रविवारी: कमाल का चंबा रुमाल

पहाड़ी लघु चित्र और भित्ति चित्रों को अगर कपड़े पर सूई के माध्यम से बहुत ही बारीकी से कढ़ाई करके उकेरा जाए तो वह कपड़ा किसी कलात्मक तस्वीर से कम नहीं लगता है। वैसे तो हिमाचल प्रदेश में कला की कई तकनीक हैं जो यहां की समृद्ध शैली की परिचायक हैं। लेकिन चंबा रुमाल ने इस प्रदेश को विश्व भर में एक अलग ही पहचान दिलाई है। चंबा रुमाल लोकप्रिय कशीदाकारी हस्तकला है, जिसे ‘नीडल पेंटिंग’ के नाम से भी जाना जाता है। चंबा रुमाल रेशम एवं सूती कपड़े पर दोनों ओर समान कढ़ाई कर तैयार किया जाता है। कढ़ाई का काम औरतें करती हैं और यह कला आमतौर पर रुमाल, टोपी, हाथ के पंखे, चोली आदि पर की जाती है। चूंकि इससे बना रुमाल चौकोर नहीं होता, इसलिए इसे कभी वॉल पेंटिंग की तरह सजाया जाता है तो कभी उपहार में दिया जाता है। सूई से होने वाली यह कढ़ाई चंबा की शाान बन गई है। चंबा रुमाल के इतिहास और विरासत के बारे में बता रही हैं सुमन बाजपेयी ।

जनसत्ता रविवारी विशेष चंबा का रुमाल।

अनूठी हस्तकला के लिए विश्वविख्यात चंबा रुमाल किसी पहचान की मोहताज नहीं है। इस कढ़ाई को चंबा साम्राज्य के पूर्व शासकों के संरक्षण में पनपने का मौका मिला था। यह अपनी अद्भुत कला और शानदार कशीदाकारी के कारण निरंतर प्रसिद्धि की नई इबारत लिखता रहा है। चंबा का रुमाल वास्तव में कोई जेब में रखने वाला रुमाल नहीं है, बल्कि कढ़ाईदार वॉल पेटिंग होती है। चंबा के रुमाल के बारे में एक रोचक बात यह है कि दूर से देखने पर बेशक ये बहुत सजीव व आकर्षक न लगे पर जब पास से देखते हैं तो देखने वाले को अपनी आंखों पर विश्वास नहीं होता है। इसलिए इसे सूई का कमाल भी कहा जाता है।

सोलहवीं शताब्दी की कला
चंबा रुमाल को यह नाम हिमाचल प्रदेश के हिल स्टेशन चंबा से मिला है, जहां सदियों से इसका काम हो रहा है। इसका सबसे पहला वर्णन सोलहवीं शताब्दी में आता है, जिसमें वर्णित है की बेबे नानकी जो की गुरु नानक देव जी की बहन थीं, उन्होंने इसे बनाया था और वह रुमाल आज भी होशियारपुर के एक गुरुद्वारे में धरोहर के रूप में रखा हुआ है। 17वीं सदी में राजा पृथ्वी सिंह ने चम्बा रुमाल की कला को बहुत अधिक संवारा और रुमाल पर ‘दो रुखा टांका’ कला शुरू की। उनके समय में चंबा रियासत में आम लोगों के साथ-साथ शाही परिवार भी चंबा रुमाल की कढ़ाई करता था।

18वीं शताब्दी में चंबा रुमाल की लोकप्रियता बहुत दूर-दूर तक फैली हुई थी। बहुत से कारीगर इस कला से जुड़े हुए थे। उस समय के राजा उमेद सिंह ने इस कला और कारीगरों को संरक्षण देकर चंबा रुमाल को विदेशों तक पहुंचाया। लंदन के विक्टोरिया अल्बर्ट म्यूजियम में रखा गया चंबा का रुमाल इसके महान इतिहास के दर्शन करवाता है जिसे चंबा के राजा गोपाल सिंह ने 1883 में ब्रिटिश सरकार के नुमाइंदों को भेंट किया था जिसमें कुरुक्षेत्र युद्ध की कृतियों को उकेरा गया है। 1911 में चंबा के राजा भूरी सिंह ने भी इस हुनर को बहुत सम्मान दिया और कला को उन्नत बनाने में मदद की। दिल्ली दरबार में उन्होंने ब्रिटेन के राजा को चंबा के रुमाल की कलाकृतियां तोहफे में दी थीं। चूंकि भारत में मुगलों का साम्राज्य था तो इस कढ़ाई के कार्य की विषय वस्तु मुगलों से प्रभावित थी परंतु मुगलों के पतन के साथ ही बहुत से कारीगर हिमाचल के पर्वतीय क्षेत्रों में जाकर बस गए जिनकी सहायता चंबा के राजा उमेद सिंह ने की।

कढ़ाई को जीवंत बनाते नए प्रयोग
चंबा में रहने वाली ललिता वकील जिनकी चार पीढ़ियां इसी काम को करने और उन्नत बनाने में जुटी हैं, का कहना है कि रुमाल पर हाथ की कढ़ाई दोनों ओर से की जाती है। एक जमाने में जब शाही परिवारों में बेटी की शादी होती थी तो शगुन के थाल को इस रुमाल से ढका जाता था। उस समय इनमें लोककला ज्यादा झलकती थी, धीरे-धीरे हमने इनमें आकृतियां और फूल-पत्तियां बनानी शुरू कीं ताकि कढ़ाई अधिक जीवंत लगे। रेशम के धागे से सूती कपड़े पर कढ़ाई होती थी, पर अब शॉल, दुप्पटों और सिल्क फैब्रिक पर भी हम ये काम कर रहे हैं। इसके डबल साटन स्टिच (दो रुख टांका) का प्रयोग किया जाता है, जिसकी वजह से कपड़े के दोनों तरफ कढ़ाई उभर आती है जो एक समान लगती है। इसके धागे को पट्टू कहा जाता है।

लोकशैली की झलक
चंबा रुमाल मुख्यता वर्गाकार या आयताकार बनाए जाते हैं। हालांकि अभी भी दो तरह से कढ़ाई चंबा रुमाल पर हो रही है। एक में लोकशैली झलकती है, जिसके विषय सीमित हैं, रंग चटकीले और टांकों में समानता नहीं है। जबकि दूसरी शैली में एक संतुलित संयोजन है, जिसमें हलके व सौम्य रंग के धागों का इस्तेमाल किया जाता है दो रुख टांके से जिसमें एक टांका लंबा तो दूसरा छोटा होता है, जब कढ़ाई की जाती है तो कपड़े के उलटी तरफ भी समान कढ़ाई बन जाती है। चंबा रुमाल बनाने के लिए कलाकार पहले किसी भी पौराणिक दृश्य या घटना को चित्रित करता है, उसके पश्चात पेंसिल या चारकोल की सहायता से रूपरेखा तैयार करता है। इसके बाद ब्रश द्वारा वांछित रंग, जो बहुत नाम मात्र का होता है, भरता है और इस सब के बाद सिल्क के रंग-बिरंगे धागों को सुई में पिरो कर दोहरे टांके की कढ़ाई करते हुए एक अविस्मरणीय कृति का निर्माण करता है। चंबा रुमाल पर ड्राइंग कभी भी ट्रेस करके नहीं बनाई जाती है, वरन इतनी फुर्ती से की जाती है कि लाइन टूटे न।

कुछ ऐसी होती है कढ़ाई
एक प्रशिक्षित कलाकार थीम को देखकर खादी के कपड़े पर चारकोल से एक रूपरेखा तैयार करता है। कढ़ाई के लिए रंगों का चुनाव पहले ही तय कर लेता है, फिर महिला शिल्पकार कढ़ाई के लिए रेशम के धागे के दो तारों का उपयोग करती है और बिना गांठ लगाए डबल-साटन स्टिच करती है रुमाल पर मुख्य मोटिफों की कढ़ाई करने के बाद, फिर बैक स्टीचिंग की जाती है जिसके द्वारा मोटिफ की आउटलाइन बनाई जाती है। अंत में, वे रुमाल के किनारों को एक समान करने के लिए तुरपाई करती हैं। इसकी आउटलाइन काले धागे से बनाई जाती है, जो चंबा रुमाल की एक खास विशेषता है। चंबा रुमाल को तैयार करने में दस दिन से दो महीने का समय लगता है।

प्रचलित कहानियों को उकेरने का चलन
पहाड़ी चित्रकला का प्रभाव इन रुमालों पर बहुत गहराई से देखने को मिलता है। साथ ही गुलेर, कांगड़ा, बसोहाली, जम्मू, नूरपुर और मंडी क्षेत्रों के चित्रों व भित्ति चित्रों की झलक भी दिखती है। इन रुमालों पर पहाड़ी चित्रकला के समान ही प्रचलित कहानियों, परंपराओं व पौराणिक विषयों के दृश्यों को भी उकेरा जाता है। साथ ही कृष्ण, रामायण, महाभारत और पुराण के कहानियों, नायक-नायिकाओं के प्यार के किस्सों व राग-रागिनी जैसे विषय भी इनके आधार हैं। दिलचस्प बात है कि हर रुमाल में एक अलग कहानी चित्रित की जाती है, जिसके कारण इस कला में अत्यधिक विविधता देखने को मिलती है। आकार में बड़े होने के कारण ये रुमाल दीवारों पर वॉल पेंटिंग की तरह सजाए जाते हैं और कपड़े की पूरी सतह पर ही कढ़ाई किए जाने के कारण ये अत्यंत सजीव लगते हैं। ०

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