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प्रसंगः लघु पत्रिकाओं के समक्ष चुनौती

लघु पत्रिकाएं जब तक अपने रूप परिवर्तन पर ध्यान केंद्रित नहीं करेंगी तब तक वे इस युग में अस्तित्व की लड़ाई लड़ती रहेंगी।

Author October 14, 2018 7:42 AM
प्रतीकात्मक चित्र

साहित्य का प्रवाह रुकता नहीं। हो सकता है कि कालक्रम के अनुसार वह तत्कालीन स्थितियों से प्रभावित हो जाए। साहित्यकार सामाजिक चिंताओं से सबसे पहले रूबरू होता और समसामयिक चिंताओं को अपने लेखन में उतार कर आगाह करने के साथ-साथ राह भी दिखाता है। यहीं से लेखक यह भी सोचने को विवश हुए कि अपनी बात कैसे जनता तक पहुंचाई जाए। उनके सामने एक तरफ बड़े प्रकाशन संस्थान थे, जो पूंजीवादी व्यवस्था को पोषित करने वाले माने जाते थे, तो दूसरी ओर वे कलमकार थे, जिन्हें प्रकाशन का कोई मंच सुलभ नहीं था। वे क्षुब्ध थे कि अपनी व्यथा को किस तरह लोगों तक पहुंचाएं। ऐसे में कुछ लोग लघु पत्रिका प्रकाशन में आगे आए।

नए सोच तथा नई पीढ़ी के जोश से लबरेज थीं ये पत्रिकाएं। लघु पत्रिकाओं का प्रकाशन शुरू हुआ तो इसमें वे लेखक आगे आए, जो लेखन से सामाजिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक परिवर्तन करना चाहते थे। पूंजीपति प्रकाशकों को लगने लगा कि यह आंदोलन उनकी जड़ों को हिला देगा और वे अपना मनचाहा करने में सफल नहीं होंगे। तब उन्होंने और अधिक सकल-पारिवारिक प्रकाशनों को गति दी, साथ ही साहित्यिक पत्रिकाओं में अवदान दे रहे प्रख्यात लोगों को अपने व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में स्थान देना शुरू कर दिया। इससे सैकड़ों स्थापित लेखक इनमें नौकरी पाने लगे तथा लघु पत्रिका आंदोलन यहीं से कमजोर पड़ने लगा। रचनाकारों में बिखराव शुरू होने लगा। एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप का वातावरण बनने लगा तथा व्यावसायिक प्रकाशन जनसामान्य की पहुंच तक जाने लगे।

निस्संदेह यह समय इस आंदोलन का संक्रमण काल था और साहित्यिक पत्रिकाएं दम तोड़ने लगीं। सबसे बड़ी बात जो इन पत्रिकाओं के प्रकाशन में रोड़ा बनी, वह थी आर्थिक कठिनाई। जो लोग इनका प्रकाशन कर रहे थे वे सामान्य लोग थे। इसलिए स्वाभाविक तौर पर कुछ अंकों के बाद ये पत्रिकाएं आर्थिक अभावों से जूझने लगीं। इनके प्रकाशक विज्ञापनों की तरफ उन्मुख हुए। पर विज्ञापनदाता पूंजीपति थे, इसलिए स्वाभाविक था कि जिससे विज्ञापन लिया गया, उसके प्रति नजरिए में परिवर्तन आया, क्योंकि पत्रिका के अनवरत प्रकाशन में विज्ञापन की भूमिका महत्त्वपूर्ण होने लगी थी।

इसलिए जो उत्साह सामाजिक व्यवस्था में समाजवादी चिंतन को लाने का था, वह हवा होने लगा और लघु पत्रिकाएं ऐसे पराभव काल में आ गर्इं कि पाठकों के अभाव में व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के हाथों की कठपुतली बन गर्इं। इस बीच व्यावसायिक पत्र-पत्रिकाओं ने अपने पांव जमाए और अनेक प्रलोभनों के कारण लेखकों की सोच बदल गई। क्रांति के सपने चकनाचूर हो गए। रातों रात रचनाकारों ने रूप बदले। आजादी से पहले जो चांद, माधुरी, कर्मवीर, प्रभा, सरस्वती, साहित्य, संदेश, इंदु, मतवाला था मर्यादा जैसी पत्र-पत्रिकाएं निकल रही थीं, उनका स्वरूप लघु पत्रिका का ही था, लेकिन इनका उद्धेश्य व्यापक होने से इन्हें समर्थन प्राप्त था और पाठक मिलने से आर्थिक सहयोग भी मिला हुआ था।

ये पत्र भले लघु थे, लेकिन इनकी आवाज इतनी व्यापक थी कि सामान्य जन को अपना अक्स इनमें दिखाई देता था। स्वतंत्रता एक ऐसा नारा था, जो कमोबेश इन पत्रिकाओं में किसी न किसी रूप में देखा जा सकता था। इसलिए प्रकाशन का उद्धेश्यपरक होना सबसे बड़ा सहयोगी भाव था। इधर स्वतंत्रता के बाद जो लघु पत्रिकाएं निकलीं, वे सब वैचारिक अधिक, व्यावहारिक कम थीं। इनके पाठक भी खास प्रबुद्ध या वे लेखक थे, जो इनमें लिख रहे थे। व्यावसायिक प्रकाशनों की सफलता का राज ही यह रहा कि उन्होंने सस्ती दरों पर रंगीन फोटो सहित सामग्री सरल भाषा में जनता को उपलब्ध कराई, जिससे वे लोकप्रिय हो गए और लघु पत्रिकाएं एक खास वर्ग तक सिमट कर रह गर्इं।

हालांकि लघु पत्रिकाएं अब भी देश के हर हिस्से से निकल रही हैं और लोग इन्हें पहचान देने की कोशिश में हैं, लेकिन असल में इनके संपादक और प्रकाशक इनके माध्यम से अपनी पहचान और अधिक स्पष्ट करने के प्रयास में होने से इनकी मूल भावना आहत हो गई है, इसलिए इनकी शक्ल धुंधला गई है। अभी जो लघु पत्रिकाएं निकल रही हैं वे खास कारणों से जीवित हैं। एक तो उनका प्रकाशन अनियमित है, इसलिए आर्थिक भार अधिक न होने से वे साल में एक-दो अंक निकाल कर अपनी उपस्थिति बनाए रहती हैं। उनका प्रयास होता है कि वर्ष भर में व्यावसायिक विज्ञापन जुटा लें और उस राशि से वे अपनी पत्रिका निकाल लें। दूसरा, अपने लेखकों से भी उनका प्रयास रहता है कि वे उनके ग्राहक बनें और आर्थिक सहयोग दें। तीसरा कारण यह मान सकते हैं कि इन पत्रिकाओं के प्रकाशक पाठकों के प्रति उपेक्षा भाव रखते हैं और सीमित साधनों से सीमित संख्या में प्रकाशन रख कर औपचारिकता पूरी करते हैं।

आज व्यावसायिक पत्रिकाओं के सामने भी अस्तित्व की चुनौती है, ऐसे में लघु पत्रिकाएं अपने को बचा सकें, यही बड़ी बात है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने पत्र-पत्रिकाओं को एक ऐसी चुनौती दी है कि वे चारों खाने चित्त हैं। तब लघु पत्रिकाओं के प्रकाशकों को नए ढंग से सोचने-समझने तथा अपने को संभालने की जरूरत है। एक सवाल यह भी है कि इन पत्रिकाओं की प्रासांगिकता है या नहीं। है तो कितनी और किस रूप में। सोच का फलक या रुख कैसा हो, यह भी एक विचारणीय बिंदु है। निस्संदेह लघु पत्रिकाओं में प्रकाशित साहित्य अत्यंत वैचारिक और जटिल होता है, पर कहीं यह गरिष्ठता तो उसके लिए घातक नहीं बन रही है।

लेखक, प्रकाशक को यह सोचना ही होगा कि वे जो साहित्य दे रहे हैं वह पाठकों के रचनात्मक सोच को क्यों नहीं उद्वेलित कर पा रहा है। साथ ही चकाचैंध के इस युग में जो वे छाप रहे हैं वे प्रतिस्पर्धा में कहां और कितना है? जन सामान्य जानता ही नहीं कि ये पत्रिकाएं क्यों और कहां से निकलती हैं? यह प्रश्न वाकई गंभीर तथा चुनौतीपूर्ण है। इस चुनौती को युग संदर्भ से जोड़ कर नहीं देखा जाएगा, तब तक सारे प्रयास बेमानी और बेमकसद हैं। लोकप्रिय साहित्य और विशुद्ध साहित्य के भेद को समाप्त करने की बात नहीं है, पर पाठकों का पुष्ट आधार भी विस्मृत नहीं किया जा सकता। रुचियों में परिष्कार का प्रश्न भी समीचीन और प्रासंगिक है। इसे अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए।

अब साहित्यकार अपनी पहचान किसी खास विचारधारा में कैद होकर सीमित रूप में नहीं देखना चाहता। जब उसे उसकी एक रचना यथोचित मान-सम्मान और पारिश्रमिक के साथ व्यापक पहचान दिलवा रही है, तो उन्हें व्यर्थ में निशुल्क सेवाएं देना इस आर्थिक युग में हास्यास्पद-सा लगता है। मनुष्य की जीविका का प्रश्न कभी अलग नहीं किया जा सकता है। लघु पत्रिकाएं शुरू से ही मिशनरी भाव से साहित्य सेवा को अंगीकार करती रही हैं। इसलिए इस रूप में लघु पत्रिकाओं का प्रकाशन अब प्रासांगिकता से कटता जा रहा है। लघु पत्रिकाएं जब तक अपने रूप परिवर्तन पर ध्यान केंद्रित नहीं करेंगी तब तक वे इस युग में अस्तित्व की लड़ाई लड़ती रहेंगी।

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