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किताबें मिलीं: सिंध : इतिहास, संस्कृति और साहित्य, कितने मोर्चे और कहां गए ये लोग

यह किताब क्या है? यह एक प्रयास है आपको इरशाद से, उनके गीतों से, और उनके गीतों की शायरी से जरा-सा परिचित करवाने का। इरशाद को परिवार से मिली उर्दू, स्कूल से पाई हिंदी और समाज से सीखी पंजाबी।

Author January 6, 2019 4:55 AM
सिंध : इतिहास, संस्कृति और साहित्य बुक का कवर पेज।

सिंध : इतिहास, संस्कृति और साहित्य

सिंध अश्वों में समृद्ध है, सुनिर्मित आभूषणों में समृद्ध है, अन्न में समृद्ध है, सदैव नवीन ऊन में समृद्ध है, सलमा पौधों में समृद्ध है, पवित्र सिंधु के तटों पर मधु से भरे पुष्प खिले हुए हैं।’ यह वर्णन विश्व के सबसे प्राचीन ग्रंथ ‘ऋग्वेद’ में उल्लेखित है। भारतवर्ष के इतिहास, संस्कृति, लोकाचार, आध्यात्म, धर्म आदि पर कोई भी विमर्श सिंध की चर्चा के बगैर अधूरा है। सिंध भारत का ऐसा पहला राज्य था, जो कि अरब के धर्मांध लुटेरों से आक्रांत हुआ था और ऐसा सबसे आखिरी प्रदेशों- पंजाब और सिंध, में से एक है जिस पर अंग्रेज हुकूमत अपना आधिपत्य जमा पाई थी। ईसा पूर्व 3240 से 2750 तक सिंध में एक ऐसी सभ्यता विद्यमान थी, जो कई दृष्टियों में सुमेर या मिस्र सभ्यता से अधिक उन्नत थी। देश विभाजन का सबसे बड़ा शिकार सिंध हुआ और एक अस्थिर, अव्यवस्थित और धार्मिक उन्मादी राष्ट्र का हिस्सा हो जाने के कारण आज वहां पुरातन काल का कोई भाव, कोई सबूत नहीं मिलता है। यह पुस्तक सिंध राज्य के भारतीय अतीत का प्रामाणिक लेखा-जोखा है, जिसमें द्रविड़ सभ्यता के युग, आर्य सभ्यता के काल और मिस्र सभ्यता के युग में सिंध की परिस्थितियों का विवरण दिया गया है। इसमें सिंधी भाषा के विकास, सिंधी साहित्य, सिंध और सूफी मत के साथ-साथ लेखिका की पाकिस्तान के सिंध यात्रा का भी रोमांचक विवरण है।
सिंध : इतिहास, संस्कृति और साहित्य: रश्मि रमानी; राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, नेहरू भवन, 5 इंस्टीट्यूशनल एरिया, फेज-2, वसंत कुंज, नई दिल्ली; 500 रुपए।

कितने मोर्चे
वंदना यादव के इस उपन्यास की पृष्ठभूमि सेना की है। लेखिका के पति भारतीय सेना में कर्नल हैं और उनकी पोस्टिंग कश्मीर, असम और सिक्किम की सीमाओं पर होती रही है। पीछे वे अकेली दिल्ली में रह कर अपनी दो बेटियों को ‘सिंगल पेरेंट’ की तरह पालती रही हैं। उन्होंने इस संघर्ष को न केवल जिया है, बल्कि अपने उपन्यास में पूरी शिद्दत से उतारा भी है। चौधरी विहार इस उपन्यास में एक समानांतर जीवन के रूप में उभर कर आता है। यहां के बच्चे सिविलियन वातावरण में पलते हैं और सैनिक पिता के छुट्टी पर घर आने पर असहज अनुभव करते हैं और उसके वापस बॉर्डर पर जाने की प्रतीक्षा करते हैं। चौधरी विहार में जीवन का हर पहलू उभर कर सामने आता है। यहां पड़ोसियों कि खारबाजी भी है तो आपसी जलन भी है। सेना के अस्पताल में संघर्ष करती माएं हैं, तो घरों की मरम्मत करवाती गृहणियां भी हैं। यहां तक कि बड़े अफसरों की पत्नियों की राजनीति भी उपन्यास की विविधता का हिस्सा बनती है। घर की छोटी-छोटी जरूरतों के लिए किस तरह पीछे छूट गई पत्नियां संघर्ष करती हैं, उनकी गाथा है वंदना यादव का यह उपन्यास। हिंदी में शायद पहली बार सीमा पर तैनात सैनिकों के परिवारों के छोटे-छोटे महायुद्धों का दस्तावेज बन सकता है यह उपन्यास। एक नया थीम है और उपन्यास का कोई पारंपरिक नायक या नायिका नहीं है। चौधरी विहार और सैनिकों के परिवारों का जीवन ही इस उपन्यास का केंद्र बिंदु है।


कितने मोर्चे : वंदना यादव; अनन्य प्रकाशन, ई-17, पंचशील गार्डन, नवीन शाहदरा, दिल्ली; 350 रुपए।

कहां गए ये लोग
इस पुस्तक में सत्रह लेखकों, साहित्यकारों, कवियों, पत्रकारों पर सविता चड्ढा के संस्मरणात्मक लेख हैं। लेखक को अपनी साहित्यिक यात्रा में जिन कुछ साहित्यिक हस्तियों से अपनत्व, स्नेह और सम्मान मिला, समय के साथ-साथ धीरे-धीरे एक-एक करके ये लोग दिवंगत हो गए। एक दिन सविता जी के हाथ में एक फोटो आया तो इन्होंने पाया कि चित्र में उपस्थित ये साहित्यकार अब इस दुनिया में नहीं है। उसी दिन ‘कहां गए ये लोग’ पुस्तक का बीजारोपण हो गया। इन ‘लोगों’ में शामिल हैं: आशारानी व्होरा, दिनेशनंदिनी डालमिया, विष्णु प्रभाकर, यशपाल जैन, डॉ. नारायण दत्त पालीवाल, राजेंद्र अवस्थी, जयप्रकाश भारती, डी. राज कंवल, ओमप्रकाश ‘नामी’, डॉ. नगेंद्र, ओमप्रकाश लागर, मुरारीलाल त्यागी, महेंद्र खन्ना, राजकुमार सैनी, पद्मश्री जगदीश चतुर्वेदी, पद्म्श्री वीरेंद्र प्रभाकर और डॉ. जयनारायण कौशिक। वैसे तो ये श्रद्धांजलि-स्मृति लेख हैं लेकिन आने वाले समय में साहित्य प्रेमियों के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि होगी जिसमें प्रसिद्ध लोगों के बारे में, उनके लेखन के बारे में जानकारी मिलेगी।


कहां गए ये लोग : सविता चड्ढा; साहित्यभूमि, एन-3/5 ए, गुरुद्वारा रोड, मोहन गार्डन, उत्तम नगर, नई दिल्ली; 480 रुपए।

काली औरत का ख्वाब
यह किताब क्या है? यह एक प्रयास है आपको इरशाद से, उनके गीतों से, और उनके गीतों की शायरी से जरा-सा परिचित करवाने का। इरशाद को परिवार से मिली उर्दू, स्कूल से पाई हिंदी और समाज से सीखी पंजाबी। इसीलिए उनकी भाषा पर पकड़ और समझ इतनी पुख्ता, पक्की और ठेठ है। इसका अंदाजा आप उनकी गजलों से, उनकी कविताओं और खासकर फिल्म के गीतों से लगा सकते हैं। मसलन, उनकी गजल का यह शेर देखिए!
हम सादा तबीयत लोगों का क्या सजना संवरना
साहिब जी,
इन राख सरीखे शोलों का क्या जलना बुझना
साहिब जी!!
और ‘जब वी मेट’ के गाने ‘मौजां ही मौजां’ के अंतरे की पंक्तियां हैं-
हो, माही मेरा शरबत वरगा
हो, माही मैं तैनू गट गट पी लां
यह गाना हिंदी फिल्मों में पहला पूरा, शुद्ध पंजाबी लिप्सिंक गाना था। और शुरुआत थी असली पंजाबियत की, जो 2007 से शुरू हुई और आज तक चल रही है। हालांकि ‘चमेली’ के गाने ‘सजना वे सजना’ और ‘सोचा न था’ के ‘ओ यारा रब्ब रुस्स जाने दे’ गाने के जरिए इरशाद ने एक तरह से यह ऐलान कर दिया कि वे हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को आनंद बख्शी, साहिर या गुलजार से भी ज्यादा गाढ़ा पंजाबियत का रंग देने वाले हैं।
एक और अहम बात, इरशाद ने कभी अपने गीतों में अजनबी लफ्ज इस्तेमाल नहीं किए। बेगाने से शब्द किसी भी गीत को पढ़ने-सुनने वाले से दूर कर देते हैं इसलिए उन्होंने हमेशा सीधे-सादे लफ्जों में अपनी बात कही है और वह एहसास सुनने वालों के दिलों तक पहुंचा है।
इस संकलन में इरशाद के फिल्मी सफर के शुरुआती दिनों से लेकर उन्हें पहला फिल्मफेयर अवार्ड मिलने तक के गीतों को तरतीब से पिरोया गया है।


काली औरत का ख्वाब : इरशाद कामिल; वाणी प्रकाशन, 4695, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली; 299 रुपए।

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