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जीन संपादन से क्लोन निर्माण

जीन विलीन करने की तकनीकों की मदद से पहले भी दो चुहियों से एक संतान पैदा की गई थी, लेकिन उसमें कुछ कमियां रह गई थीं। जिन्हें बाद में वैज्ञानिकों ने हैप्लॉयड एंब्रायोनिक स्टेम सेल की सहायता से प्रयोग को परिणाम तक पहुंचाया।

प्रतीकात्मक तस्वीर।

चीन में जीन एडिटिंग के जरिए दो बच्चियों को पैदा करने से पहले दो चूहों को भी पैदा किया जा चुका है। चीनी वैज्ञानिकों ने 2018 में ही वंशाणु-परिवर्धन और भ्रूणीय स्तंभ कोशिकाओं (एंब्रायोनिक स्टेम सेल) की मदद से दो चुहियों की संतान पैदा करने में कामयाबी प्राप्त कर ली है। स्टेम सेल जर्नल में प्रकाशित शोध के मुताबिक, इस तकनीक के जरिए दो सौ दस भ्रूण में से उनतीस संतानों को जन्म दिया गया। ये सभी पूरी तरह स्वस्थ और चैतन्य थे। अपनी पूरी उम्र तक जीवित रहे और इनकी संतानें भी हुर्इं। चीनी विज्ञान अकादमी के शोधकर्ताओं ने कहा है कि दो चूहों से एक संतान पैदा करने का प्रयोग भी पहले किया जा चुका है, पर यह संतान ज्यादा दिन जीवित नहीं रही।

इस शोध की विलक्षणता यह भी है कि एक ही लिंग के जीवों से संतान की उत्पत्ति में क्या चुनौतियां हैं। साथ ही स्तंभ कोशिकाओं और वंशाणु परिवर्धन तकनीक की मदद से इन चुनौतियों से कैसे पार पाया जा सकता है। अकादमी के शोधकर्ता क्वी झोऊ का इस संदर्भ में कहना है कि ‘हम इस सवाल के प्रति उत्सुक थे कि स्तनपायी जीवों में यौन संबंधों से ही संतान की उत्पत्ति क्यों होती है। अनेक अध्ययन और प्रयोगों से आखिर में हमने यह पाया कि स्तंभ कोशिका और जीन-संवर्धन की मदद से दो नर या दो मादा चूहों से संतति की उत्पत्ति संभव है। जीन विलीन करने की तकनीकों की मदद से पहले भी दो चुहियों से एक संतान पैदा की गई थी, लेकिन उसमें कुछ कमियां रह गई थीं। जिन्हें बाद में वैज्ञानिकों ने हैप्लॉयड एंब्रायोनिक स्टेम सेल की सहायता से प्रयोग को परिणाम तक पहुंचाया। हालांकि कुछ सरीसृप व उभयचर जीवों और मछलियों में केवल नर या मादा से संतान पैदा करने के प्रयोग सफल हो चुके हैं। बावजूद स्तनधारी जीवों में कृत्रिम रूप से संतान पैदा करने की यह प्रक्रिया बेहद जटिल है। वैसे भी सभी अलग-अलग खूबियों को देखते हुए, अब भी वैज्ञानिक इस बात को लेकर निश्चिंत नहीं हैं कि यह तकनीक चूहों के अलावा अन्य स्तनपायी जीवों पर कितनी फलदायी सिद्ध होती है। इससे पहले चीनी वैज्ञानिकों ने 2018 की शुरुआत में ही क्लेनिंग द्वारा दो बंदरों के निर्माण का खुलासा किया था। इस उपलब्धि से यह संभव हुआ है कि हम मनुष्य का क्लोन से निर्माण करने की दिशा में निरंतर आगे बढ़ रहे हैं।

चाइनीज इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरोसांइस के वैज्ञानिकों ने बंदर की त्वचा से ली गई स्तंभ कोशिकाओं को भ्रूण अवस्था में लाकर बंदरों को अस्तित्व में लाए हैं। स्तंभ कोशिकाएं ऐसी विलक्षण कोशिकाएं होती हैं, जो विभाजित होने के बाद शरीर की किसी भी विशिष्ट कोशिका के रूप में विकसित होने की क्षमता रखती हैं। बाईस साल पहले डॉली नामक भेड़ का उत्सर्जन इस तकनीक से किया गया था। इसके बाद से वैज्ञानिकों ने मेंढक, भेड़, कुत्ता, सुअर, बिल्ली, चूहे, खरगोश और गाय समेत बीस से अधिक जैव-प्रजातियों को क्लोन से उत्पत्ति का दावा किया है। पर इस प्रयोग से पहले मानव या मनुष्य से मेल खाने वाली जीवों का क्लोन बनाना असंभव था, क्योंकि कि]सी भी प्राणी की कायिक कोशिका (सोमोटिक सेल) के केंद्रक (न्यूक्लियस) का स्थानांतरण आसान नहीं है। दरअसल, कायिक कोशिका वह अलिंगी प्रक्रिया है, जिसे अमल में लाकर किसी की प्राणी की प्रतिकृति निर्मित करने की कल्पना की गई है। चीनी वैज्ञानिकों ने इस परिप्रेक्ष्य में प्रकारांतर से आने वाले मकैक प्रजाति के बंदरों के क्लोन तैयार करके ‘हुआ-हुआ’ और ‘झोंग-झोंग’ बंदरों को अवतरित करने का चमत्कार कर दिया। इस शोध से जुड़े वैज्ञानिकों का कहना है कि उनका मकसद एक जैसे जींस के बंदरों का निर्माण करना था, जिससे मनुष्य के लिए जरूरी दवाओं का परीक्षण किया जा सके। इस सफलता से हृदय रोग और पार्किंसन जैसे रोगों के उपचार की संभावनाएं बढ़ जाएंगी।

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