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किताबें मिलीं: चीन डायरी, मुंबई की लोकल, केजरीवाल की सियासत और योग ही जीवन

अकेला घर हुसैन का’, ‘कटौती’ और ‘जिबह बेला’ के बाद निलय उपाध्याय का चौथा काव्य संकलन है ‘मुंबई की लोकल’। निरंतर बाजारू होते जाते समय के बीच ये कविताएं समय के पहचान की एक दिशा सूचक सृजनात्मक घटना हैं।

Author December 9, 2018 2:44 AM
केजरीवाल की सियासत बुक का कवर पेज।

चीन डायरी
यात्रा आख्यानों, संस्मरणों और रिपोर्ताजों के साथ डायरी ऐसी ही विधा है, जो पाठक को निजी संसार में प्रवेश करने का अवसर देती है। अकृत्रिम और संभावनाओं से भरे इस संसार की एक बानगी कविवर ऋतुराज की चीन डायरी है। बदल रहे और विकास की गति में आगे निकल रहे हमारे इस पुराने पड़ोसी को एक कवि की आंख से देखना प्रीतिकर है। उनकी निगाह चीन के जन-जीवन के उन कोनों-अंतरों में जाती है, जहां बड़े मीडिया की तेज नजर नहीं जा पाती। इस जीवन के राग-विराग और हर्ष-विषाद को भी ऋतुराज अंकित करते जाते हैं। यह डायरी कवि के अपने संसार की हलचल भी दर्ज करती है, हालांकि यह दैनंदिन रोजनामचा नहीं है।

तेजी से बदल रहे चीन में कवि जो देखता है, अंकित करता गया है। ऋतुराज ने बताया है कि क्या नहीं देखा, इस न देखे में से कुछ देखना बहुत आकर्षक और शिक्षाप्रद है- ‘‘कहीं भी पेइचिंग में पालतू या आवारा पशु नहीं देखे। हां, पकाने के लिए सुपरमार्केट में जीवित मछलियां, सांप, मुर्गे वगैरह जरूर देखे हैं। बहुत कम उम्र के लड़के-लड़कियों को कहीं भी काम करते नहीं देखा। होटलों, दुकानों पर युवा लड़के-लड़कियां ही काम करते हैं। टैक्सियों, बसों, मिनी बसों में आमतौर पर लड़कियां ही कंडक्टर होती है। किसी भी गाड़ी/ वाहन के साइलेंसर से धुआं निकलते नहीं देखा। सड़कों के दोनों ओर अनेक प्रकार के फूल खिले हैं पर किसी को भी उन्हें तोड़ते नहीं देखा। चीन में भिखारी नाममात्र के हैं, केवल वे हैं जो अपंग हैं। किसी को शराब पीकर ऊधम मचाते नहीं देखा।’’ इसी तरह किसी समाज की सही स्थिति को जानने के लिए वहां की स्त्रियों को देखना हमेशा सही है। ऋतुराज लिखते हैं- ‘चीन की लड़कियां महान हैं, पूजनीय हैं। उन्होंने प्रकृति-प्रदत्त लिंगभेद को बहुत हद तक समाप्त कर दिया है। वे भारी से भारी मशीनें चलाती दिखाई देंगी।’

ऋतुराज की इस डायरी को सुंदर, सहज और प्रांजल गद्य के लिए पढ़ा जाना चाहिए। ऐसा गद्य जो हंसता हुआ है, जिसमें जमाने की चिंताएं तो हैं, लेकिन जो खुद किन्हीं चिंताओं के बोझ से निष्प्राण नहीं हो गया है। यहां कवि द्वारा महान चीनी कवियों के कुछ कविताओं के अनुवाद आए हैं तो चीन के संबंध में और भी अनेक प्रसंग हैं। देशाटन और तीर्थाटन से भिन्न यह देश का दर्शन है जहां कवि की सजग निगाहें हैं तो बेचैन मन भी। पुरानी बातों का संबल उन्हें प्रेरित करता है, तो आगे के लिए एक सपना अभी उनकी आंखों में बचा हुआ है। उन्होंने ठीक ही तो कहा है- ‘‘एक दिन सुन पाओ कांग के साथ नदी किनारे मछलियां पकड़ने जाऊंगा। खाना-पीना होगा, वे मछलियां पकड़ेंगे और मैं कविता करूंगा…।’’


चीन डायरी : ऋतुराज; राजपाल एंड सन्ज, 1590, मदरसा रोड, कश्मीरी गेट, दिल्ली; 250 रुपए।

मुंबई की लोकल
अकेला घर हुसैन का’, ‘कटौती’ और ‘जिबह बेला’ के बाद निलय उपाध्याय का चौथा काव्य संकलन है ‘मुंबई की लोकल’। निरंतर बाजारू होते जाते समय के बीच ये कविताएं समय के पहचान की एक दिशा सूचक सृजनात्मक घटना हैं। ये कविताएं कवि के नितांत भिन्न काव्य सामर्थ्य और काव्य संरचना के माध्यम से हमें मुंबई के उस अनुभव लोक में ले जाती हैं जहां भीड़ बहुत है, जीवन जटिल है और बाजार ने ऐसी जगह लाकर छोड़ दिया है कि आम लोगों को रोटी के लिए जान की बाजी लगानी पड़ती है, युद्ध लड़ना पड़ता है। लेकिन यह भी कमाल है कि कहीं से लोगों का जज्बा कम होता नहीं दिखता और शायद इसीलिए उन्होंने मुंबई की लोकल को एक गतिशील और जीवित चरित्र बना दिया है जो एक अर्थ में सवारी है तो दूसरे अर्थों में यात्री भी। इन कविताओं से होकर गुजरने के बाद अर्थ के और भी नए-नए आयाम खुलते हैं। मुंबई की लोकल के भीतर के जीवन को भारतीय समाज, संस्कृति, राजनीति तथा अर्थव्यवस्था के परिप्रेक्ष्य में देखना चुनौतीपूर्ण है। मुंबई की यह लोकल तेजी से बदल रहे समाज की न सिर्फ साक्षी बनकर हमारे सामने आती है वरन बदलाव के बीच के समय को समझने में मदद करती है। कविता पढ़ते हुए लगता है कि हम सिर्फ मुंबई की लोकल को ही नहीं मुंबई को देख रहे हैं और दुनिया को भी।


मुंबई की लोकल : निलय उपाध्याय; वाणी प्रकाशन, 4695, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली; 150 रुपए।

केजरीवाल की सियासत
आम आदमी पार्टी और उसके संयोजक अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली विधानसभा के चुनावों में शानदार कामयाबी पाकर राजनीतिक गलियारों में भूचाल ला दिया था। जनता ने उनको समर्थन देकर स्पष्ट संदेश दिया था कि यदि पारंपरिक राजनीतिक पार्टियां- कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी जन-हितैषी मसलों पर आवश्यक ध्यान नहीं देती हैं तो वह वैकल्पिक राजनीति की पैरोकार पार्टी को चुनने में कतई नहीं हिचकिचाएगी। मुख्य मंत्री केजरीवाल की सरकार ने कुछ महत्त्वपूर्ण जन-हितैषी कदम उठाए, जिनका जनता ने स्वागत किया। लेकिन धीरे-धीरे आप पार्टी में अंदरूनी खींचतान, सरकार और पार्टी-नेताओं पर भ्रष्टाचार के विभिन्न आरोपों और नेताओं के बड़बोले बयानों से जनता का मोहभंग होने लगा। इस स्थिति में कांग्रेस और भाजपा को अपना जनाधार बढ़ाने और राजनीतिक रूप से हावी होने का अवसर मिला। लेकिन जब तक इन पार्टियों का स्थानीय नेतृत्व मजबूत नहीं होगा, तब तक वे आप पार्टी की केजरीवाल सरकार को कठिन चुनौती पेश करने में सक्षम नहीं हो सकतीं। प्रस्तुत पुस्तक में अरविंद केजरीवाल, आप पार्टी के राजनीतिक सिद्धांतों, सरकार के महत्त्वपूर्ण फैसलों और उनसे उठने वाले संवैधानिक सवालों, नैतिक मसलों, विभिन्न विवादों और दिल्ली एवं देश की भावी राजनीति पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों का निष्पक्ष ढंग से विश्लेषण किया गया है। साथ ही, भारत में वैकल्पिक राजनीति का समर्थन करने वाली राजनीतिक पार्टियों की सीमाओं, चुनौतियों और संभावनाओं पर प्रकाश डाला गया है।


केजरीवाल की सियासत : श्रीपाल जैन; मंजुल पब्लिशिंग हाउस, द्वितीय तल, उषा प्रीत कॉम्प्लेक्स, 42 मालवीय नगर, भोपाल; 175 रुपए।

योग ही जीवन
सुखी जीवन की जीवन सबसे बड़ी आवश्यकता है- स्वस्थ शरीर। योगासन को अपने जीवन का एक अभिन्न अंग बनाकर शरीर को पूर्णरुप से स्वस्थ बनाया जा सकता है। शरीर जितना लचीला होगा, उतना ही स्वस्थ होगा। आसन से शरीर के रोग दूर होकर स्नायुतंत्र, हृदय, पाचन-तंत्र इत्यादि स्वस्थ होते हैं। शरीर के रोगों का द्वार पेट है। अनियमित भोजन, अनियमित व्यायाम के कारण शरीर दिन-प्रतिदिन शिथिल और रोगयुक्त होता चला जाता है। अनेक प्रकार के रोग, शरीर को अपना घर बना लेते हैं। यदि उन रोगों को तत्काल शरीर से बाहर निकालने का यत्न न किया जाए तो वे रोग शरीर की ऊर्जा को बाहर निकालने का प्रयत्न करते हैं, जिससे शरीर कमजोर होता चला जाता है। इसलिए समय रहते योगासनों के प्रति ध्यान दिया जाए तो शारीरिक एवं मानसिक रूप से ही नहीं, कार्यशैली में भी परिवर्तन महसूस किया जा सकता है। मनुष्य की बुद्धि ही एकमात्र ऐसी है जो जीवन में कहीं भी क्रांति ला सकती है। अगर मनुष्य अपनी बुद्धि का प्रयोग सात्त्विक रूप से अपने शारीरिक व आत्मिक उत्थान में किया जाए तो वह उन सभी स्थितियों में श्रेष्ठ व सुखी रह सकता है जो पृथ्वी पर, प्रकृति में विद्यमान है। अपने शरीर को विशेष प्रकार की आकृति में कुछ समय के लिए ढालने से अगर शरीर के रोग नष्ट होते हों और स्वास्थ्य लाभ होता हो ऐसी क्रिया को नियमित रूप से अपनाना चाहिए। प्रकृति हमें शरण ही नहीं देती हमारा पालन-पोषण कर पुरुषार्थ करने के योग्य भी बनाती है।


योग ही जीवन : वरुण वीर; मनु प्रकाशन, डी-25, डिफेंस कॉलोनी, नई दिल्ली; 200 रुपए।

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