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पुरुष वर्चस्व को चुनौती

कई जगह कुछ मंदिरों और मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश की मनाही थी। वहां प्रवेश पाने के लिए महिलाओं ने आंदोलन चलाया, इस पर अदालत ने भी हस्तक्षेप किया, तब उन्हें इसकी इजाजत मिल सकी। पर अब भी समाज का एक बड़ा तबका ऐसा है, जो मानता है कि मंदिरों और मस्जिदों में महिलाओं को पुरुषों के साथ पूजा और नमाज की इजाजत नहीं होनी चाहिए। इसी के मद्देनजर अदालत में याचिका दायर की गई है कि हर मंदिर-मस्जिद में महिलाओं को अपनी इच्छा से पूजा-पाठ करने, नमाज पढ़ने की आजादी मिलनी चाहिए। मस्जिदों में बहुत पहले से महिलाओं के नमाज पढ़ने की रिवायत रही है, कई जगह महिलाएं मौलवी भी रही हैं, पर बदलते समय के अनुसार वह रिवायत खत्म-सी होती गई। इसका विश्लेषण कर रही हैं नाज खान।

Author April 21, 2019 3:14 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

बात चाहे महिलाओं के सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक अधिकारों की ही क्यों न हो, जब-जब इन पर पुरुष वर्चस्व हावी हुआ है, उनके हक को चुनौती मिली है। यह शुरुआत से ही होता आया है। फिर चाहे मुसलिम महिलाओं को इस्लाम में दिया गया संपत्ति का अधिकार हो, विवाह में रजामंदी का अधिकार हो या फिर अब मस्जिदों में नमाज पढ़ने का अधिकार। हालांकि आज महिलाएं अपने अधिकारों को लेकर पहले से अधिक जागरूक हैं और इनके लिए आवाज उठा रही हैं। ऐसा ही एक अधिकार है महिलाओं के मस्जिद में प्रवेश का। इसी को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका दाखिल हुई है, इसमें महिलाओं को मस्जिद में प्रवेश देने की मांग की गई है। हालांकि यह पहली बार नहीं है। इससे पहले भी महिलाओं के अधिकार और लैंगिक बराबरी को लेकर लंबे समय से आवाज उठाते रहे प्रगतिशील मुसलिम फोरम एनआइएसए ने न केवल मस्जिद में महिलाओं के प्रवेश की अनुमति मांगी थी, बल्कि महिलाओं को इमाम नियुक्त किए जाने के अधिकार भी मांग की थी। मगर यहां बात उन अधिकारों की है, जो इस्लाम से तो महिलाओं को मिले हैं, लेकिन पुरुष वर्चस्व के आगे उन्हें नकार दिया गया है। मस्जिद में प्रवेश का मामला भी ऐसा ही है।

पैगंबरे-इस्लाम के समय में महिलाओं को भी पुरुषों की तरह मस्जिदों में नमाज अदा करने की अनुमति थी। हालांकि कुछ खामियां शुरुआत से ही आनी शुरू हो गई थीं, लेकिन इन्हीं का हवाला देकर महिलाओं के मस्जिद में नमाज पढ़ने पर रोक लगा दी गई। समय के साथ इसका प्रभाव महिलाओं की मानसिक मनोदशा पर पड़ा और उन्होंने घर पर ही रह कर नमाज पढ़ना स्वीकार कर लिया। इसका नतीजा यह हुआ कि महिलाओं के मस्जिदों में प्रवेश पर ही रोक लगा दी गई। इसके लिए कोई लिखित नियम-कायदे तो नहीं बनाए गए, लेकिन मस्जिदों में महिलाअ‍ों के लिए वजू, टॉयलेट और अलग जगह जैसी जो जरूरतें थीं, उन्हें जरूर पूरा नहीं किया गया और आज अगर महिलाएं मस्जिद में नमाज पढ़ना भी चाहें तो उन्हें वह सहूलियतें नहीं मिलतीं, जो उनका अधिकार है। दरअसल, अधिकतर मस्जिदों का संचालन पुरुषों के हाथ में है। मस्जिद में एक मुअज्जिन यानी अजान देने वाला होता है और एक इमाम जो नमाज पढ़ाता है। ये दोनों पुरुष ही हैं। ऐसे में महिला अधिकारों की बात रखने वाले की कमी बनी रही है। हालांकि समय-समय पर पुरुष वर्चस्व को महिलाओं ने चुनौती भी दी है। ज्यादा दिन नहीं गुजरे जब केरल में कुरान सुन्नत सोयायटी की महासचिव जामिदा ने इमाम की भूमिका अदा कर अपने पीछे महिला, पुरुषों को नमाज पढ़वाई थी, तो महिला काजी बन कर हकीमा खातून निकाह भी पढ़वा चुकी हैं।

जनाना इबादतखाने
भारत के अलावा कई मुसलिम देश या मुसलिम बहुल देश जैसे ईरान, तुर्की, मलेशिया, अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन में पुरुषों के साथ महिलाएं भी मस्जिदों में नमाज पढ़ती हैं और वहां मस्जिदों में महिलाओं के नमाज पढ़ने को लेकर किसी तरह की कोई पाबंदी नहीं है। जहां तक भारत में महिलाओं के मस्जिदों में प्रवेश का सवाल है तो यहां भी बीसवीं शताब्दी तक महिलाओं के लिए मस्जिदें बनवाई जाती थीं या उस समय की मस्जिदों में महिलाओं के लिए पूरे प्रबंध के साथ एक खास जगह रहती थी, ताकि महिलाएं मस्जिदों में नमाज पढ़ सकें। बीजापुर, भोपाल, जौनपुर, हुगली और बड़ोदरा समेत कई शहरों में आज भी ऐसी मस्जिदें हैं, जिनका निर्माण चौदहवीं सदी से बीसवीं सदी तक होता रहा है और इनमें महिलाओं के इबादत करने के लिए जनाना इबादतखाने बनाए गए थे। यह बात अलग है कि उचित प्रोत्साहन न मिल पाने के कारण आज इन इबादतखानों में महिलाएं कम ही नजर आती हैं और जहां महिलाएं इबादत करती भी हैं वहां पुरुषों के मुकाबले उनको सहूलियतें कम मुहैया हैं। दिल्ली की जामा मस्जिद में आज भी महिला, पुरुष दोनों ही नमाज अदा करते दिख जाएंगे, मगर जहां तक सवाल सहूलियतों का है, तो वे महिलाओं के मामले में न के बराबर ही हैं।

कुछ विद्वानों का कहना है कि धार्मिक किताबों में दरगाह के उस स्थान तक महिलाओं के जाने पर पाबंदी की बात कही गई है, जहां संबंधित दरवेश की कब्र हो, मगर धार्मिक आधार पर महिलाओं के मस्जिद में प्रवेश पर कोई पाबंदी नहीं है और सैद्धांतिक तौर पर इस्लाम मस्जिद में महिलाआें को इबादत करने से नहीं रोकता। कर्नाटक के बीजापुर की मक्का मस्जिद शहर के पुराने इलाके में स्थित है। इस मस्जिद की खूबी यह है कि इसमें मिंबर नहीं है। मस्जिद में मिंबर एक ऊंचा स्थान होता है जहां इमाम खड़े होकर धर्मोपदेश दिए जाते हैं। कहा जाता है कि इस मस्जिद में मिंबर का न होना इसे महिलाओं की मस्जिद बनाता है। बीजापुर की अंडा मस्जिद भी महिलाओं के लिए ही बनाई गई थी। इसे 1608 में इब्राहिम आदिल शाह-2 के शासन काल में उनके सिपहसालार एतबार खान ने बनवाया था। इसमें भी मिंबर नहीं है। इसका मतलब यह है कि यह भी महिलाओं के लिए ही बनाई गई थी। हालांकि अब इसमें महिलाओं के प्रवेश पर एक तरह से पाबंदी लग चुकी है और फिलहाल इसमें मदरसा संचालित होता है।

महिलाओं के लिए मस्जिदें
इतिहास बताता है कि महिलाओं के लिए मस्जिदें भले ही कम बनाई गई हैं, लेकिन इससे यह जरूर पता चलता है कि उनके लिए मस्जिदें हुआ करती थीं या फिर उन मस्जिदों में उनमें उनके लिए जनाना इबादतखाना के तौर पर अलग से सहूलियतें जरूर हुआ करती थीं। दिल्ली की कुव्वतउल इस्लाम मस्जिद और भोपाल की ताजुल मसाजिद में अलग जनाना इबादतखाना इस बात का उदाहरण है। बीजापुर की अंडा मस्जिद और जौनपुर की अटाला मस्जिद में महिलाओं के इबादत करने के लिए एक खास जगह सुरक्षित थी। इससे साफ जाहिर है कि बीसवीं शताब्दी तक भारत में कुछ बड़ी मस्जिदों में महिलाओं के लिए मस्जिदों में जनाना इबादतखाना बनाने की व्यवस्था थी। वड़ोदरा की चंपानेर मस्जिद, पश्चिम बंगाल के पंडुआ में बनी अदीना मस्जिद और भोपाल की ताजुल मसाजिद अपने जनाना इबादखानों के लिए प्रसिद्ध रही हैं।

ये मस्जिदें इस बात का उदाहरण हैं कि मस्जिदों में न सिर्फ महिलाओं को प्रवेश की अनुमति थी, बल्कि उन्हें प्रोत्साहित करने के लिए मस्जिदों में जनाना इबादतखाना बनाने की परंपरा भी रही है। इसी परंपरा की एक मस्जिद अमरोहा में है। यह जनाना मस्जिद के नाम से जानी जाती है। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय में भले ही मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश को लेकर याचिका दाखिल की गई हो, मगर देखा जाए तो यह मुद्दा मजहबी न होकर पुरुष वर्चस्व का अधिक नजर आता है। मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड की सदस्य डॉ. असमा जहरा कहती हैं, हमारे यहां पाबंदी है ही नहीं, तो सर्वोच्च न्यायालय में इस मुद्दे को उठाने का क्या मतलब। यह व्यवस्था से जुड़ा मामला है। दरअसल, मस्जिदों में या तो समय तय हो कि इस समय पुरुष आएं, कितने समय महिलाएं आएं, क्योंकि भीड़ अधिक होगी तो भीड़ में धक्का-मुक्की होने, अव्यवस्था फैलने की आशंका रहती है। ऐसे में मंशा महिलाओं को जानबूझ कर रोकने की नहीं है और यह इस्लाम की अवधारणा भी नहीं है। हम लोकतांत्रिक देश में रहते हैं और यहां हमें रोका तो नहीं जा रहा। हां, यहां कहीं महिलाओं के लिए इंतजाम है नहीं है। अगर कहीं महिलाओं में मस्जिदों में नमाज पढ़ने का कोई उत्साह होगा तो खुद-ब-खुद उस तरह का इंतजाम भी होगा।

इसे महिलाओं की इस ओर कम जागरूकता या अनभिज्ञता से जोड़ कर देखा जाए, मगर वास्तविकता यही है कि आज भारत की अधिकतर मस्जिदों में महिलाओं के इबादत करने की कोई सहूलियत न के बराबर है। हालांकि बीते वर्षों के कुछ मामले और हाल में न्यायालय में दाखिल की गई इस याचिका से महिलाओं में इस ओर जागरूकता और पुरुष मानसिकता में कुछ बदलाव की उम्मीद जरूर की जा सकती है। केरल के सबरीमाला मंदिर में सभी आयु-वर्ग की महिलाओं के प्रवेश को सर्वोच्च न्यायालय की अनुमति मिलना, मुंबई स्थित हाजी अली दरगाह में गर्भगृह तक महिलाओं का प्रवेश ऐसे मामले हैं, जिन्होंने महिला अधिकारों के प्रति महिलाओं का न सिर्फ ध्यान आकर्षित किया है, बल्कि उन्हें उनके अधिकारों के रूप में जीत भी दिलवाई है। बेबाकी से मुसलिम महिलाओं के अधिकारों की बात करने वाली आॅल इंडिया मुसलिम वुमन पर्सनल लॉ बोर्ड की अध्यक्ष शाइस्ता अंबर का कहना है कि गलती हमारी है। हमने दीन को मुश्किल बना दिया, दीन को समझा नहीं। क्या हर्ज है अगर मोहल्ले की मस्जिद में जुमे के दिन ही महिलाओं के लिए अलग इंतजाम कर दिया जाता।

यह है मामला

हाल में यासमीन और उनके पति जुबेर पीरजादे ने सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका दाखिल कर मुसलिम महिलाओं को मस्जिदों में प्रवेश करने और नमाज अदा करने की अनुमति दिए जाने की मांग की है। इसमें उन्होंने कहा है कि कुरान और हदीस में ऐसा कुछ भी नहीं है और इस तरह की रोक असंवैधानिक है। साथ ही उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 21 और 25 का हवाला देते हुए कहा है कि मस्जिद में प्रवेश न देना मौलिक अधिकार का उल्लंघन है और जाति, लिंग और धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता। यहां तक कि मक्का में भी महिला, पुरुष में कोई लैंगिक भेदभाव नहीं है। पुरुष और महिला काबा का चक्कर लगा सकते हैं।

जब महिलाओं ने दी चुनौती

कुछ समय पहले आॅल इंडिया मुसलिम वुमन पर्सनल लॉ बोर्ड की अध्यक्ष शाइस्ता अंबर ने लखनऊ में अंबर मस्जिद का निर्माण करवा कर न सिर्फ पुरुष वर्चस्व को चुनौती दी, बल्कि महिलाओं के लिए मस्जिद का निर्माण करवा कर राह आसान की। अब यहां शुक्रवार के दिन काफी संख्या में महिलाएं नमाज पढ़ने के लिए इकट्ठी होती हैं। डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन में एक ऐसी मस्जिद है, जहां मस्जिद का पूरा प्रबंधन महिलाएं ही संभालती हैं। यहां तक कि इसमें इमाम भी महिला ही है। इसका नाम मरियम मस्जिद है। इसकी खासियत यह है कि इसमें पुरुषों का प्रवेश वर्जित है। अधिकारों की यह लड़ाई आज बदलाव की बयार बन कर बह रही है। यही वजह है कि महाराष्ट्र स्थित मालेगांव के एक मदरसे जामिया मुहम्मदिया के परिसर में बनी एक मस्जिद में लड़कियां नमाज पढ़ती हैं और उन्हें नमाज एक महिला इमाम ही पढ़ाती हैं। वहीं पिछले वर्ष कुरान सुन्नत सोयायटी की महासचिव चौंतीस वर्षीय जामिदा ने केरल के मलप्पुरम स्थित अपने कार्यालय में नमाज के दौरान इमाम की भूमिका इस तर्क के साथ अदा की थी कि कुरान में महिला और पुरुष के बीच कोई भेदभाव नहीं किया गया है।

कुछ समय पहले केरल की तझाथानगेडी में स्थित एक हजार वर्ष पुरानी मस्जिद में दो दिन के लिए महिलाओं को प्रवेश की अनुमति दी थी। हालांकि यह अनुमति नमाज के लिए नहीं, सिर्फ मस्जिद के दर्शन तक सीमित थी। महिलाएं चाहे किसी भी देश, काल की हों, पुरुषों की वर्चस्ववादी मानसिकता से उन्हें जूझना ही पड़ता है। देर से ही सही, लेकिन कुछ वर्ष पूर्व जयपुर की जामा मस्जिद में भी महिलाओं को नमाज पढ़ने की अनुमति दी गई थी।
इसके अलावा केरल के मल्लपुरम के पुलिक्कल में मस्जिद अल-रहम का निर्माण पांच एकड़ में किया गया है। इसे एक स्वयंसेवी संस्था एबिलिटी फाउंडेशन की ओर से बनवाया गया है। उनकी संस्था में पढ़ने वाले दिव्यांग छात्रों को इसमें इशारों के जरिए समझा कर नमाज पढ़ाई जाएगी। इसमें जुमे की नमाज और खुत्बे यानी धार्मिक उपदेशों को सांकेतिक भाषा में समझाया जाएगा।

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