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किताबें मिलीं: मोहनदास नैमिशराय: चुनी हुई कहानियां, मन के दस संसार और कोयला भई न राख

इस संकलन की कहानियों में जहां दलित सवालों और समस्याओं को शिद्दत के साथ उठाया गया है, वहीं दलित इतिहास से राजनीति पर भी विमर्श मिलता है। विशेष रूप से धर्म परिवर्तन के समय होने वाली अफवाहों को भी दर्शाया गया है।

कोयला भई न राख बुक का कवर पेज।

मोहनदास नैमिशराय: चुनी हुई कहानियां

इस संकलन की कहानियों में जहां दलित सवालों और समस्याओं को शिद्दत के साथ उठाया गया है, वहीं दलित इतिहास से राजनीति पर भी विमर्श मिलता है। विशेष रूप से धर्म परिवर्तन के समय होने वाली अफवाहों को भी दर्शाया गया है। कहा जा सकता है कि धार्मिक, राजनीतिक तथा सामाजिक घटनाओं और दुर्घटनाओं के संदर्भ में नैमिशराय जी विमर्श की जमीन तैयार करते हैं। उनमें उद्वेलन का भाव भी है और नई पीढ़ी के लिए प्रेरणास्पद संदेश भी।
उनकी कहानियां समाज के जीवंत पात्रों को लेकर लिखी गई हैं जिनमें विचार से लेकर व्यावहारिक पक्ष को बखूबी दर्शाया गया है। वे पात्र घर से बाजार के परिवेश में हैं। वे संसद में भी हैं और संसद के बाहर सफेदपोश के रूप में भी। रिक्शा चालक के साथ कार ड्राइवर भी रहे हैं। उन पात्रों में संघर्षरत होते हुए आगे बढ़ने का हौसला है। सामाजिक बदलाव के लिए वे कुछ करना चाहते हैं। स्वयं सम्मान की चाह रखना और दूसरों को भी सम्मान देना, यही उनका मकसद रहा है। घर में महिला, घर से बाहर महिला, पुरुष सत्ता के लिए शिकंजे की गिरफ्त में, पर उन्होंने इसके खिलाफ आवाज उठाई है। उनके जीवन के सुख-दुख का गंभीरता से इन कहानियों में रेखांकन हुआ है। निश्चित ही ये कहानियां दलित साहित्य में मील का पत्थर साबित होंगी।
मोहनदास नैमिशराय: चुनी हुई कहानियां : मोहनदास नैमिशराय; अनन्य प्रकाशन, ई-17, पंचशील गार्डन, नवीन शाहदरा, दिल्ली-110032; 300 रुपए

मन के दस संसार

प्रस्तुत पुस्तक आज के तथाकथित विकसित अर्थात भौतिक सरंजामों से भरे जमाने में हमें हमारी वास्तविक स्थितियों से रूबरू कराती है। सूचकांकों और आंकड़ों की दुनिया में हम सुखी दिखते हैं, क्योंकि हमारे पास आरामदायक आवासीय व्यवस्था, लक्जरी गाड़ियां, कीमती परिधान, लजीज व्यंजन, अच्छा-खासा बैंक बैलेंस और यहां तक कि मन-मुताबिक प्रेमी-प्रेमिकाएं हैं। फिर भी हम अपने जीवन में बेचैनी महसूस करते हैं। प्रतिस्पर्धा की सनक ने हमें परेशान कर रखा है। हम सुख में भी वर्चस्व तलाशने लगे हैं। यह सब मानसिक व्याधियां हैं जो हमें यातना अथवा नरक की ओर धकेल रही हैं। इन स्थितियों से आपका उद्धार कोई दूसरा नहीं कर सकता, इसका समाधान निजी स्तर पर स्वयं आपको निकालना होगा। यातना भरी दुनिया के बीच संबुद्ध बनना संभव है, यदि हम सम्यक प्रयास करें। यह पुस्तक इस दिशा में हमारी मदद कर सकती है।
‘मन के दस संसार’ निचिरेन दैशोनिन के बौद्ध-मत पर लिखी रिचर्ड जी कोस्टन की किताब ‘दैनिक जीवन में बुद्ध: निचिरेन दैशोनिन के बौद्ध धर्म का परिचय’ का हिंदी प्रस्तुतीकरण है। संजीव तुलस्यान ने बहुत परिश्रम से इस पुस्तक को गढ़ा है। एक भाषा से दूसरी भाषा में रूपांतरण, वह भी किसी वैचारिक पुस्तक का मुश्किल कार्य होता है। तुलस्यान समाजवादी कार्यकर्ता भी रहे हैं, उनके प्रभाव हम इस पुस्तक में देख सकते हैं।
मन के दस संसार : प्रस्तुति- संजीव तुलस्यान; वाणी प्रकाशन, 4695, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली-110002; 195 रुपए

रचनाधर्मिता के विविध आयाम

इस किताब में विभिन्न लेखों को संगृहीत किया गया है। इनमें पहले चार लेख, अलग-अलग पुस्तकों की भूमिकाएं हैं। ‘टैगोर की आध्यात्मिक चेतना’ शीर्षक लेख ‘टैगोर की अंतिम कविताएं’ पुस्तक की भूमिका है। ‘समन्वय की अनिवार्यता’ लेख संकलन ‘समन्वय’ का संपादकीय है। ‘पदचिह्न का बहुआयामी अवदान’ लेख कृषि वैज्ञानिक डॉ हरपाल सिंह की आत्मकथा ‘पदचिह्न’ की तो ‘कस्तूरा से कस्तूर सिंह स्नेही का बनना’ कस्तूर सिंह स्नेही की आत्मकथा ‘उपेक्षिता का बेटा’ की भूमिका है।
पांच लेख विभिन्न पुस्तकों की समीक्षाएं हैं। ‘भारत भूषण के गीतों का भाव स्वर’- पीड़ा के अमर गायक रहे भारत भूषण पर लिखे गए शोध प्रबंध से लिया गया लेख है। ‘ट्रेन का कथ्य व अनुवाद’ ‘ट्रेन’ कहानी की समीक्षा है जिसकी रचयिता एलिस मुनरो हैं। ‘सैमुअल की डायरी’ बलदेवकृष्ण कपूर का कहानी संग्रह है। इन कहानियों का केंद्रीय भाव मानवीय मूल्यों को बचाता प्रतीत होता है। इसी विचार के आधार पर इसकी समीक्षा ‘मानवीय मूल्यों को बचाता कहानी संग्रह सैमुअल की डायरी’ शीर्षक से लिखी गई है। डॉ शुकदेव श्रोत्रिय के संस्मरण संग्रह ‘अम्मा का संदूक’ में लोक पात्रों, मित्रों, रिश्ते-नातों से संबंधित लेख हैं। ‘अम्मा का संदूक में लोक प्रसंग और चरित्र’ समीक्षा इसी की बानगी है।
अन्य लेख रिपोर्ताज शैली में हैं। ये लेख विभिन्न महत्त्वपूर्ण कार्यक्रमों का आंखों देखा विवरण है जिनका उद्देश्य कार्यक्रमों की विविध विषयक प्रासंगिकता को सामने लाना है।
रचनाधर्मिता के विविध आयाम : अमित धर्मसिंह; नमन प्रकाशन, 4231/1, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली-110002; 300 रुपए

कोयला भई न राख 
‘लकड़ी जल कोयला भई, कोयला जलकर राख/ मैं विरहन ऐसी जली, कोयला भई न राख!’ कबीरदास का दोहा वरिष्ठ लेखक राजेंद्र राव के इस कहानी संग्रह पर खरा उतरता है। संग्रह की पहली दस कहानियां प्रेम के अलग रंग-रूप और सौंदर्य को पाठकों के सामने जीवंत रूप में प्रस्तुत करती है। इनकी विशेषता यह है कि एक-एक कहानी अपने समय के मूल्यों, रीति-रिवाजों, परंपराओं और परिवेश की हमकदम है। ये कहानियां अपने समय के बनने-बिगड़ने, संवरने तथा संवर्द्धित होते रूप को भी उद्घाटित करती चलती हैं। संग्रह की कुछ कहानियों में कला, संगीत, संगीतकारों व कलाकारों तथा उनके प्रति जनमानस के विचारों का सुंदर चित्रण भी हुआ है।
संग्रह की शुरुआती कहानियों में प्रेम की चित्र-विचित्र कथाएं हैं तो अगली पांच कहानियां सर्कस के अदेखे-अजाने जीवन पर आधारित हैं। सर्कस में करतब दिखाने वाले कलाकारों के जीवन के रहस्य-रोमांच, जीवन-मृत्यु के बीच खतरों से पल-पल दो-चार होने की कहानियां हैं। प्रतिदिन लोगों का मनोरंजन करने वाले कलाकारों के दुख-दर्द की अंदरूनी सच्चाई इन कहानियों में अप्रतिम ढंग से आई है। जीवन के राग-विराग का फलसफा लिए इन द्विध्रुवीय कहानियों में समानता यदि कहीं है तो वह यह कि दोनों ध्रुवों की कथाएं व उनके कथापात्र इसी दृश्य जगत के सामाजिक परिदृश्य की घटनाओं, व्यक्तियों व वस्तुस्थितियों का रेखांकन करती हैं। शब्दबिंब और संतुलित मौलिक कल्पनाएं तो लेखक की हैं ही।
कोयला भई न राख : राजेंद्र राव; राजपाल एंड सन्स, 1590, मदरसा रोड, कश्मीरी गेट, दिल्ली-110006; 250 रुपए

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