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कामयाबी के नए मानक

हिंदी सिनेमा की सफलता और लोकप्रियता को बॉक्स आॅफिस पर कुल कमाई के पर्याय की तरह लिया जाने लगा है।

Author January 15, 2017 4:46 AM
2016 के बॉक्स ऑफिस कलेक्शन की बात करें तो बॉलीवुड स्टार आमिर खान और सलमान खान की फिल्में इस साल एक दूसरे को टक्कर देती नजर आईं।

राजकुमार

हिंदी सिनेमा की सफलता और लोकप्रियता को बॉक्स आॅफिस पर कुल कमाई के पर्याय की तरह लिया जाने लगा है। धन बटोरू सफलता ही लोकप्रियता का मानदंड हो गई है। ‘सौ करोड़ क्लब’ एक नया मुहावरा चल निकला है।  हिंदी फिल्मों के इतिहास में झाकें और लोकप्रिय फिल्मों की सूची बनाएं, जो अपने कथ्य, विषयवस्तु, सिनेमेटोग्राफी, अभिनय, कलात्मक अंतर्दृष्टि आदि की दृष्टि से और गुणवत्ता के आधार पर परखें तो ‘दबंग’, ‘दबंग-2’, ‘बॉडीगार्ड’, ‘एक था टाइगर’, ‘किक’, ‘बजरंगी भाईजान’, ‘सुलतान’, ‘गजनी’, ‘धूम-3’, ‘कृश’, ‘चेन्नई एक्सप्रेस’, ‘दंगल’ आदि को शायद ही जगह मिल पाए। मगर व्यावसायिक दृष्टि से देखें तो इतिहास में दर्ज यही सर्वाधिक हिट फिल्में नजर आती हैं।

यह मानना अतिशयोक्ति होगी कि लोकप्रिय और फार्मूलेबद्ध फिल्मों की कोई एक श्रेणी है। ‘लगान’, ‘मुन्ना भाई एमबीबीएस’, ‘तारे जमीं पर’, ‘थ्री इडियट’, ‘लगे रहो मुन्ना भाई’, ‘रंग दे बसंती’, ‘दंगल’, ‘जोधा-अकबर’, ‘पीके’, ‘पीपली लाइव’ आदि फिल्मों ने अपने सामाजिक-सांस्कृतिक संदेश, विषय-वस्तु, सिनेमेटोग्राफी, कलात्मकता, अभिनय, अंतर्दृष्टि, दर्शक प्रभाव आदि के मामले में लोकप्रिय फिल्म श्रेणी में अलग जगह बनाई। इन फिल्मों ने व्यावसायिक सफलता के भी रेकॉर्ड तोड़े और बनाए। साथ ही औपनिवेशिक मानसिकता, उत्तर-औपनिवेशिक व्यवस्था, सत्ता-संरचना और उसकी संस्थाओं में फैली अराजक निष्क्रियता, अभेद्य कू्ररता के बीच मानवीय संबंधों और रिश्तों को पुनर्परिभाषित किया, जिसे समाज के बड़े और अलग-अलग दर्शक समूह द्वारा प्रशंसित किया गया।

इन फिल्मों की सफलता ने समांतर फिल्म और मनोरंजक फिल्म के बीच की दूरी को काफी कम किया। समांतर फिल्में अपने ताकतवर कथ्य, अंतर्दृष्टि और कलात्मक औदात्य के बावजूद समाज के भिन्न-भिन्न वर्गों में लोकप्रिय नहीं हो सकीं। वह भी उन स्थितियों में जबकि वे अपने समय और समाज के यथार्थ से संवाद कर रही थीं। आज दर्जनों ऐसी फिल्में हैं, जिन्होंने समय के साथ संवाद बनाने की कोशिश की है और वे समांतर-सार्थक फिल्मों के खाते में जाने के बजाय लोकप्रिय फिल्मों की श्रेणी में हैं। ‘नो वन किल्ड जेसिका’, ‘लज्जा’, ‘क्वीन’, ‘डोर’, ‘जुबैदा’, ‘चांदनी बार’, ‘अस्तित्व’, ‘फिर मिलेंगे’, ‘इंगलिश विंगलिश’, ‘हाइवे’, ‘पिंक’ जैसी स्त्री केंद्रित फिल्में ‘भूमिका’, ‘अर्थ’ और ‘मिर्च मसाला’ की श्रेणी में शामिल होने के बजाय लोकप्रिय और सफल सिनेमा की श्रेणी में रहीं। ये फिल्में पितृसत्ता और स्त्री-शोषण, कू्ररता, हिंसा के खिलाफ संघर्ष करती हुए सफल हुर्इं। स्त्री सशक्तीकरण की दिशा में कदम बढ़ाया। लैंगिक भेदभाव के खिलाफ प्रतिपक्ष रचते हुए स्त्री-भाषा को ‘इवोल्व’ करने में सफलता हासिल की। सफल होने के वे सभी हथकंडे (हिंसा, सेक्स, रोमांस) अपने अंदर समेटे हुए आगे बढ़ीं।

जैसे-जैसे सामाजिक संवेदनशीलता बढ़ी है, फिल्म के लोकप्रिय होने के आख्यान में चीजें जुड़ती गई हैं। ईरानी फिल्मकार माजिद मजीदी ने ‘द कलर आॅफ पैराडाइज’ जैसी क्लासिकल फिल्म बना कर वैश्विक स्तर पर यह साबित किया कि नेत्रहीन बच्चे को फिल्म के केंद्र में रख कर सफलता हासिल की जा सकती है। इसका हासिल यह रहा कि हिंदी फिल्मों में भी ‘तारे जमीन पर’ (डिसलेक्सिया), ‘बर्फी’ (मूक-बधिर) जैसी फिल्में व्यावसायिक और मानवीय संवेदना की कई परतों को छूने की दृष्टि से सफल रहीं।  फिल्मों की लोकप्रियता उनकी अंतर्वस्तु, संवाद, पटकथा, विषय-वस्तु के चुनाव, सामयिक महत्त्व और समाज से इसके सीधे संवाद से जुड़ी है। किसी फिल्म की लोकप्रियता में सिर्फ आतंरिक तत्त्व महत्त्वपूर्ण नहीं होते, बल्कि व्यावसायिक दौर में फिल्म का बेहतरीन प्रमोशन, समय का चुनाव, पैकेजिंग और मैनेजमेंट आदि पर भी निर्भर करता है। इस चंचल बाजारवादी दौर में फिल्म एक प्रबंधन है। फिल्म के प्रोडक्शन बजट के बराबर मार्केटिंग बजट निर्धारित किया जाता है। फिल्म को प्रमोट करने के कई लोकप्रिय तरीके अपनाए जाते हैं, जिसमें, प्रेस रिलीज जारी करना, मीडिया में साक्षात्कार देना, विज्ञापन कैंपेन चलाना, फैशन और कपड़े के माध्यम से प्रमोट करना आदि। ट्रेलर, पोस्टर और गाने तो पहले भी जारी किए जाते थे, लेकिन फिल्मों में आइटम सांग डाल कर लोकप्रिय बनाने की शैली हाल में विकसित हुई।

इधर सोशल मीडिया फिल्म की सफलता का सबसे ताकतवर माध्यम बना है। दर्शकों की टिप्पणियां, लाइक्स और शेयरिंग फिल्म को लोकप्रिय बना रहे हैं। पीआर एजेंसियां इस हथियार का भरपूर इस्तेमाल कर रही हैं। यूट्यूब की महत्त्वपूर्ण भूमिका असंदिग्ध है। एक्शन फीगर, ब्रांड वैल्यू, उत्तेजक और आक्रामक सेक्सी छवि, आॅनलाइन डिजिटल स्क्रीन आदि का जबर्दस्त इस्तेमाल किया जा रहा है। वायरल मार्केटिंग और पेड विज्ञापनों का आक्रामक नुस्खा अपनाया जा रहा। कई बार सामाजिक संगठनों से सांठ-गांठ कर फिल्म को प्रतिबंधित करने की मांग कराई जाती है। फिल्म विवादास्पद हो जाए और लोगों की सहज जिज्ञासा उस दिशा में हो, यह भी तरीका निकाला गया।

‘दंगल’ इसलिए साढ़े तीन सौ करोड़ रुपए कमा गई, क्योंकि इसके रिलीज करने का समय बेहद उपयुक्त था। देश भर के तमाम शैक्षणिक संस्थान बंद हो गए थे। लंबी छुट््िटयों का समय था और मुकाबले में किसी बड़े स्टार की कोई और फिल्म नहीं थी। एक साथ ही ‘खान-त्रयी’ या अक्षय कुमार आदि बड़े स्टार की फिल्में रिलीज नहीं की जातीं। मैनेजमेंट और पीआर एजेंसियां और फाइनेंसर आदि इस बात का खयाल रखते हैं। कई बार यह भी देखने में आया है कि कुछ फिल्में ट्रेंड सेटर हो जाती हैं। उस रास्ते बनने वाली फिल्में लगातार लोकप्रिय हो जाती हैं। अस्सी के दशक में नकार दिए गए यंग्री यंग मैन की लीक को ‘कयामत से कयामत तक’, ‘मैंने प्यार किया’ और ‘दीवाना’ जैसी फिल्मों ने तोड़ा। ‘दंगल’ की सफलता के पीछे ‘लगान’, ‘चक दे इंडिया’ की भी भूमिका है, जिसने खेलों को फिल्म की केंद्रीय थीम बना दिया। ‘इकबाल’, ‘भाग मिल्खा भाग’, ‘सुलतान’, ‘मैरीकॉम’, ‘एमएस धोनी’ उसी रास्ते आगे बढ़ीं। खेलों और खिलाड़ियों की बढ़ती लोकप्रियता, उपलब्धि और सफलता फिल्म की सफलता के साथ आनुसंगिक हो गए हैं।

‘मुगल-ए-आजम’, ‘मदर इंडिया’, ‘पाकीजा’, ‘शोले’ की तुलना में ‘बजरंगी भाई जान’, ‘दंगल’ या ‘सुलतान’ की लोकप्रियता अलग है। उस जमाने में भी फिल्मों का विज्ञापन होता था। पोस्टर चिपकाए जाते थे। गली-गली माइक पर अनाउंस किया जाता था, लेकिन आज की तरह सोशल मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, प्रिंट मीडिया और रेडियो द्वारा आक्रामक प्रचार अभियान नहीं चलाए जाते थे। मीडिया के फिल्म पार्टनर बनने के कारण खबरों के बीच प्रचार का तरीका ढूंढ़ लिया गया है। दर्शकों पर आजमाए इन तरीकों से पीआर एजेंसियां अपने शोध से पहले ही जान लेती हैं कि फिल्म के बारे में दर्शकों की जागरूकता क्या है। वे बगैर कोई रिस्क लिए प्रमोशनल तरीके बदलती रहती हैं। इसलिए आज की फिल्मों की लोकप्रियता उस लोकप्रियता से अलग है, जिसमें टिकट लेने के लिए धक्का-मुक्की होती थी।
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