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प्रकाशन- सुबह की उजली धूप-सा जीवन

देवी प्रसाद त्रिपाठी खुद शरद पवार की पार्टी नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी से जुड़े हैं और उसके प्रखर प्रवक्ता हैं।

Author April 10, 2017 12:56 PM
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी नेता शरद पवार

 सूर्यनाथ सिंह

एक ईमानदार और तथ्यपरक जीवनी, खासकर किसी सक्रिय राजनेता की जीवनी, लिखना खासा कठिन और जोखिम भरा काम होता है। मगर इस जोखिम को देवी प्रसाद त्रिपाठी ने बड़े साहस के साथ उठाया है। शरद पवार की जीवनी ‘स्वयंसिद्ध’ लिख कर। इस किताब को लेकर कुछ शुरुआती सवाल स्वाभाविक हैं। देवी प्रसाद त्रिपाठी ने शरद पवार की जीवनी लिखने के बारे में क्यों सोचा। इसका एक सीधा जवाब यह हो सकता है कि शरद पवार ने संसदीय राजनीति में सक्रिय पचास साल पूरे कर लिए और अपने जीवन के पचहत्तर बरस, इस अवसर पर यह किताब उन्हें उपहार के तौर पर उन्होंने दी है। देवी प्रसाद त्रिपाठी खुद शरद पवार की पार्टी नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी से जुड़े हैं और उसके प्रखर प्रवक्ता हैं। तो क्या उन्होंने इस अवसर पर अपने नेता की खुशामद करने के इरादे से यह किताब लिखी? वे चाहते तो यह काम कोई भी कर सकता था- करना चाहता भी रहा होगा- क्या पता कुछ और लोग इस तरफ प्रवृत्त हुए हों, पर ऐसे किसी को प्रेरित करने के बजाय देवी प्रसाद त्रिपाठी ने खुद लिखने का बीड़ा क्यों उठाया? इसका जवाब यह किताब खुद है। कोई और लिखता तो शरद पवार की जीवनी तो लिखी जाती, पर वह ‘स्वयंसिद्ध’ कतई न होती।

देवी प्रसाद त्रिपाठी राजनीति विज्ञान के प्राध्यापक रहे हैं, दक्ष राजनीतिक विश्लेषक हैं, सक्रिय राजनीतिक हैं। पर यह सब उनके व्यक्तित्व का महज एक पहलू है। वे गहन साहित्य मर्मज्ञ हैं। हिंदी, उर्दू और अंगरेजी साहित्य के संवेदनशील अध्येता तो हैं ही, दूसरी भारतीय भाषाओं से भी राब्ता कायम रखते हैं। खुद कविताएं रचते हैं। ऐसे में जब उन्होंने शरद पवार की जीवनी लिखने की ठानी, तो उसे महज सूचनात्मक और विरुदावली नहीं रहने दिया। सूचनाओं और घटनाओं के ब्योरों का बोझ लादने से बचने का भरसक प्रयास किया। इसमें उन्होंने साहित्यिक आस्वाद भरने की कोशिश की। हालांकि हर विधा का अपना स्वरूप होता है और उससे बाहर निकल कर कुछ करना, लिखना, कहना विशेष कौशल की मांग करता है। पर सिद्ध रचनाकार विधाओं के प्रचलित चौखटे से बाहर निकलने, उसमें तोड़-फोड़ करने के उपाय तलाश ही लेते हैं। देवी प्रसाद त्रिपाठी ने बड़ी कुशलता से प्रचलित खांचे से बाहर निकल कर एक रोचक जीवनी का वितान रचा है। शरद पवार जमीन के, जमीन से उठे और निरंतर जमीन से जुड़े रहने वाले राजनेता हैं। उनकी योग्यता राजनीतिक तिकड़म, दांव-पेंच, जातिबल, धनबल से सत्ता तक पहुंचने में नहीं, बल्कि जनसामान्य से लगातार जुड़े रहने और उनके बीच का होकर रहने में है। वे अवसर की राजनीति के बजाय सिद्धांत की राजनीति करने के कठोर हिमायती हैं। यह अकारण नहीं है कि उनके इसी गुण के चलते न सिर्फ पूरे महाराष्ट्र में, बल्कि देश के विभिन्न हिस्सों में उनके चाहने वाले मौजूद हैं। महाराष्ट्र के एक छोटे से और नितांत पिछड़े इलाके से संघर्ष कर केंद्र की राजनीति में लगातार अपनी सक्रिय भूमिका बनाए रखने वाले शरद पवार की ताकत उनके साथ पूरे मनोयोग से जुड़े लोग हैं। उनका व्यक्तित्व इस बात की गवाही देता है कि एक बेहतर इंसान ही बेहतर राजनेता हो सकता है। वे तालीबटोरू भाषणों के जरिए नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना के नाते अपना जनाधार बना पाए हैं। महाराष्ट्र का बारामती इलाका उनके अपने परिवार जैसा है।

ऐसे राजनेता के बारे में लिखने चलें तो घटनाओं और संस्मरणों की कमी नहीं होगी, मगर सब कुछ को समेटने से जो ग्रंथ आकार लेता उसके ऊबाऊ होने की आशंका बनी रहती। इसलिए देवी प्रसाद त्रिपाठी ने बड़ी सावधानी से हर वर्ग के प्रतिनिधि चरित्रों को चुना, जिनके माध्यम से शरद पवार के व्यक्तित्व का एक-एक पहलू मुकम्मल तौर पर उभारा-उकेरा जा सके। इसके लिए उन्होंने परिवार के निहायत निकट के लोगों को चुना। कुछ खास मित्रों और सदा उनकी सेवा-टहल में रहने वाले लोगों से संपर्क किया। उन्होंने जो संस्थाएं खड़ी कीं, जो संगठन बनाए और किसानों के लिए जो समितियां बनार्इं उनके चुनिंदा लोगों से बातचीत की और बहुत संक्षेप में उनकी बात के किसी एक या दो अंशों का उल्लेख करते हुए शरद पवार के बहुआयामी व्यक्तित्व के बारे में बताने का प्रयास किया। इस तरह यह किताब बोझिल और अनावश्यक घटनाओं, तथ्यों का पुलिंदा होने से बच गई।
यह किताब कुल छोटे-छोटे अठारह अध्यायों में विभक्त है। हर अध्याय शरद पवार के व्यक्तित्व के एक पहलू को उभारता है। इनमें महाराष्ट्र के राजनीतिक-आर्थिक-सांस्कृतिक परिवेश से लेकर शरद पवार के बचपन, परिवार के लोग, शिक्षा-दीक्षा, राजनीतिक सक्रियता, खेती-किसानी को लेकर उनकी नवोन्मेषी प्रवृत्ति, लोगों से संपर्क बनाए रखने का अद्भुत कौशल, समस्याओं के समाधान के लिए त्वरा बुद्धि, संगठनों और संस्थाओं के निर्माण का साहस और लोगों को जोड़े रखने की क्षमता, साहित्य, कला, संगीत, फिल्म आदि के प्रति उनकी रुचि, विभिन्न राजनीतिक दलों के लोगों से उनका हेलमेल, बदलती स्थितियों में राजनीतिक सूझबूझ से काम लेने जैसे विभिन्न गुणों का बखान है।

इस किताब को पढ़ते हुए न सिर्फ शरद पवार को ठीक से समझने में मदद मिलती है, बल्कि हम उनका राजनीतिक जीवन शुरू होने से लेकर अब तक की भारतीय राजनीति में आए उतार-चढ़ावों, राजनीतिक पैंतरेबाजियों, क्षुद्रताओं आदि को भी जानते-पहचानते चलते हैं। इस किताब की एक अच्छी बात यह है कि यह शरद पवार के राजनीतिक जीवन पर केंद्रित न होकर उनके निजी जीवन को अधिक उभारती है। इससे उनके पारिवारिक जीवन, सामाजिक रिश्तों आदि का पता अधिक मिलता है। वे व्यस्त और सक्रिय राजनेता होने के बावजूद जिम्मेदार पति, पिता, भाई आदि भी हैं। उन्होंने राजनीतिक व्यस्तताओं के बावजूद रिश्तों को कभी प्रभावित नहीं होने दिया। सामान्य गृहस्थ की तरह जीवन जीते रहे, वैसे ही पत्नी और पुत्री को भी जीवन जीने को प्रेरित किया। हर दिवाली उनका पूरा परिवार अपने पैतृक गांव में जुटता है, और उसी तरह उत्सव मनाता है, जैसे उनकी मां ने परिपाटी डाली थी। यह अपनी जड़ों से जुड़े रहने का बड़ा प्रमाण है।

देवी प्रसाद त्रिपाठी ने इस किताब को जीवनी की तरह लिखते हुए भी उपन्यास के शिल्प में ढालने का सफल प्रयास किया है। हर जगह कथारस अपना प्रभाव छोड़ता है। चाहे वह शरद पवार की पत्नी प्रतिभाजी से बातचीत हो, उनकी भाभी आशा ताई से या फिर पुत्री सुप्रिया सुले से, छोटे-छोटे वाक्यों के संवाद। छोटे सवाल, छोटे जवाब। वर्णन शैली ऐसी अद्भुत कि एक सधा हुआ कथाकार ही ऐसा कर सकता है। इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है- ‘नहा-धोकर येड़े एक बार फिर उनके सामने आया। अब वह थोड़ा हल्का महसूस कर रहा था। शरदजी ने उसे ध्यान से देखा। बीस-इक्कीस साल का खूबसूरत जवान, संतरे के पेड़ जैसा दबता हुआ कद, सुबह दस बजे की धूप-सा खिलता हुआ रंग, शिक्षा दसवीं उत्तीर्ण और उसकी आंखों में, अपनी बात कह सकने का निश्चय और विश्वास।’ संवादों में मराठी की छौंक रहने दी गई है। इससे बातचीत और उस इलाके का परिवेश सहज ही खुल-खिल उठता है। देवी प्रसाद त्रिपाठी कहीं-कहीं प्रचलित मुहावरों में भी तोड़-फोड़ करते हुए बहुत सलीके से उन्हें नई धज में पेश कर देते हैं। मसलन, ‘शेर की दहाड़ शेर की ही होती है, चाहे वह जंगल में हो या जंगले में।’ यह किताब न सिर्फ पिछले पचहत्तर सालों की राजनीति का अक्स उभारती, बल्कि राजनीतिक आग्रहों से मुक्त होकर पढ़ने पर शरद यादव के अनछुए पहलुओं से साक्षात भी कराती है।

(स्वयंसिद्ध: देवी प्रसाद त्रिपाठी; वाणी प्रकाशन, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली; 495 रुपए।)

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