की प्रतीक्षा करने के बाद अगर उस परिवार में पुत्र नहीं पैदा हुआ या पुत्र के पैदा होने की संभावना जाती रही, तो उस परिवार द्वारा अपनी सगी बेटी होने के बावजूद किसी दूसरे के लड़के को गोद भी ले लिया गया।

हमारा समाज इस विषय पर इतना दोहरा आचरण रखता है कि भारतीय महिलाएं ही नहीं, बल्कि पुरुष भी नौ देवियों की पूजा करते दिखाई देते हैं। सावित्री, गर्गी, अहिल्या, महारानी लक्ष्मी बाई, इंदिरा गांधी जैसी महिलाओं के किस्से सुना कर भारतीय महिलाओं का गुणगान तो जरूर किया जाता है, पर अपने घर-परिवार की कन्या को न तो ऐसी आदर्श महिलाओं के रूप में देखा जाता है, न ही उन पर इतना विश्वास किया जाता है कि भविष्य में मेरी बेटी भी उस स्तर की महिला बन सकेगी। इन सबके बजाय उसे सिर्फ एक अदद पुत्र की दरकार होती है। इसी प्रकार सास-बहू के झगड़े की कहावत को सही साबित करने वाली तमाम घटनाएं सोशल मीडिया पर वायरल होती रहती हैं।

कई बार हम ऐसे वीडियो देख चुके हैं, जिसमें बहू अपनी आपाहिज, विक्षिप्त या जर्जर शरीर की बूढ़ी सास को बुरी तरह पीट रही है। बड़े आश्चर्य की बात है कि वह इसका खयाल ही नहीं कर पाती कि कुछ ही वर्षों बाद इसी दौर से उसे भी गुजरना है। दान-दहेज का भी सबसे बड़ा लोभ औरत को ही होता है। वही अपने बेटे के लिए अधिक से अधिक दहेज लाने वाली बहू की उम्मीद लगाती है। प्राय: ऐसी खबरें भी सुनने में आती रहती हैं कि कोई महिला अपनी नवजात बालिका को कभी रेलवे स्टेशन, कभी किसी बस स्टाप पर या किसी गली-कूचे में किसी दरवाजे पर छोड़ कर चली गई। किसी नवजात पर इतना बड़ा जुल्म करना, उसे कुत्ते या सुअर के नोचने के लिए लावारिस छोड़ देना कहां की मानवता है?

ऐसी कारगुजारी भी मर्दों द्वारा नहीं, बल्कि महिलाओं द्वारा ही की जाती है। निश्चित रूप से पुरुष महिलाओं से अधिक आक्रामक, गुस्से वाला और बात-बात पर महिलाओं को आंखें दिखाने वाला होता है। पर देश के चारों ओर से आने वाले अनेक समाचार यह भी बताते हैं कि अपने परिवार के विरुद्ध साजिश या षड्यंत्र रचने में औरत का कोई मुकाबला नहीं। देश में हजारों ऐसी घटनाएं हो चुकी हैं, जिनमें किसी नवविवाहिता महिला ने अपने प्रेमी से मिल कर अपने पति की हत्या करवा दी हो। ऐसी भी अनेक घटनाएं हो चुकी हैं कि किसी महिला ने अपने सौतेले बच्चों और बच्चियों पर इतने जुल्म ढाए कि या तो बच्चों की मौत हो गई या वे घर छोड़ कर भाग गए।

इसी विषय को अगर हम देश की राजनीति के संदर्भ में भी देखें तो यही पाएंगे कि देश की विभिन्न राजनीतिक पार्टियां महिलाओं को तैंतीस प्रतिशत आरक्षण देने का ‘लॉलीपॉप’ दिखाती रहती हैं। सवाल है कि जब महिलाएं दुनिया की आधी आबादी हंै फिर उनके लिए केवल तीन प्रतिशत आरक्षण की बात क्यों करनी, पचास प्रतिशत आरक्षण की क्यों नहीं? दूसरी बात यह कि देश के अधिकतर राजनीतिक दलों में महिलाओं की संख्या भी अच्छी-खासी है, पर कभी भी देश के सभी राजनीतिक दलों की सभी महिलाओं को महिला आरक्षण के मुद्दे पर एकजुट होकर देश की महिलाओं की संयुक्त आवाज बनते हुए नहीं देखा गया होगा।

इसकी भी एकमात्र वजह यही है कि प्रत्येक राजनीतिक महिला महिलाओं के अधिकारों या कल्याण हेतु लड़ाई लड़ने के बजाय इस बात में अधिक दिलचस्पी रखती है कि उसका व्यक्तिगत राजनीतिक भविष्य कैसे और कितना सुरक्षित रह सकता है, इसलिए उसे देश की महिलाओं के अधिकारों के लिए अपनी अलग राह अख्तियार करने की जरूरत ही क्या है? महिलाओं की इसी स्वार्थपूर्ण सोच और राजनीतिक रूप से उनके बिखराव का लाभ पुरुष समाज उठाता है। नतीजतन, महिलाओं को महिला आरक्षण के संबंध में संसद से लेकर सड़कों तक बहस, चर्चा और अनेक प्रकार की लोकलुभावन बातें तो सुनाई देती हैं, पर महिला आरक्षण कहीं दूर-दूर तक नजर नहीं आता।

ऐसे में अगर हम केवल पुरुष समाज पर इस बात का दोष मढ़ दें कि वह महिला विरोधी मानसिकता रखता है, तो ऐसा हरगिज नहीं, बल्कि दरअसल महिलाएं ही महिलाओं की बड़ी दुश्मन और विरोधी हैं। अगर महिलाओं में परस्पर विश्वास और भरोसे की भावना होती, एक महिला दूसरी महिला का सम्मान करती, तो आज न तो वृंदावन में असहाय वृद्ध महिलाओं का हुजूम देखने को मिलता, न ही भारतीय महिलाओं की संभवत: इतनी दुर्दशा देखने को न मिलती।

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