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कुप्रथा की जकड़बंदी 

बाल विवाह निषेध अधिनियम 2006 में बाल विवाह को दंडात्मक अपराध माना गया है।

Author नई दिल्ली | April 24, 2016 4:32 AM
इस तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक है।

आखातीज या अक्षय तृतीया को अबूझ सावे के रूप में जाना और पहचाना जाता है। इस दिन बड़ी संख्या में विवाह होते हैं जिनमें बाल विवाह भी शामिल है। बाल विवाह का मतलब छोटी आयु में शादी। यानी इक्कीस वर्ष से कम आयु के लड़के और अठारह वर्ष से कम आयु की लड़की का विवाह होना, बाल विवाह माना जाएगा। भारत में बाल विवाह की प्रथा काफी पुरानी थी। लाख कोशिशों के बाद भी अपने देश से यह कुप्रथा पूरी तरह समाप्त नहीं हो पाई। सभ्य समाज के मुंह पर यह एक तमाचा है। यह मानव जीवन की सबसे बड़ी और दुखद त्रासदी है। यह सामाजिक बुराई हिंदी भाषी और अहिंदी भाषी दोनों तरह के राज्यों में समान रूप से प्रचलित है। विशेषकर राजस्थान, हरियाणा, उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश और पश्चिम बंगाल में बाल विवाह का चलन आज भी है।

छोटी आयु में विवाह का मुख्य कारण अशिक्षा और गरीबी है। अभिभावक गरीबी के कारण अपनी बेटी का जल्दी विवाह कर एक सामाजिक दायित्व से निवृत्त होना चाहते हैं। नासमझी और अशिक्षित होने के कारण उन्हें यह ज्ञान नहीं रहता कि वे अपनी बेटी को एक अंधे कुएं की ओर धकेल रहे हैं जिसमें से वह ताउम्र नहीं निकल पाएगी। छोटी आयु में विवाह के कारण लड़की को गंभीर परिणामों का सामना करना पड़ता है। खेलने-कूदने के दिनों में वह घर-गृहस्थी की समस्याओं से जूझती रहती है। इसके अलावा, उसे घरेलू हिंसा का सामना भी करना पड़ता है। शारीरिक रूप से अपरिपक्वता के साथ-साथ उसे शिक्षा से भी वंचित होना पड़ता है।

बाल विवाह को सख्ती से रोकने के लिए अनेक स्तरों पर प्रयास किए गए। यह सदियों पुरानी कुप्रथा है जिसे जाने अनजाने हम आज भी ढोते चले आ रहे हैं। 1928-29 में शारदा एक्ट बना जिसमें नाबालिग बच्चों के विवाह को निषिद्ध किया गया। भारत सरकार ने इस कानून की पालना के लिए लड़के की आयु इक्कीस वर्ष और लड़की की आयु अठारह वर्ष निर्धारित की थी। इससे कम आयु के बच्चों का विवाह कानूनी रूप से निषिद्ध और दंडनीय अपराध स्वीकारा गया।

बाल विवाह निषेध अधिनियम 2006 में बाल विवाह को दंडात्मक अपराध माना गया है। एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के चालीस प्रतिशत बाल विवाह भारत में होते हैं। इनमें उनचास प्रतिशत लड़कियों के विवाह अठारह वर्ष से कम आयु में हो जाते हैं। लिंग भेद और अशिक्षा को इसका सबसे बड़ा कारण माना गया है। यूनिसेफ के अनुसार राजस्थान में बयासी प्रतिशत लड़कियों का विवाह 18 साल से पहले हो जाता है। 1978 में संसद द्वारा बाल विवाह निवारण कानून पारित किया गया था। इसमें विवाह की आयु निर्धारित की गई थी। यूनिसेफ की बच्चों संबंधी एक और रिपोर्ट में बताया गया है 47 प्रतिशत महिलाएं कानूनी रूप से 18 वर्ष से कम आयु में व्याही गर्इं। इनमें 56 प्रतिशत महिलाएं ग्रामीण क्षेत्रों की थीं।

बाल विवाह आज भी ज्वलंत समस्या के रूप में हमारे सामने है। यह अनादिकाल से चली आ रही है। सामाजिक मान्यता मिलने के कारण इसे बढ़ावा मिलता रहा है। इसी कारण इस कुप्रथा ने विकराल रूप धारण कर लिया। अशिक्षा और अज्ञानती का वजह से कुछ लोग इस कुप्रथा को अब भी ढोए जा रहे हैं। बाल विवाह को बच्चों के अधिकारों का उल्लंघन भी माना गया है। जब तक बच्चे बालिग या समझदार न हो जाएं और अपने भले-बुरे की पहचान के योग्य न हो जाएं, तब तक विवाह किसी भी स्थिति में नहीं किया जाना चाहिये। यह भी वैज्ञानिक परिणामों से स्पष्ट है कि बाल विवाह से अच्छे स्वास्थ्य, पोषण, शिक्षा का अधिकार, खेलने-कूदने के अवसर हासिल नहीं होते। कच्ची उम्र में शादी होने से स्वास्थ्य और जननांगों पर खराब असर पड़ता है जिसे बच्चों को ताउम्र झेलना पड़ता है।

छोटी उम्र में विवाह से लड़कियों को लड़कों की अपेक्षा अधिक हानि उठानी पड़ती है। असुरक्षित यौन संबंधों से उनके स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। फलस्वरूप अनेक भीषण बीमारियों से ग्रस्त होना आम बात है। बाल विवाह के कारण बार-बार गर्भधारण और असमय गर्भपात का सामना करना पड़ता है। नवजात शिशु के भी अकाल मौत का शिकार होने का अंदेशा बना रहता है। कुपोषण और खून की कमी से मां और बच्चे के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

बाल विवाह के समर्थक इसके पक्ष में अनेक कुतर्कों का सहारा लेकर समाज को गुमराह करने का प्रयास करते हैं। अनेक अभिभावक यह मानते हैं कि जल्दी विवाह से लड़कियों को यौन हिंसा से बचाया जा सकता है। सामाजिक चेतना के अभाव और कानून की शिथिलता के कारण निश्चय ही बाल विवाह की सामाजिक कुरीति को बढ़ावा मिलता है। बाल विवाह को रोकने के लिए समाज में जनचेतना के प्रयास आवश्यक हैं। पिछले कुछ दशकों से इस दिशा में किए गए प्रयासों का असर देखने को मिला है। शिक्षित समाज ने इस सामाजिक बुराई को समझा है। मगर ग्रामीण तबका आज भी बाल विवाह का पक्षधर है। इस तबके को समझाने के लिए सभी संभव प्रयास करने होंगे। इसके लिए बुजुर्गों का सहयोग जरूरी है। आखातीज पर बड़े स्तर पर बाल विवाह होते हैं जिन्हें रोकने के लिए सामाजिक चेतना और सामूहिक सहभागिता जरूरी है।

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