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किताबें मिलीं: अयोध्या: रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद का सच, आरटीआइ से पत्रकारिता

देश के स्वतंत्र होने के पूर्व से ही देश में दो तरह की विचारधाराएं कार्य कर रही थीं। एक का तर्क था कि पाकिस्तान बन जाने के बाद मुसलमानों को हिंदुस्तान में रहने का कोई अधिकार नहीं होना चाहिए।

अयोध्या: रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद का सच बुक का कवर पेज।

अयोध्या: रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद का सच
देश के स्वतंत्र होने के पूर्व से ही देश में दो तरह की विचारधाराएं कार्य कर रही थीं। एक का तर्क था कि पाकिस्तान बन जाने के बाद मुसलमानों को हिंदुस्तान में रहने का कोई अधिकार नहीं होना चाहिए। दूसरा पक्ष था कि हम ऐसा लोकतांत्रिक देश बनाना चाहते हैं, जहां सभी सम्मान के साथ जी सकें। राज्य किसी धर्म को प्रोत्साहित और हतोत्साहित करने का प्रयत्न न करे। सभी अपने विश्वास और धर्म के साथ उसका पालन कर सकें, किसी के साथ भेदभाव न हो।
लेकिन रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मसले का राजनीतिक स्वार्थों ने जिस प्रकार से इस्तेमाल किया, उससे सामाजिक सौहार्द्र का ताना-बाना ही टूट गया। अयोध्या से लेकर दिल्ली तक राजनेताओं से लेकर धार्मिक क्षेत्र के शंकराचार्यों, मौलानाओं तथा परोक्ष में बैठी शक्तियों से भी रप्त-जप्त कायम कर काफी हद तक मसले का हल निकाल लिया गया था, लेकिन वोटों की राजनीति ने इसे परवान नहीं चढ़ने दिया। जिस प्रकार हिंदू मानस बना दिया गया है, उससे लगता है कि अयोध्या में मंदिर बन ही नहीं सकता, मुसलमान तलवार उठाए खड़े हैं। जबकि यह पूरी तौर पर बेबुनियाद रहा है। देश के जाने-माने मुसलमानों ने मामले के समाधान में रुचि ली और इसके फार्मूले भी सुझाए। 1989 से देश की राजनीति में प्रत्येक लोकसभा-विधानसभा चुनाव इसी के इर्द-गिर्द लड़ा जाता रहा है और उसने सरकारों को बनाने और गिराने में महत्त्वपूर्ण भूमिका भी अदा की। पुस्तक का पटाक्षेप 1992 की घटनाओं के साथ इसलिए किया गया है कि जिससे युवा पीढ़ी इसे सिर्फ मंदिर-मस्जिद की राजनीति न समझ कर, इसकी असलियत से वाकिफ हो सके। वह खुद तय कर सके कि 1947 में जब देश आजाद हुआ, तब हम कहां थे और अब इतने झंझावातों से गुजरने के बाद क्या कर रहे हैं। शीतला सिंह, जो सिर्फ पत्रकार ही नहीं, सामाजिक सरोकारों से जुड़े कार्यशील बुद्धिजीवी रहे हैं और अयोध्या विवाद का हल कराने में उनकी भूमिका रही है, उनकी यह पुस्तक पूरे प्रकरण की तफसील में जानकारी मुहैया कराती है।
अयोध्या/रामजन्मभूमि-बाबरी-मस्जिद का सच: शीतला सिंह; कोशल पब्लिशिंग हाउस, लेखेश्वर कॉम्प्लेक्स, नाका बाईपास, इलाहाबाद रोड, फैजाबाद-224001; 550 रुपए
आरटीआइ से पत्रकारिता
आटीआई (सूचना का अधिकार) कानून आम नागरिकों के साथ-साथ पत्रकारों के लिए भी प्रामाणिक सूचनाएं जुटाने का माध्यम है। किस्सागोई अंदाज में लेखक श्यामलाल यादव ने अपने अनुभवों के आधार पर बताया है कि एक पत्रकार के तौर पर उन्होंने इस कानून का लगातार उपयोग करके किस तरह सूचनाएं जुटार्इं, सूचना को किस तरह पठनीय और दिलचस्प खबरों में तब्दील किया और उन खबरों के शासन-तंत्र पर पड़ने वाले असर पर किस तरह नजर रखी। पुस्तक में सैद्धांतिक बातें कम हैं और व्यावहारिक पहलुओं पर ज्यादा जोर है, इसलिए यह लेखक की ‘बड़ी खबरों के पीछे की दास्तान’ बताने वाली अनोखी पुस्तक बन गई है। इस पुस्तक में श्यामलाल ने न सिर्फ हर स्टोरी के लिए की गई रिपोर्टिंग के बारे में विस्तार से लिखा है, बल्कि यह भी बताया है कि दूसरे लोग इसे कैसे कर सकते हैं। इन सभी वजहों से यह पुस्तक संवाददाताओं, संपादकों, शोधकर्ताओं और पत्रकारिता पढ़ाने वाले शिक्षकों के साथ ही, आम नागरिकों के लिए भी निश्चित तौर पर संग्रहणीय और पठनीय बन गई है। इसके जरिए अब आम नागरिक तक यह अनुभव कर सकते हैं कि दस रुपए का एक पोस्टल ऑर्डर और एक सशक्त कानून क्या कुछ करने में समर्थ है।

पत्रकारिता के नाम पर आजकल ट्विटर पर मसखरेबाजी, ओछी टिप्पणियां, एक-दूसरे को नीचा दिखाने, डींगें हांकने, या फिर बेसिर-पैर की बातें करने जैसी बहुत-सी चीजें हो रही हैं। जिस तरह सरकारें और सत्ता प्रतिष्ठान लगातार अधिकाधिक अभेद्य होते जा रहे हैं, नेतागण अपने वोटरों से सोशल मीडिया पर एकतरफा संवाद कर रहे हैं, कार्यकुशलता के नाम पर सरकारी संस्थाएं मनचाहे ढंग से जनता से संपर्क तोड़ रही हैं, ऐसे में आज पत्रकारिता से पहले से कहीं ज्यादा अपेक्षा की जाती है कि वह सरकार, कारोबार और राजनीतिक क्षेत्रों में शीर्ष पदों पर बैठे दक्षिणपंथियों, वामपंथियों- सभी से सवाल करे और उन्हें जवाबदेह बनाने का प्रयास करे। श्यामलाल का काम इसी तरह की पत्रकारिता का नमूना है। निश्चय ही यह पुस्तक संवाददाताओं और संपादकों की नई पीढ़ी के लिए जरूरी खबरें पाने के वास्ते गोपनीयता के विरुद्ध उनके संघर्ष में, एक प्रेरणा-स्रोत का काम करेगी। वर्तमान समय संभवत: इस पुस्तक के प्रकाशन के लिए सर्वाधिक उपयुक्त है।
आरटीआई से पत्रकारिता: श्यामलाल यादव; सेज पब्लिकेशंस, बी-1/1-1, मोहन कॉपरेटिव इंडस्ट्रियल एरिया, मथुरा रोड, नई दिल्ली-110044; 440 रुपए

शब्दों में बची है उम्मीद
जब राजनीति मूल्यविहीन होने को अभिशप्त हो तब उम्मीद भरी आंखें सिर्फ शब्दों की आहट तलाश करती हैं। सुधीर विद्यार्थी की इस पुस्तक में हिंदी-उर्दू के रचनाकारों की सिर्फ जीवनियां नहीं हैं और न ही उनके रेखाचित्रों अथवा संस्मरणों को ही चित्रित करने की कोशिश की गई है, बल्कि यहां उनकी जिंदगी के उन हिस्सों की रंगत को पहचानने का उपक्रम भी संदर्शित हुआ है जिसका विकास उस जमीन पर हुआ जहां पलने-बढ़ने के साथ ही वे कुछ रचने-गढ़ने की ओर उन्मुख हुए। हरिवंश राय ‘बच्चन’ के जीवन का वह पक्ष जब वे एक खास शहर में तेजी से अपने रिश्ते को बांध रहे थे और तब उनकी कविता कौन-सा रूप धारण कर रही थी! इस्मत चुगताई ने भी जिस एक बस्ती में रह कर अपने भीतर की लेखक-स्त्री को ढालना-बनाना शुरू किया, वह उनके पूरे रचनाकर्म की उस बुनियाद को समझने जैसा है जो नींव के पत्थर की मानिंद खुरदरा, मजबूत, लेकिन रंगों से भरा है।

बाल साहित्यकार के रूप में ख्यात निरंकार देव सेवक की प्रारंभिक विद्रोही कविता का अनचीन्हा पक्ष और उनके मानववादी विचार की दुनिया को यह पुस्तक नए आयाम देती है। राजी सेठ के कवि और कथाकार होने से इतर उनके रचनाकार के प्रारंभिक जीवन काल को देखने की सर्वथा भिन्न ढंग की कोशिशें यहां चित्रित हुई हैं। व्यंग्यकार केपी सक्सेना का शहर भी अपने तर्इं जीवंत हो उठता है। डॉ कमर रईस और पीडी टंडन के रचनाकर्म को सामने रख कर उनकी जमीन की उर्वरा को परखने का उपक्रम करती यह पुस्तक इस मायने में अत्यंत जरूरी बन पड़ी है। मनमोहन लाल माथुर ‘शमीम बरेलवी’ के जरिए उर्दू कविता ही नहीं, बल्कि उस भाषा में आलोचना की एक सघन पड़ताल की ओर हमारा ध्यान जाता है। कृति में वीरेन डंगवाल के कवि-जीवन को अत्यंत निकटता से देखने की कोशिश ‘शहर को बड़ा बनाती है वीरेन डंगवाल की कविता’ लेखक के निष्कर्ष की बखूबी ध्वनित करती है। सांस्कृतिक आंदोलन का परिदृश्य किस तरह जितेंद्र रघुवंशी की अचानक अनुपस्थिति से खालीपन की चपेट में आ जाता है। यह इस ओर भी इंगित करता है कि अभी ‘इप्टा’ जैसी संस्थाओं को और अधिक जनोन्मुख बनाने की जरूरत है।
शब्दों में बची है उम्मीद: सुधीर विद्यार्थी; नयी किताब प्रकाशन; 1/11829, ग्राउंड फ्लोर, पंचशील गार्डन, नवीन शाहदरा, दिल्ली-110032; 300 रुपए

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