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किताबें मिलीं: मैं से मां तक, परनिंदा सम रस कहुं नाहिं और हड़कंप

मैं से मां तक: मां बनने के साथ शारीरिक, मानसिक और मनोवैज्ञानिक स्तर पर जो परिवर्तन होते हैं और अनुभूतियों में जो उतार-चढ़ाव आते हैं उनके बारे में बहुंत अंतरंगता से ‘मैं से मां तक’ में बात की गई है।

Author April 14, 2019 4:08 AM
मैं से मां तक बुक का कवर पेज।

परनिंदा सम रस कहुं नाहिं
इस संग्रह के सारे निबंध अपने शीर्षक से ही अपनी राम-कहानी कह देते हैं। पहले ही व्यंग्य ‘मुझे पुरस्कार नहीं चाहिए’ में पुरस्कार के लालची उस साहित्यकार की पीड़ा को व्यक्त किया गया है, जो पुरस्कार नामक फंदे का शिकार हो जाता है। शीर्षक व्यंग्य ‘परनिंदा सम रस कहुं नाहिं’ में उन लोगों को चिह्नित किया गया है जो जब तक दूसरों की निंदा नहीं कर लेते, उन्हें नींद नहीं आती। ‘सेटिंग है तो सब कुछ है’, ‘पैर छूने का पोस्टमार्टम’ और ‘महानता की ओर’ में बताया गया है कि आप सेटिंग-निपुणता कैसे प्राप्त कर सकते हैं और चरण-स्पर्श कला के सहारे किसी से भी अपने बड़े से बड़े काम को आसानी से कैसे करवा सकते हैं।

प्राय: नए व्यंग्यकार पुराने विषयों पर ही कलम दौड़ा कर दूसरों को घसीटते रहते हैं। लेकिन श्रीमान भाटी चूंकि खेल-जगत में लेखनी के खिलाड़ी रहे हैं और अपने आगे शबो-रोज होने वाले तमाशों से दीदएतर रहते हैं इसलिए इनका ज्यादातर लेखन समसामयिक विषयों पर ही चलता है। जैसे, ‘आओ सम-विषम हो जाएं’, ‘पत्नी की असहिष्णुता’, ‘खुले में शौचमुक्त अभियान बनाम काका की कब्जी’, ‘जीएसटी यानी गेल सफी टाट’, ‘बहन, महंगाई! आप क्यूं स्टे नहीं लाती’, ‘छुट्टियों पर प्रतिबंध को लेकर दिवंगत महापुरुषों की मीटिंग’, ‘पलटूराम’, ‘अतिक्रमण बनाम आस्था के स्थल’, ‘साहित्य में स्टार्टअप’, ‘खड्डे अच्छे हैं’ और ‘भागमभाग’। ये सारे निबंध देश में निकट अतीत के घटना-संदर्भ रखते हैं।

मैं से मां तक बुक का कवर पेज।

परनिंदा सम रस कहुं नाहिं : आत्माराम भाटी; सर्जना, शिवबाड़ी रोड, बीकानेर; 160 रुपए।

मैं से मां तक
मां बनने के साथ शारीरिक, मानसिक और मनोवैज्ञानिक स्तर पर जो परिवर्तन होते हैं और अनुभूतियों में जो उतार-चढ़ाव आते हैं उनके बारे में बहुंत अंतरंगता से ‘मैं से मां तक’ में बात की गई है। साथ ही कुटुम्ब को आगे बढ़ाने के लिए जो परिवार और समाज का दबाव और अपेक्षा का बोझ एक नयी-नवेली दुल्हन पर डाला जाता है, उसकी भी चर्चा है। मां बनने पर औरत के पूरे व्यक्तित्व, सोच और जीवन-मूल्यों में परिवर्तन आ जाता है, एक तरह से उसका अस्तित्व ही बदल जाता है और मां का रूप उसके अन्य सभी अस्तित्वों पर जैसे हावी हो जाता है। यह किताब अनुभव यात्रा है, एक मां की, जो कोई डॉक्टर नहीं, कोई विशेषज्ञ नहीं, बस एक मां है, जो अपने होने वाले बच्चे का हर पल जीना चाहती थी। उस तक पहुंचने वाली सारी कठिनाइयों से पहले खुद दो-चार होना चाहती थी। ‘मैं से मां तक’ की यह यात्रा लेखिका अंकिता जैन के साथ उन सब महिलाओं और बहुत से दंपतियों की भी है जो जीवन के इस सुंदर मोड़ पर हैं। वे सब अंकिता की यात्रा में अपनी यात्रा की कहानी पाएंगे।
मैं से मां तक : अंकिता जैन; राजपाल एंड संज, 1590, मदरसा रोड, कश्मीरी गेट, दिल्ली; 175 रुपए।

हड़कंप
संकट के इस भयावह दौर में कौशल किशोर श्रीवास्तव का व्यंग्य संग्रह ‘हड़कंप’ इस बात की आश्वस्ति देता है कि वे अपनी पैनी लेखनी के माध्यम से समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, मिथ्याचारिता और पाखंडों को उजागर करते हुए मंगलकामनाएं देते हैं कि इसका असर इतना व्यापक हो कि समाज में अमन-चैन कायम किया जा सके, फिर हर व्यंग्यकार का यह दायित्व भी है बनता है कि वह उन सब पर गहराई से चोट करे, जिसे वह गलत अथवा बुरा मानता है। ये व्यंग्य लेख कहीं न कहीं आम आदमी की पीड़ा को व्यक्त ही नहीं करते, बल्कि पाठक को एहसास कराते हैं। सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक बुराइयों पर चोट करते हुए सच्चाई का आईना दिखाते हैं। इस संग्रह में शायद ही कोई विषय छूटा हो, जिस पर कौशल किशोर श्रीवास्तव की कलम खामोश रही हो। चाहे विधायिका, कार्यपालिका, व्यवस्थापिका, न्यायपालिका हो चाहे धर्म, संस्कृति, पत्रकारिता, उनकी कलम की मार से अछूते नहीं रहे हैं। यही नहीं साहित्य, साहित्यकार, सम्मान भी इसकी चपेट में आए हैं। इनमें से ज्यादातर को पढ़ते हुए लगेगा कि जैसे आपबीती हों।
हड़कंप : कौशल किशोर श्रीवास्तव; अयन प्रकाशन, 1/20, महरौली, नई दिल्ली; 350 रुपए।

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