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किताबें मिलीं: भाषा-विभास, जीएसटी 100 झंझट और जुम्मै री नमाज

भले ही वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) को आसान बनाने की दिशा में कदम बढ़ाए गए हों, लेकिन हकीकत यह है कि पिछले डेढ़ साल में जीएसटी अधिसंख्य कारोबारियों, खासतौर से छोटे और मझौले कारोबारियों के लिए एक दुस्वप्न से कम नहीं रहा।

Author December 30, 2018 4:10 AM
भाषा-विभास बुका का कवर पेज।

भाषा-विभास
ज्ञान मनुष्य को अन्य जीवों से अलगाता है तो इस ज्ञान का साधन भाषा है। अध्येता, अध्यापक, कवि, लेखक, आलोचक, पत्रकार से लेकर पाठक तक, आम बोली से हटकर भाषा से टकराते हैं। इन सभी वर्गों को अगर भाषा से स्नेह है तो वे शब्दों के सही स्वरूप और प्रयोग के लिए भी सजग रहते हैं। डॉक्टर रामशङ्कर त्रिपाठी की किताब के आवरण पर जिस तरह ‘रामशङ्कर’ लिखा गया है वह इन दिनों वर्त्तनी में चलन से दूर है। हिंदी को सिमटाने और सिकुड़ाने के खिलाफ अगर आप जाते हैं तो फिर हिंदी में लिखने-पढ़ने वालों को संस्कृत का सामान्य ज्ञान होना चाहिए। अपनी पुस्तक में त्रिपाठी स्पष्ट करते हैं कि वे संस्कृतनिष्ठ, तत्समप्रधान भाषा के आग्रही नहीं हैं। वे कहते हैं कि आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, अज्ञेय, मुक्तिबोध, विद्यानिवास मिश्र, कुबेरनाथ की भाषा कृत्रिम नहीं है। भाषा चाहे विद्वानों की हो या आम बोलचाल की, उसे सहज और अकृत्रिम ही होना चाहिए। हर भाषा, शैली और शब्दों के मेल का सम्मान होना चाहिए। लेखक के विचार हैं, ‘चाहे जिस तरह मेल के शब्द हों, उनका स्वरूप सही होना चाहिए, उनकी वर्त्तनी शुद्ध होनी चाहिए। तत्सम शब्दों को अशुद्ध रूप में लिखने-बोलने को सहजतावाद नहीं कहेंगे’। किताब का पहला अध्याय ही इसका पूरा ध्येय बताता है, ‘शब्दों का सम्मान और वर्त्तनी से स्नेह’।
भाषा-विभास : डॉक्टर रामशङ्कर त्रिपाठी, कोशल पब्लिशिंग हाउस, लेखेश्वर काम्पलेक्स नाका बाई-पास, इलाहाबाद रोड फैजाबाद-224001, उत्तर प्रदेश, 995 रुपए

आमुक्तमाल्यदा श्रीकृष्णदेवराय
सम्राट श्रीकृष्णदेवराय रचित ‘आमुक्तमाल्यदा’ गद्यानुवाद है। आमुक्तमाल्यदा का मतलब है स्वयं धारण की हुई माला, समर्पित करनेवाली युवती। इस रचना को तेलुगु भाषा के पंचकाव्यों में सर्वश्रेष्ठ काव्य माना जाता है। इस काव्य में मुख्य कथा के साथ खांडिक्य और केशिध्वज, विष्णुचित्त का वाद-विवाद, यामुनाचार्य और माल दासरी आदि उपकथाएं भी समाविष्ट हैं। भक्ति शृंगार अध्यात्म को एक साथ जोड़कर वेदशास्त्रों का आधार लेते हुए वैष्णव संप्रदाय का झंडा हिंदू धर्म मंदिर के उन्नत शिखर पर गौरव से लहरा सकते हैं। इसी मंशा से कृष्णदेवराय इस कथा की ओर आकर्षित हुए थे ऐसा प्रतीत होता है। इसमें भक्त और भगवान के बीच की प्रेमधारा का मधुर वर्णन है। तमिलनाडु के बारह आलवार संतों में गोदादेवी उर्फ आंडाल एकमात्र महिला संत थीं। आंडाल भी राधा की तरह कृष्ण के प्रेम-रस में पूर्ण रूप से प्रभावित थीं। वह खुद पुष्पमालाएं गूंथती और भगवान को समर्पित करने के पहले स्वयं उसे पहनकर निहारती थीं। फिर वही माला श्रीरंगनाथ को पहनाई जाती थी। आंडाल की माधुर्य भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान श्रीरंगनाथ ने उनसे विवाह किया था। इस ग्रंथ के कई दिग्गज लेखकों द्वारा किए हुए अंग्रेजी अनुवाद प्रसिद्ध हैं। इस हिंदी अनुवाद में व्यंकटेश देवनपल्ली ने भारतीय सभ्यता से परिचित शब्द, नाद और ध्वनि का ख्याल रखा। इसमें मूल साहित्यिक कृति की आत्मा को उसी सहज और सौंदर्य बोध के साथ उतारा गया है।
आमुक्तमाल्यदा श्रीकृष्णदेवराय : व्यंकटेश देवनपल्ली, एडुक्रिएशन पब्लिशिंग (दिल्ली), आरजेड 94, सेक्टर-6, द्वारका, नई दिल्ली-110075, 315 रुपए

जुम्मै री नमाज
‘जुम्मै री नमाज’ राजेंद्र जोशी का राजस्थानी कथा संग्रह है। कहानी जब पहले सिर्फ कहते रहने का नाम थी तो उसे सिर्फ श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करना होता था। एक कहने वाला और दूसरा सुनने वाला। कहानी जब छापेखाने से निकल कर कागजों पर अक्षरों के रूप में आती है तो पढ़नेवाले को लिखने वाले के साथ तार जोड़ना होता है। लिखनेवाला सामने नहीं है और शब्दों के रूप में सामने आते हैं उसके द्वारा रचा गया जल, जंगल, जमीन और इंसान। कहानी तो बहुत लिख ली गई और पढ़ ली गई। हर नई कहानी लिखने वाले को चुनौती होती है कि उन्हीं शाश्वत भावों में नया क्या। संग्रह की अगुआई कर रही कहानी ‘जुम्मै री नमाज’ में राजेश जोशी इस चुनौती पर खरे उतरते हैं और भारत-पाक सीमारेखा पर पिछले सत्तर साल से रिसते जख्म को समसामयिक राज और समाज के कथ्यों से जोड़ते हैं। इस कहानी के दो किरदार दीनदयाल और सायरौ सात दशक पहले खींची रेखा पर अपने समय का रेखाचित्र बनाते हैं। ‘विदाई’ नामक कहानी में राजेंद्र जोशी ने महिलाओं की प्रतिबद्धता से लेकर परंपरा और संस्कृति के साथ भी मुठभेड़ की है। वहीं ‘कूख’ कहानी के जरिए कुंती और द्रौपदी आज की पितृसत्ता से सवाल करती हैं। आज के भारत में वेदव्यास की महाभारत से संवाद कराने की क्षमता ही राजेंद्र जोशी के इस कहानी संग्रह को पठनीय बनाती है।
जुम्मै री नमाज : राजेंद्र जोशी, ऋचा (इंडिया) पब्लिशर्स, बिस्सों का चौक, बीकानेर (राजस्थान) 33005, 200 रुपए

जीएसटी 100 झंझट
भले ही वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) को आसान बनाने की दिशा में कदम बढ़ाए गए हों, लेकिन हकीकत यह है कि पिछले डेढ़ साल में जीएसटी अधिसंख्य कारोबारियों, खासतौर से छोटे और मझौले कारोबारियों के लिए एक दुस्वप्न से कम नहीं रहा। इसका कारण इस कानून की पेचीदगियां और इसे लागू करने के तरीके रहे। जीएसटी को लेकर अब तक कारोबारियों और आम लोगों को किस-किस तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ा, इसकी एक झलक ‘जीएसटी 100 झंझट’ में देखने को मिलती है। वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह ने तमाम उदाहरणों और अनुभवों के हवाले से जीएसटी के कारण होने वाली मुश्किलों का जिक्र किया है। इस किताब में लेखक ने विभिन्न क्षेत्रों में जीएसटी के असर को समझाने की कोशिश की है। जीएसटी को बिना किसी तैयारी के लागू करना उसे थोपने जैसा हो गया।

इसके पीछे तर्क यह दिया जाता रहा कि इसे लागू करने के लिए आदर्श स्थिति कभी नहीं बनती और एक न एक दिन तो इसे लागू करना ही था। इसका नतीजा बाजार में अराजकता के रूप में सामने आया और कारोबारियों के लेने के देने पड़ गए। लेखक ने बाजार के तमाम पक्षों की गहराई से पड़ताल करने के बाद यह निष्कर्ष निकाला है कि टैक्स रिटर्न फाइल करने की अवधि और इसके दायरे में आने वाले उद्यमों का ढांचा ही बदल गया। बेहतर और व्यावहारिक यही होता कि पहले बड़े कारोबारों को इसके दायरे में लायाजाता, फिर मझौले और सबसे बाद में छोटे। किताब में जीएसटी पर कई अर्थशास्त्रियों के लेख भी हैं।
जीएसटी 100 झंझट : संजय कुमार सिंह, कौटिल्य बुक्स, हरि सदन, 20, अंसारी रोड, दरियागंज, दिल्ली, 299 रुपए

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