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खोज : मथुरा में शिवाजी रहे थे!

शिवाजी अपने बेटे संभाजी (नौ साल) के साथ 12 मई, 1666 को औरंगजेब से मिलने आगरा आए थे। दरबार में उनका अपमान हुआ तो वे नाराज हो गए। औरंगजेब ने उन्हें नजरबंद कर लिया।

नई दिल्ली | Updated: February 7, 2016 12:34 AM
आरके चतुर्वेदी का कहना है कि छत्रपति शिवाजी मथुरा में सैंतालीस दिन रहे थे। (फाइल फोटो)

क्या इतिहास नायक शिवाजी ने मथुरा में प्रवास किया था? यह दावा किया है मथुरा की साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था ‘जन सांस्कृतिक मंच’ के अध्यक्ष आरके चतुर्वेदी ने। उनकी खोज में कुछ ऐसी बातें और तथ्य सामने आए हैं। उनका कहना है कि छत्रपति शिवाजी मथुरा में सैंतालीस दिन रहे थे। हालांकि, इतिहासकार और इतिहास के छात्र इस जानकारी से एकदम चौंक उठेंगे, क्योंकि किसी भी पुस्तक में शिवाजी के मथुरा के इतने लंबे प्रवास का उल्लेख ही नहीं है। किताबों में सिर्फ इतना लिखा हैं कि सन् 1666 में शिवाजी अपने बेटे संभाजी के संग आगरा में औरंगजेब की कैद से भेष बदल कर भागे तो मथुरा होकर महाराष्ट्र पहुंचे।

चतुर्वेदी का मानना है कि शिवाजी को आगरा से भगाकर लाने वाले विश्वस्त लोगों में एक व्यक्ति मथुरा का चतुर्वेदी था। इसी व्यक्ति की देखरेख में शिवाजी मथुरा में सैंतालीस दिन रहे। समझा जाता है कि शिवाजी मथुरा के चौबिया पांडे की हाथी वाली गली के मकान में रहे। शिवाजी को पनाह देने वाले चौबेजी के वंशज महाराष्ट्र के जलगांव शहर में आज भी रहते हैं।

आरके चतुर्वेदी बताते हैं, ‘हमारा इतिहास ऐसी रोमांचक घटनाओं से भरा पड़ा है, जिनको सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। इतिहासकारों को अनेक महत्त्वपूर्ण बातें मालूम ही नहीं पड़ीं। सो उन्होंने लिखने से कन्नी काट ली। ऐसी ही एक मजेदार घटना साढ़े तीन सौ साल पहले की है। उन्होंने दावा किया कि उनकी संस्था इतिहास की अनछुई घटनाओं, जगहों को खंगालने के काम में जुटी है।

चतुर्वेदी के मुताबिक कोल्हापुर के एक इतिहास प्रेमी इंद्रजीत सावंत ने शिवाजी के सैंतालीस दिन के मथुरा प्रवास के प्रमाण जुटाने में कामयाबी हासिल कर ली है। पिछले दिनों सावंत के मन में शिवाजी के मथुरा प्रवास की प्रामाणिकता खोजने की सनक सवार हुई। उसने कोल्हापुर के पुरातत्त्व संरक्षण विभाग में रखे रिकार्ड को खंगाला। यहां शिवाजी के हाथ की लिखी चिट्ठियां हैं।वहां शिवाजी की 252 चिट्ठियां उपलब्ध हैं। सावंत को इस खजाने में शिवाजी की एक चिट्ठी मिली जो मथुरा से 3 अक्तूबर, 1666 को लिखी गई थी। इस चिट्ठी में ऐसी अनेक बातें हैं, जिनसे शिवाजी के लंबे मथुरा प्रवास पर मुहर लग जाती है।

दरअसल, शिवाजी अपने बेटे संभाजी (नौ साल) के साथ 12 मई, 1666 को औरंगजेब से मिलने आगरा आए थे। दरबार में उनका अपमान हुआ तो वे नाराज हो गए। औरंगजेब ने उन्हें नजरबंद कर लिया। बाद में फलों की टोकरी में बेटे को छुपाकर और खुद भेष बदलकर 17 अगस्त 1666 को वहां से भाग निकले। सड़क के रास्ते मथुरा आए। यहां दाढ़ी-मूंछ मुड़वाकर साधु वेश धरा और मुगलिया फौजों की आंखों में धूल झोंकते रहे।

चतुर्वेदी का दावा है कि इतिहास में इतना इजाफा तो हो ही गया कि शिवाजी मथुरा में सैंतालीस दिन रहे। अब इतना खोजना बाकी है कि वे चौबिया पांडे के कौन से मकान में रहे, क्या शिवाजी मथुरा-वृंदावन आकाशवाणी के पास गणेश टीले पर स्थित मंदिर में भी रहे? वर्तमान मंडी रामदास का नाम शिवाजी के गुरु रामदास पर ही रखा गया है? (अशोक बंसल)

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