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बच्चों की बदलती दुनिया और बढ़ते खतरे

इंटरनेट आज हर बच्चे की जरूरत बन गया है। उस पर पढ़ाई-लिखाई संबंधी अनेक जानकारियां, सूचनाएं और पाठ्य सहायक सामग्री उपलब्ध हैं।

इंटरनेट से जुड़े नए अपराध भी सामने आने लगे हैं। बच्चों में दूसरे का अकाउंट हैक करना, ऑनलाइन धमकी देना और ऑनलाइन खेल की लत के चलते आक्रामक व्यवहार, मार-पीट के मामले बढ़ रहे हैं।

इंटरनेट आज हर बच्चे की जरूरत बन गया है। उस पर पढ़ाई-लिखाई संबंधी अनेक जानकारियां, सूचनाएं और पाठ्य सहायक सामग्री उपलब्ध हैं। मगर बच्चे की जरूरत के अलावा भी बहुत सारी सामग्री उस पर ऐसी उपलब्ध है, जिसके उपयोग से उसकी सेहत और पढ़ाई-लिखाई, मानसिक विकास आदि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। खासकर इंटरनेट पर गेम खेलने वाले बच्चों के व्यवहार में कई चिंताजनक परिवर्तन नजर आने लगते हैं। इंटरनेट की दुनिया और बच्चों में इसकी उपयोगिता के बारे में चर्चा कर रहे हैं संजीव राय।

पिछले एक दशक में इंटरनेट ने देश की शिक्षा, चिकित्सा, खेल, व्यापार और सामाजिक बदलाव में जोरदार हस्तक्षेप किया है। दुनिया भर की सूचनाएं अब पलक झपकते मिल जाती हैं। पर स्कूली बच्चों में इंटरनेट से जुड़ी चुनौतियां भी उभरने लगी हैं। बच्चों को इंटरनेट की उपयोगिता पता है, लेकिन उससे जुड़े खतरे और कानून की जानकारी के अभाव में, अनजाने में भी बच्चों के गंभीर अपराध में शामिल हो जाने के खतरे हैं। बच्चों को पता होना चाहिए कि जो संदेश या तस्वीर वे भेज रहे हैं, उसके लिए वही जिम्मेदार हैं। सोशल मीडिया पर जो भी सामग्री प्रेषित की जाती है, डिलीट करने के बाद भी वह किसी न किसी रूप में सार्वजानिक रूप से उपलब्ध हो सकती है। जानकारी के अभाव में बच्चे अपनी तस्वीरें और निजी जानकारी भी इंस्टाग्राम, फेसबुक आदि पर सार्वजनिक करते रहते हैं। इन तस्वीरों का दुरुपयोग किया जा सकता है।

ऑनलाइन धमकी, बच्चों से बैंक का विवरण मांगने, उपहार देने के बहाने बच्चों से मिलने की कोशिश जैसी शिकायतें आम होती जा रही हैं। अगर किसी बच्चे को ऑनलाइन धमकी मिल रही है या उसकी किसी तस्वीर को लेकर ब्लैकमेल किया जा रहा है, तो अक्सर उसे पता नहीं कि इस समस्या से कैसे निकलें? बच्चों की सुरक्षा, बाल अधिकार, साइबर कानून, भारतीय दंड संहिता और इंटरनेट के अंतरराष्ट्रीय कानून की बुनियादी बातों और ऑनलाइन खतरों से बच्चों की सुरक्षा के लिए काम कर रही संस्थाओं की जानकारी स्कूलों को अपने शिक्षकों और बच्चों को देनी चाहिए। बच्चों को अनजान व्यक्तियों से ऑनलाइन संपर्क कब और क्यों करना है, अभिभावकों को इस पर बातचीत करनी चाहिए। अभिभावक-शिक्षक-बच्चे के बीच विश्वास ऐसा होना चाहिए कि भविष्य में किसी खतरे की आशंका हो तो, बच्चे निडर होकर अपनी चिंता साझा कर सकें।

इंटरनेट और पढ़ाई

शिक्षा जगत में इंटरनेट ने कक्षा-अध्यापन से लेकर शोध तक का परंपरागत तरीका बदला है। तकनीक के प्रयोग से स्मार्ट क्लासरूम बनाए जा रहे हैं, इंटरनेट के जरिए एक देश के बच्चे दूसरे देश के बच्चों से संवाद कर रहे हैं, बच्चों की वर्चुअल (आभासी) कम्युनिटीज बनाई जा रहीं हैं, ऑनलाइन जर्नल्स और पाठ्यक्रमों की भरमार हो रही है। देश के साधन संपन्न स्कूल, तकनीकी के इस्तेमाल से अधिक से अधिक जानकारी और सुविधाएं अपने बच्चों तक पहुंचा रहे हैं। स्कूलों के बीच दसवीं-बारहवीं की बोर्ड परीक्षा में, एक-दूसरे से बेहतर परिणाम लाने की होड़ है और इस प्रतिस्पर्धा की आंच स्कूल के बच्चे और शिक्षकों पर पड़ रही है। सर्वश्रेष्ठ परिणाम हासिल करने में तकनीक मदद कर रही है। कई निजी कंपनियां बच्चों को पाठ्यक्रम के अनुसार ऑनलाइन वीडियो सामग्री बेच रही हैं और उनका बाजार लगातार बढ़ता जा रहा है।

महानगरों में तकनीकी सुविधा से अब होमवर्क, हाजिरी से लेकर परीक्षा परिणाम तक संचालित हो रहा है। अनेक तरह की अंतर-स्कूल प्रतियोगिताएं, बच्चों के सीखने के स्तर का मूल्यांकन और ओलंपियाड का आयोजन ऑनलाइन किया जा रहा है। सुविधा संपन्न स्कूलों में प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी और स्कूल प्रोजेक्ट की तैयारी के लिए इंटरनेट आवश्यक है। स्कूल से घर आने के बाद भी बच्चों को अपना कार्य पूरा करने के लिए इंटरनेट की जरूरत रहती है। बहुतायत में माता-पिता नहीं चाहते कि उनके किशोर और कम उम्र के बच्चे मोबाइल का अत्यधिक इस्तेमाल करें, लेकिन स्कूल के काम और निर्देश मोबाइल पर आते हैं और ऐसे में अभिभावक बेबस हो जाते हैं।

खेल का माध्यम

मोबाइल ने पढ़ाई, सामाजिक संबंधों के साथ खेल की प्रकृति भी बदल दी है। मोबाइल और इंटरनेट की उपलब्धता ने बच्चों को घर में ही बैठ कर खेलने का आसान विकल्प दे दिया है। बच्चों को टच स्क्रीन वाले फोन से खेलों के अनेक विकल्प मिल गए हैं। बच्चे खेल के मैदान की बजाय गेम पार्लर जाने लगे हैं। अकेला बच्चा भी मोबाइल पर अपनी एक टीम ले कर हाथ की उंगलियों से फुटबाल खेलता है! इंस्टाग्राम, फेसबुक, ट्विटर पर वह दोस्त बना रहा है, अपनी भावनाओं को बेहतर और विविध प्रकार से प्रगट कर रहा है। अब ऑनलाइन गेम के अलग-अलग तरीके ईजाद हो रहे हैं, पब्जी जैसे गेम बच्चे अलग-अलग स्थान पर बैठ कर इंटरनेट की मदद से, एक-दूसरे के साथ खेलते हैं। कई खेल, बच्चों में हिंसा और आक्रामकता को बढ़ा रहे हैं। कथित रूप से दिल्ली के मेहरौली में पबजी खेलने और दूसरे नशे के चलते बारहवीं के एक बच्चे ने अपने माता-पिता और बहन की हत्या कर दी। ब्लू वेल जैसे ऑनलाइन खेल के चलते कई बच्चे अपनी जान तक गवां बैठे हैं। गांव-शहर हर जगह, मोबाइल का असर ऐसा है कि दो-तीन साल के बच्चे भी, बिना मोबाइल लिए, खाना नहीं खा रहे हैं। बच्चे को मनाने और खिलाने का यह एक आसान रास्ता, बाद में भारी मुश्किल पैदा कर सकता है।

सेहत पर असर

आज भी बहुत कम अभिभावकों को यह पता है कि मोबाइल और इंटेरनेट का अतिशय उपयोग एक चिंताजनक संकेत है! बच्चे का मोबाइल के साथ बिताया हुआ समय जैसे- जैसे बढ़ता जाएगा, बच्चों की नींद, एकाग्रता कम होती जाएगी। ऐसा कहा जा रहा है कि टच स्क्रीन वाले फोन को अगर बच्चे एक घंटा गेम के लिए इस्तेमाल करते हैं तो उनकी नींद सोलह मिनट कम हो सकती है। बारह से बीस साल की उम्र के बीच के बच्चे और युवक ऑनलाइन व्यसन के ज्यादा शिकार हो रहे हैं। जो बच्चे इंटरनेट गेम के आदी हो रहे हैं, धीरे-धीरे अपनी पढ़ाई और सामाजिक हकीकत से दूर होकर आभासी दुनिया में चले जाते हैं। इंटरनेट की बढ़ती आदत बच्चों को एकाकीपन की ओर ले जाती है और एक समय के बाद वे अवसाद (डिप्रेशन) से घिर जाते हैं। खेल के लिए इंटरनेट के अधिक इस्तेमाल से बच्चों के व्यवहार में उग्रता, भाषा में आक्रामकता, घर के खाने में अरुचि, अनिद्रा जैसे लक्षण देखे जा सकते हैं।

आज के समय में हम बच्चों को इंटरनेट और मोबाइल से अलग नहीं कर सकते, क्योंकि बहुत-सी जानकारियां होमवर्क और एक-दूसरे से संपर्क में रहने की जरूरत मोबाइल को अनिवार्य बनाती है। लेकिन अभिभवकों को उन्हें जागरूक करने की जरूरत है और समयबद्ध तरीके से इंटरनेट के इस्तेमाल को सुनिश्चित करना है। स्कूल के शिक्षकों और कॉउंसिलरों के लिए भी बच्चों का इंटरनेट का अतिशय प्रयोग एक नई चुनौती बन रहा है। बच्चों में इंटरनेट के दुरुपयोग के बढ़ते खतरे की गंभीरता को देखते हुए, अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, दिल्ली के मानसिक रोग विभाग में अब इंटरनेट व्यसन के रोगियों के लिए एक चिकित्सा केंद्र खोला गया है, जिसमें ऐसे मनोरोगियों को परामर्श के लिए बुलाया जाता है, जो ऑनलाइन गेम के लिए घंटों इंटरनेट का उपयोग करते हैं। यह केंद्र रोगियों का इलाज तो करता ही है, स्कूलों-अभिभावकों में जागरूकता फैलाने का भी काम करता है।

इंटरनेट से जुड़े नए अपराध भी सामने आने लगे हैं। बच्चों में दूसरे का अकाउंट हैक करना, ऑनलाइन धमकी देना और ऑनलाइन खेल की लत के चलते आक्रामक व्यवहार, मार-पीट के मामले बढ़ रहे हैं। इंटरनेट और सोशल मीडिया से संबंधित कानून में सुधार और उनके बारे में व्यापक जागरूकता की जरूरत है। नेशनल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स और एनसीईआरटी जैसी संस्थाओं ने माता-पिता, स्कूल के कर्मचारियों और बच्चों की सुरक्षा और इंटरनेट के प्रति जागरूकता के लिए सामग्री तैयार की है। इंटरनेट और सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते समय बच्चों को पता होना चाहिए कि क्या करें और क्या न करें! आज इंटरनेट एक अनिवार्यता है, लेकिन जागरूक बच्चे ही तकनीकी का बेहतर इस्तेमाल कर सकते हैं। हम जिस तकनीक का रोज इस्तेमाल कर रहे हैं, उसके संभावित खतरे से तो हमें सजग रहना ही होगा!

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